सफल जीवन के मंत्र हैं विनम्रता और मधुरता : राष्ट्रसंत ललितप्रभ

Posted On:- 2022-07-18




रायपुर (वीएनएस)। ‘सफल सुखी जीवन का पहला मंत्र है- सबके सामने बहुत विनम्रता से पेश आएं। विनम्रता ही दूसरों के दिलों में जगह बनाती है। विनम्रता हमारे जीवन का महान सद्गुण है, वह जीवनभर हमारे साथ रहे। खटर-पटर हो रही जीवन की गाड़ी के पहियों में विनम्रता रूपी ग्रीस लगा लो, हमेशा के लिए विनम्रता को अपनी आदत बना लो, जीवन की गाड़ी सहज-सरल चल पड़ेगी। अगर आप प्रभावी व्यक्तित्व के मालिक बनाना चाहते हैं तो इसके लिए दूसरा मंत्र है- जब भी बोलें, मधुर-मिठास भरी भाषा बोलें। रावण को बोलना नहीं आता था, इसीलिए उसने अपने सगे भाई को भी खो दिया और श्रीराम को बोलना आता था, इसीलिए उन्होंने दुश्मन के भाई को भी अपना बना लिया। शरीर पर लगा घाव दवा से भर जाता है लेकिन जुबान से लगाया घाव जीवनभर नहीं भर पाता। इसीलिए जब भी बोलें-प्रेम से बोलें।’

ये बातें राष्ट्र संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागरजी महाराज ने आउटडोर स्टेडियम बूढ़ापारा में जारी दिव्य सत्संग ‘जीने की कला ’ के अंतर्गत युवाओें के लिए प्रारंभ व्यक्तित्व विकास सप्ताह के प्रथम दिवस सोमवार को कहीं। ‘कैसे बनें करिश्माई व्यक्तित्व के मालिक’ विषय पर जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- मनुष्य के व्यक्तित्व विकास के लिए जो भी निर्माण होता है वह उसके स्वयं के द्वारा होता है। यदि आपको अपने जीवन में ऊंचाइयों को छूना है तो आपको लगना होगा। पूरी दुनिया में एक ही है जो आपको ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है, वह आप खुद हैं। इसके लिए शुरुआत आपको जमीन से करनी होगी। जब तक कोई हवाई जहाज जमीन पर नहीं दौड़ेगा, तब तक वह आसमान की ऊंचाइयों पर चढ़ नहीं पाएगा। माँ-बाप के नाम को वही रोशन कर सकता है जो खुद रोशनी में जीता है। अंधेरे में जीने वाले लोग, गलत राह पर चलने वाले लोग कभी अपने माँ-बाप के नाम को रोशन नहीं कर सकते।

संतप्रवर ने आगे कहा कि ऊंचे कुल में जन्म लेना भाग्य की बात है। ऊंचे कुल में जन्म ले लेने से आदमी महान नहीं हो जाता, आदमी अपने अच्छे कर्म से महान होता है। लोगों के दिलों में वही जिंदा रहता है जो ऊंचे कर्म किया करता है। श्रृंगार करने से आदमी का चेहरा सुंदर होता है पर सद्गुणों से आदमी का पूरा जीवन सुंदर हो जाता है। याद रखें वैभववान व्यक्ति केवल जीते-जी पूजा जा सकता है, पर त्यागी की पूजा उसके जाने के बाद बरसों-बरस होती है। जिन्होंने अपना जीवन त्याग-वैराग्य के साथ जिया, उन्हें लोग आज भी याद कर रहे हैं, वे आज भी पूजे जा रहे हैं। यदि आप चाहते हैं कि आप जहां जाएं, वहां लोग आपको पसंद करें, आपका सम्मान करें तो जीवन में विनम्रता और मधुरता-मिठास के मंत्र को सदा के लिए अपना लें।

संतप्रवर ने कहा कि यदि अपने द्वारा आप किसी को सबसे बड़ा उपहार दे सकते हैं तो वह है प्रेम। इसके लिए चाहिए केवल आपका बड़ा व्यवहार, आपका बड़प्पन। जीवन में हमेशा उदार बने रहें, अपने हाथों से हमेशा दूसरों को कुछ न कुछ समर्पित किया करें। अगर आपको कोई भूखा-प्यासा मिल जाए तो उसे भोजन जरूर कराएं। किसी दीन-दुखी के काम आकर उसके कल्याण का सत्कर्म जरूर करें। क्योंकि आदमी अपने रंग से नहीं, ढंग से महान होता है। अपनी सूरत को हम नहीं बदल सकते, पर अपनी सीरत को जरूर बदल सकते हैं। लोगों के दिलों में वही जिंदा रहता है जो अच्छे कर्म करता है। अच्छा मुकाम पाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, नैतिक जीवन पड़ता है, तभी उसका जीवन एक आदर्श बनता है।

इंसान का जन्म या जीवन निर्माण तीन चरणों में :
दुनिया में किसी भी इंसान का जन्म तीन चरण में होता है। यूं तो सब यही कहते हैं कि मैं अपने माँ-बाप का जाया हूं। पर आज मैं बता दूं, आदमी का पहला जन्म उसके माता-पिता के द्वारा होता है, जिससे शरीर मिलता है। दूसरा जन्म उसके गुरु द्वारा प्राप्त होता है, जिससे व्यक्ति के ज्ञान की ज्योति जाज्वल्यमान होती है। और आदमी का तीसरा अंतिम जन्म होता है, वह व्यक्ति के स्वयं के द्वारा होता है। जिसे व्यक्तित्व निर्माण कहते हैं। यदि ऊंचाइयों को पाना है तो खुद को लगना पड़ता है। अगर भगवान महावीर को परम ज्ञान प्राप्त करना है तो उनको लगना पड़ा, अगर बुद्ध को बोधि सत्व प्राप्त करना है तो उनको लगना पड़ा, अगर आपको अगर जीवन की ऊंचाइयों को छूना है तो आपको लगना होगा। एक बात तय है कि बैठे-ठाले किसी भी इंसान को जीवन में कभी मुकाम नहीं मिलता है। अपनी मंजिल पानी है तो कदम आगे बढ़ाने होंगे। याद रखें दुनिया में आदमी कितनी ही ऊंचाइयों पर पहुंच जाए पर उसे शुरुआत तो जमीन से करनी पड़ती है। जीवन की सफलता को, ऊंचाइयों को पाने के लिए शुरुआत अपने-आप से करनी होगी।

जिंदगी के निर्माण के लिए आज मैं आपको कुछ मंत्र दे रहा हूं। अगर आप चाहते हैं कि मैं लोगों के दिलों में जगह बनाऊं, सब लोग मुझे पसंद करें तो मैं एक बात बता दूं कि ऊंचे कुल में जन्म लेने से आदमी महान नहीं होता। भगवान महावीर ने 2600 साल पहले यह कहा था कि न आदमी जन्म से महान होता है, न जाति से न कुल से महान होता है, न पद से महान होता है और न सम्पत्ति से महान होता है, आदमी जब भी महान होता है अपने अच्छे कर्म करने से महान होता है। एक बात जीवन में हमेशा याद रखना- तीन लोगों को ईश्वर कभी माफ नहीं करता, नंबर एक- उस न्यायाधीश को जो न्याय की कुर्सी पर बैठकर भी प्रलोभनवश अन्याय करता है, नंबर दो- उस अमीर को जो अमीर होकर भी कंजूस रहता है और नंबर तीन- उस संत को जो संत होकर भी दुराचार करता है। दुनिया में तीन शब्द हैं- शैतान, इंसान और भगवान। पशु अपने जीवनभर पशु ही कहलाता है और देवता पूरे जीवनभर देवता कहलाता है, एक इंसान ही है जिसके सामने भगवान ने दो रास्ते दे दिए हैं, तू चाहे तो दुनिया में पशु भी कहला सकता है, तू चाहे तो दुनिया में इंसान भी कहला सकता है और तू चाहे तो दुनिया में भगवान भी कहला सकता है। जो भला करने वाले का भी बुरा करता है, वह शैतान है। जो भला करने वाले का भला करे और बुरा करने वाले का बुरा करे वह इंसान है, और जो बुरा करने वाले का भी भला करे, वही तो है भगवान।

आरंभ में संतश्री ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, शील एवं अपरिग्रह यानि तप-त्याग इन पंच महाव्रतों पर संदेशपरक भावगीत ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम् सबके जीवन का दर्शन हो, मंगलमय जीवन हो...’ के गायन से श्रद्धालुओं को जीवन निर्माण की प्रेरणा दी।

धर्मसभा के पूर्वार्ध में डॉ. मुनिश्री शांतिप्रिय सागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को शांत-सुखी, सफल जीवन जीने के लिए श्रम योग, सम योग व सह योग के तीन मंत्र दिए। उन्होंने कहा अगर आप जीवन में सफलता चाहते हैं तो श्रम योग के मार्ग पर कदम बढ़ाने होंगे, शांति चाहते हैं तो सम योग के मार्ग पर और अगर आप संतष्टि और सुकून चाहते हैं तो आपको सह योग के मार्ग पर कदम बढ़ाने होंगे। हर इंसान सफलता, शांति और संतोष-संतुष्टि चाहता है। भगवान भी उसी का साथ दिया करते हैं जो श्रद्धापूर्वक मेहनत करता है, सफलता पानी है तो श्रद्धापूर्वक मेहनत करनी होगी। यदि मेहनत से जी चुराएंगे तो सफलता कोसों दूर ही रहेगी। सफलता का राजमार्ग श्रम योग से निकल कर आता है। काम चाहे छोटा ही क्यों न हो, उसे श्रद्धा के साथ मन लगाकर करें कामयाबी जरूर मिलेगी।

आज के अतिथिगण :
मंगलवार की दिव्य सत्संग सभा का शुभारंभ अतिथिगण पीआर गोलछा, कोमल चोपड़ा, अशोक मुकीम, छगन मूंधड़ा, राज बोथरा, अनिल लोढा, पुष्पराज वोरा, चातुर्मास समिति से विनय भंसाली, पारस बरड़िया ने दीप प्रज्जवलित कर किया। अतिथि सत्कार दिव्य चातुर्मास समिति के अध्यक्ष तिलोकचंद बरड़िया, पीआरओ समिति से महावीर तालेड़ा, विमल गोलछा व श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली द्वारा किया गया। सभी अतिथियों को श्रद्धेय संतश्री के हस्ते ज्ञान पुष्प स्वरूप धार्मिक साहित्य भेंट किया गया। सूचना सत्र का संचालन चातुर्मास समिति के महासचिव पारस पारख ने किया. धर्मसभा के आरंभ में डॉ. मुनिश्री शांतिप्रिय सागरजी द्वारा नित्य मंगल प्रार्थना- बरसा दाता सुख बरसा, आँगन-आँगन सुख बरसा. चुन-चुन कांटे नफरत के प्यारे मन के फूल खिला... से किया गया।

प्रवचन से पूर्व जीतो चेप्टर महिला मंडल द्वारा गुरुभक्ति से ओतप्रोत मधुर गीत ‘गुरुवाणी से मिला हमें ज्ञान, प्रभु का जैसे साथ मिला...’ की सामूहिक प्रस्तुति दी।  

मंगलवार को प्रवचन ‘लाइफ मैनेजमेंट: सफल जीवन की नींव’ विषय पर :
श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली, ट्रस्टीगण राजेंद्र गोलछा व उज्जवल झाबक, दिव्य चातुर्मास समिति के अध्यक्ष तिलोकचंद बरड़िया, महासचिव पारस पारख, प्रशांत तालेड़ा, अमित मुणोत ने संयुक्त जानकारी देते बताया कि जीने की कला प्रवचनमाला के व्यक्तित्व विकास सप्ताह के अंतर्गत अंतर्गत मंगलवार 19 जुलाई को सुबह 8:45 बजे से ‘लाइफ मैनेजमेंट: सफल जीवन की नींव’ विषय पर प्रवचन होगा। श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट एवं दिव्य चातुर्मास समिति ने श्रद्धालुओं को चातुर्मास के सभी कार्यक्रमों व प्रवचन माला में भाग लेने का अनुरोध किया है।



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