दान दिया संग चलेगा, बाकी बचा जंग लगेगा : ललितप्रभ महाराज

Posted On:- 2022-07-20




सत्संग प्रवचनमाला का 11वां दिवस

रायपुर (वीएनएस)। ‘‘हजारों-हजार लोगों के जीवन प्रसंग हमें यह बताते हैं कि दुनिया में धनवान बनने का यदि कोई सबसे सरल तरीका है तो वह है- करो दान तो बनोगे धनवान। दुनिया में कम तभी होता है जब आदमी बचाकर रखता है, बढ़ता तभी है जब आदमी बांटना शुरू करता है। एक दिन छोड़कर तो सबको जाना है, पर यह सदा याद रखना- ‘खाया पीया अंग लगेगा, दान दिया संग चलेगा, बाकी बचा जंग लगेगा।’’

ये उद्गार ललितप्रभ सागर महाराज ने आउटडोर स्टेडियम बूढ़ापारा में जारी दिव्य सत्संग ‘जीने की कला ’ के अंतर्गत युवाओें के लिए जारी व्यक्तित्व विकास सप्ताह के तीसरे दिन बुधवार को ‘धनवान होने के लिए कौन सा करें दान’ विषय पर व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आप सोच रहें होंगे कि क्या देने से भी आदमी का धन बढ़ता है? हमने तो यही देखा कि देने से आदमी का धन कम होता है। निकालोगे अंदर से माल तो पीछे जरूर कम होता है पर यह भी जान लो कि तुम्हारे पास देने के लिए भगवान ने केवल दो हाथ दिए हैं और जब भगवान तुम्हें देता है तो उसके पास दो नहीं हजारों हाथ होते हैं। इसीलिए यह दोहा जीवनभर याद रखिएगा- चीड़ी चोंच भर ले गई, पर नदि न घटियो नीर। दान दिया धन ना घटे, कह गए दास कबीर।

एक अत्यंत दरिद्र बालक द्वारा मासक्षमण के तपस्वी संत को सद्भावना पूर्वक दान की गई खीर के पुण्यप्रताप से अगले भव में उसके भारतवर्ष के सबसे धनवान सेठ शालीभद्र बनने के कथानक से संत ने श्रद्धालुओं को दान के शुभ परिणाम की महत्ता से अवगत कराया। उन्होंने कहा- मानव का जन्म लिया है तो हर आदमी यह मन जरूर बनाएं कि मैं भी अपने हाथों से शुभ दान, सुपात्र दान दूं, शुभ कर्म करूं, जो कुछ मैंने कमाया है क्यों न मैं उसे मानवता के-धर्म के कल्याण के लिए, क्यों न मैं श्रावक-श्राविका साधु-साध्वियों के कल्याण के लिए ज्ञान कोष में, क्यों न मैं जीव दया, अहिंसा धर्म की स्थापना के लिए और क्यों न मैं मरतों के प्राण बचाने के लिए अपने धन का पॉजीट्वि उपयोग कर लूँ।
 
दान देने के लिए अमीर होना जरूरी नहीं-
धर्म के जितने मार्ग व चरण हैं, उन सबमें सर्वोपरि, सबसे सरल, सबसे हितकारी, लोककल्याण की भावना और मानवीय हितों से जुड़ा हुआ अगर कोई धर्म है तो वो है- दान का धर्म। प्रभु श्रीमहावीर ने धर्म के जो चार चरण- दान, शील, तप और भाव बताए, उनमें सबसे पहले है दान। क्योंकि यह वो काम है जो आदमी बड़े आराम से कर सकता है। अपने मन के इस भ्रम को हटा लीजिए कि दान देने के लिए आदमी को अमीर होना जरूरी है, किसी को दान देने के लिए अमीर होना जरूरी नहीं है। केवल शुरुआत आपके हाथ से होनी चाहिए क्या दिया जा रहा है यह महत्वपूर्ण नहीं है, किस भाव व दशा के साथ दिया जा रहा है ये सबसे महत्वपूर्ण है। एक बार भाव दशा के साथ किसी ने खीर अगर किसी को दे दी तो उसकी तकदीर बदल जाती है।

जीवन का सार दूसरों की भलाई है
संतप्रवर ने कहा कि आज की खास बात यह है कि हम सब लोगों में देने की आदत जरूर होनी चाहिए। क्योंकि सरोवर हमें फल देते हैं, तरोवर हमें फल और छाया देते हैं, संतजन हमें ज्ञान व सन्मार्ग दिखाते हैं। मेघ कभी भी पानी अपने पास नहीं रखते, संतजन कभी-भी ज्ञान अपने पास नहीं रखते वे दूर-दूर चलकर लोगों के मन में ज्ञान दीप जलाते हैं। आदमी को अपने जीवन में यह संस्कार जरूर डाल लेना चाहिए कि मेरे पास जो है-जैसा है मैं एक बार अपने द्वारा भलाई के कार्यों के लिए जरूर समर्पित करूंगा। ‘अगर दूध का सार मलाई है तो हमारे जीवन का सार दूसरों की भलाई है।’ आपने अपने बच्चों को, अपने पोतों-पोतियों, नातियों को कितना दिया ये खास बात नहीं,  किंतु परमार्थ, मानवता, दीन-दुखियों के कार्य में नि:स्वार्थ भाव से अपना कितना धन लगाया, खास बात ये है। दान पुण्य दो तरह के हैं- एक तो पत्थर में लिखा दो और एक परमात्मा के नाम लिखा दो। दानवीर राजा मेघरथ, भगवान नेमीनाथ, राजा हर्ष की दानवीरता, करुणा व त्याग के प्रसंगों से प्रेरित करते उन्होंने कहा कि दान में जो सुख-सुकून है वह और कहीं नहीं।

दुनिया के सारे संत यह कह गए- तू देकर तो देख, तेरे धन में अगर अपरम्पार बढ़ोतरी न हो जाए कहना। लाखों-लाख सागर खाली हो जाएं, इतना पानी अब तक सागर से ऊपर बादलों तक जा चुका है पर यह देने की महिमा है कि सागर कभी खाली नहीं होता।

‘धरती को दिए जिसने बादल, वो सागर कभी ना रीता है, मिलता है जहां का प्यार उसे, औरों के जो आंसू पीता है...क्या मार सकेगी मौत उसे, औरों के लिए जो जीता है. मिलता है जहां का प्यार उसे, औरों के जो आंसू पीता है.’
सागर बादलों का अपना खारा पानी देता है पर खारा पानी मीठा बनकर नदियों से बहता है। हजारों सागर पानी ऊपर चला गया पर आज तक किसी ने सागर को जल दान देते देखा, कितना गुप्त दान देता है वह सागर। इससे बड़ा गुप्त दान करने वाला धरती पर कोई नहीं है। तुम देकर तो देखो सागर की तरह अगर तुम्हें वापस मीठा पानी न मिल जाए तो कहना।
 
पुण्य कमाकर साथ ले जाएं
संतश्री ने कहा कि यह हरेक जानता है कि पैसा मेहनत से कमाया जाता है, पर किस्मत वाला वह होता है जो अपने पैसे को अच्छे कार्यों में लगाने का सौभाग्य प्राप्त करता है। देने का जो आनंद है, वह और कहीं नहीं, इस आनंद को ले लो। सारे महान कार्य, पुण्य के विराट कार्य मनुष्य की उदारता, विराट ह्दयता के बलबूते होते हैं। जो औरों के काम आता है, मानवता के कल्याण के लिए सत्कर्म करता है, महान वही होता है। पुण्य से आदमी पैसा कमाता है, पैसे से वापस आदमी पुण्य कमा सकता है। फर्क सिर्फ एक लाइन का है कि पुण्य से कमाया पैसा यहीं रह जाता है और पैसे से कमाया पुण्य साथ चला जाता है। एक बात तो तय है कि आखिर में सब कुछ यहीं छोड़कर जाना है, पर आदमी अगर बुद्धिमान है तो वह सब कुछ लेकर भी जाता है। लेकर जाने के तरीके भी हैं, बशर्तें आदमी को वह तरीका आ जाए। जैसे सागर भाप बनाकर पानी को ऊपर ले जाता है, ऐसे ही आदमी पुण्य कमाकर अपने साथ ले जाता है। मरने से पहले दान धर्म का पुण्य जरूर कर लेना वरना मरते समय पछतावे के अलावा आपके पास और कुछ नहीं होगा।
 
रक्तदान न हो सका तो मरने के बाद नेत्रदान जरूर कर दो
संतप्रवर ने कहा कि हम अपने जेहन में इस बात को जरूर उतारें, मैं अपने जीवन में कोई न कोई पुण्य का काम, सत्कर्म जरूर करूंंगा. चाहे अन्नदान कर दो भूखे का पेट भर दो, गरीब को वस्त्रदान कर दो, अगर कर सकते हैं तो गरीब जरूरतमंद को औषधि का दान कर दो, हो सके तो बच्चों को ज्ञान दो, उन्हें पढ़ाई के लिए किताबों का दान कर दो, हो सके तो उनकी पढ़ाई का जिम्मा उठा लो, और कुछ नहीं तो निर्माणाधीन धर्मस्थल, तीर्थ या मंदिर में श्रम दान जरूर कर दो। और कुछ नहीं कर सकते तो साल में एक बार रक्तदान जरूर कर दो, यह भी न कर सको तो मरने के बाद नेत्रदान कर दो। कोई न कोई सत्कर्म अपने हाथों से जरूर कर लो। क्योंकि सत्कर्म से पुण्यकर्म का बंध होता रहेगा। देने से कभी कम नहीं होता, दिन दूना रात चौगुना बढ़ता ही रहता है।

आरंभ में संतश्री ने धान धर्म के लिए प्रेरित करते चंद्रप्रभ रचित भावगीत ‘सूरज हमें रोशनी देता, हम भी तो कुछ देना सीखें। जो कुछ हमें मिला है प्रभु से, उसे बांट कर खाना सीखें।’ के गायन से श्रद्धालुओं को संदेश दिया.
 
सुखी जीवन का मंत्र है एवरीथिंग इज बेस्ट: डॉ. मुनि शांतिप्रिय
धर्मसभा के पूर्वार्ध में डॉ. मुनिशांतिप्रिय सागर महाराज ने कहा कि श्रद्धालुओं को जीवन जीने की कला के सूत्र देते हुए कहा कि यदि जीवन को आनंदमय बनाना है तो जीवन का यह एक मंत्र बना लें- एवरीथिंग इज बेस्ट। इस दुनिया में अगर सबसे बड़ी तपस्या यदि कोई है तो वह है- अपने जीवन को प्रेम, शांति और मिठास, आनंद के साथ जीना। यह वह तपस्या है जो जीवन की अंतिम सांस तक चलती है। चाहे जैसी परिस्थिति हो अपनी प्रसन्नता और अपने मन के आनंद को बनाए रखना, यही जीवन की सबसे बड़ी तपस्या है।

आज के अतिथिगण
बुधवार की दिव्य सत्संग सभा का शुभारंभ अतिथिगण गौतमचंद लोढा, डॉ. अनिल कर्नावट, डॉ. मनीष लूनिया, डॉ. श्रीमती सिम्पी लूनिया, महावीर पारख, सुरेंद्र छाबड़ा, प्रेम सलूजा, शुभकरण गोलछा, सोहनलाल भंसाली, प्रकाश दस्सानी, डॉ. एच.पी. सिन्हा ने दीप प्रज्जवलित कर किया। अतिथि सत्कार दिव्य चातुर्मास समिति के अध्यक्ष तिलोकचंद बरड़िया, स्वागत समिति के अध्यक्ष कमल भंसाली व पीआरओ समिति से महावीर तालेड़ा द्वारा किया गया। सभी अतिथियों को श्रद्धेय संत के हस्ते ज्ञान पुष्प स्वरूप धार्मिक साहित्य भेंट किया गया। सूचना सत्र का संचालन चातुर्मास समिति के महासचिव पारस पारख ने किया. आरंभ में डॉ. मुनि शांतिप्रिय सागर द्वारा नित्य मंगल प्रार्थना- प्रभु तेरे चरणों की, गर धूल जो मिल जाय। सच कहता हूँ मेरी, तकदीर बदल जाये ... से दिव्य सत्संग की शुरुआत की गई।

तपस्वियों का हुआ सम्मान
पूज्य संतजनोें की निश्रा में चातुर्मासिक आराधना-साधना के क्रम में मंगलवार को 9 उपवास के तपस्वी श्रीमती प्रियंका आछा धर्मपत्नी सौरभ आछा का व बुधवार को 8 उपवास की तपस्वी कु. कीर्ति बरड़िया का बहुमान किया गया। तपस्वियों का बहुमान एसपीजी महिला विंग से श्रीमती रम्भा बाई गोलछा द्वारा किया गया।

गुरुवार को प्रवचन ‘कैसे बनाएँ खुद को 3 फैक्ट्रियों का मालिक’ विषय पर
श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली, ट्रस्टीगण राजेंद्र गोलछा व उज्जवल झाबक, दिव्य चातुर्मास समिति के अध्यक्ष तिलोकचंद बरड़िया, महासचिव प्रशांत तालेड़ा, अमित मुणोत ने संयुक्त जानकारी देते बताया कि दिव्य सत्संग महाकुंभ में युवाओं के लिए व्यक्तित्व विकास सप्ताह के अंतर्गत गुरूवार 21 जुलाई को सुबह 8:45 बजे से ‘कैसे बनाएँ खुद को 3 फैक्ट्रियों का मालिक’ विषय पर प्रवचन होगा। श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट एवं दिव्य चातुर्मास समिति ने श्रद्धालुओं को चातुर्मास के सभी कार्यक्रमों व प्रवचन माला में भाग लेने का अनुरोध किया है।



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