मनुष्यों और प्राइमेट के रक्त समूह

Posted On:- 2022-07-15




-डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

म जानते हैं कि कई लोग मरणोपरांत अपना शरीर अस्पतालों को दान कर देते हैं ताकि उनके स्वस्थ अंगों का उपयोग अन्य ज़रूरतमंद लोगों के लिए जा सके और शरीर का उपयोग अनुसंधान में हो सके। ऐसा मरणोपरांत उपयोगी सबसे आम अंग है आंखों का कॉर्निया। लेकिन रक्त दान तो व्यक्ति जीते-जी भी कर सकता है। भारत के कई शहरों में ‘ब्लड बैंक’ हैं। यहां दाताओं के रक्त को परिरक्षित रखा जाता है ताकि ज़रूरत पड़ने पर रक्ताधान में उपयोग किया जा सके।

सवाल है कि कोई व्यक्ति कितना खून दान कर सकता/सकती है। किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में खून उसके कुल वज़न का लगभग 7 प्रतिशत होता है। यदि औसत वज़न 55-65 कि.ग्रा. मानें तो शरीर में 4.7 से 5.5 लीटर खून होता है। सामान्य रक्तदान के दौरान दाता करीब 500 मि.ली. खून देता/देती है, और शरीर में इसकी पूर्ति महज 24-48 घंटे (यानी 1-2 दिन) में हो जाती है।

रक्त समूह का निर्धारण खून में कुछ एंटीजन्स की उपस्थिति (या अनुपस्थिति) से होता है। एंटीजन उन अणुओं को कहते हैं जो ग्राही शरीर के लिए पराए हों तो प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पैदा कर सकते हैं। लिहाज़ा, दाता और ग्राही के रक्त समूह का मेल करना अनिवार्य होता है।

रक्त समूह
तो रक्त कितने प्रकार का होता है? रक्त के प्रकारों को हमारी लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद ए तथा बी एंटीजन के आधार पर पहचाना जाता है। इस संदर्भ में बुनियादी शोध ऑस्ट्रिया के विएना विश्वविद्यालय के एक डॉक्टर कार्ल लैंडस्टाइनर ने किया था। उन्होंने अपने कई स्टाफ सदस्यों के खून के नमूने लिए और देखा कि उनमें से कुछ का सीरम (खून का एक घटक) खून के थक्के जमा देता है (यानी उसे अवक्षेपित कर देता है) जबकि कुछ लोगों के सीरम से ऐसी कोई समस्या नहीं होती। इस जानकारी के आधार पर उन्होंने स्वीकार्य रक्त कोशिकाएं परिभाषित कीं जिन्हें उन्होंने ए, बी और ओ कहा। हम आज भी इसी समूहीकरण का उपयोग करते हैं।

डॉ. लैंडस्टाइनर को 1930 में कार्यिकी/चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। डॉ. लैंडस्टाइनर के शोध कार्य की अत्यंत जानकारीपूर्ण समीक्षा इरान के दो वैज्ञानिकों – डॉ. दरियुश डी. फरहुद और मारजन ज़रूफ येगानेह – ने इरानियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित की है। इसमें उन्होंने अनुमान लगाया है कि भारत में रक्त समूह ए करीब 40 प्रतिशत, रक्त समूह बी करीब 25-35 प्रतिशत और रक्त समूह ओ 40-50 प्रतिशत लोगों का है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉ. जी. के. पाटीदार और डॉ. वाय. धीमान ने एक ज़्यादा विस्तृत पर्चे में ए, बी, ओ, तथा एबी समूह के वितरण का विश्लेषण कई रिपोर्ट्स के आधार पर किया है। उनके मुताबिक भारत में ए, बी, ओ तथा एबी का प्रतिशत क्रमश: 23, 34, 35 तथा 8 प्रतिशत है जबकि दक्षिण के राज्यों में ओ समूह थोड़ा अधिक (करीब 39 प्रतिशत) है।

निएंडरथल का मामला
1964 में इटालियन जेनेटिक्स वैज्ञानिक डॉ. कैवेली-स्फोर्ज़ा ने अपने सहकर्मियों के साथ न सिर्फ इटली और पड़ोसी मुल्कों में ए, बी, ओ तथा एबी समूहों के अनुपात का हिसाब लगाया बल्कि दुनिया भर के कई शोधकर्ताओं से संपर्क किया और 15 मानव आबादियों का वंशवृक्ष भी तैयार किया और पता लगाया कि उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, और सुदूर पूर्व के पोलीनेशिया में रक्त समूहों का वितरण कैसा है।

इसके अलावा, वे निएंडरथल तथा डेनिसोवा के जीवाश्म भी प्राप्त कर सके। ये जीवाश्म युरोप के कई विरासत स्थलों से थे और 40,000 से 1 लाख साल पूर्व के थे। उनके समूह ने इन आबादियों का वर्गीकरण रक्त समूह ए, बी, ओ तथा एबी के आधार पर करने में सफलता प्राप्त की।

और सिल्वाना कॉन्डेमी व साथियों के प्लॉस वन में प्रकाशित नवीनतम शोध पत्र (ब्लड ग्रुप्स ऑफ निएंडरथल एंड डेनिसोवा डीक्रिप्टेड) में बताया है कि नृतत्व विज्ञान में रक्त समूह वे पहले फीनोटायपिक चिंह थे जिनका उपयोग विश्व भर में मानव आबादियों की उत्पत्ति पता करने के लिए किया गया था - खास तौर से जब आदिम मानव दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फैल रहे थे (युरेशिया, उप-सहारा अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया व पपुआ, तथा अन्य स्थानों में)।

निएंडरथल और डेनिसोवा के रक्त के विश्लेषण से पता चलता है कि उनमें भी एबीओ समूह और कई अन्य मार्कर्स थे जिनका उपयोग हम आज रक्ताधान में मेल बैठाने के लिए करते हैं।

प्रायमेट बंदर
रोचक बात है कि अपने पर्चे में डॉ. फरहुद और डॉ. येगानेह एक अन्य रिपोर्ट का हवाला देते हैं जो डॉ. पी. क्रैम्प ने प्रायमेटोलॉजिया III (1960) में प्रकाशित की थी। इसमें बताया गया था कि प्रायमेट्स (यानी चिम्पैंज़ी, गोरिल्ला, ओरांगुटान, गिब्बन) में हम मनुष्यों के समान ही एबी, ए, बी तथा ओ समूह पाए जाते हैं।

दरअसल, हमारे रक्त समूह (ए, बी, एबी तथा ओ) का श्रेय हमारे वानर पूर्वजों के लाखों वर्ष प्राचीन रक्त समूहों को जाता है। ज़रा सोचिए इसके बारे में। हमारे जीन्स के समान हमारा खून भी हमारी विरासत है – बंदरों से लेकर आदिम मानव पूर्वजों और हाल के पूर्वजों की।
-स्रोत फीचर्स



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