रायपुर (वीएनएस)। श्रीमदराजचंद्र मिशन, धर्मपुर के तत्वाधान में रायपुर के कटोरा तालाब स्थित राज प्रेम में मुमुक्षुता का मेघधनुष विषय पर आत्मार्पित सिद्धीजी ने विशेष चर्चा की। उन्होंने क्षमा पर कहा, लोगों को कई प्रकार से क्षमा कर सकते हैं। लौकिक क्षमा ऊपरी रूप से किया जाता है। सबसे पहले तीर्थंकर भगवान से क्षमा याचना करना चाहिए। फिर सद्गुरूदेव से क्षमा मांगना चाहिए। उनकी आज्ञा का पूर्णत: पालन करना चाहिए। यदि किसी आज्ञा का पूर्णत: पालन न हो पाए तो क्षमा मांगना चाहिए। परिवार के सदस्यों से भी क्षमा मांगना चाहिए। सबसे अनिवार्य क्षमा याचना स्वयं से करनी चाहिए। क्षमा के लिए ज्ञानियों के समान तत्व दृष्टि अपनानी चाहिए। क्षमा क्रिया नहीं भाव है।
सिद्धिजी ने सत्य पर चर्चा करते हुए कहा, सत्य दो प्रकार के होते हैं। व्यवहार सत्य और परमार्थ सत्य। जो सत्य जैसा है उसे वैसा ही व्यवहार में लाया जाता है। जितना हो सके वचन गुप्ति रखना चाहिए। बोलना पड़े तो हित, मित और प्रिय वचनों का उपयोग करना चाहिए। साधु छोटे झूठ भी नहीं बोल सकते। आत्मकल्याण की दृष्टि से पर को असत्य जानना परमार्थ सत्य है। शुद्धात्मा ही परमार्थ सत्य है। आत्मा के अलावा कुछ भी मेरा नहीं है। हमें इसकी जागृति चाहिए।
सिद्धिजी ने त्याग पर चर्चा करते हुए बताया, सत्य दर्शन से राग-द्वेश बंद होते जाते हैं। सहज वस्तुओं का त्याग होता जाएगा। त्याग राग भाव का होना चाहिए। त्याग उच्च की उपलब्धि पूर्वक हो। कुछ मिले तो कुछ का त्याग हो। चित्त से त्याग होना चाहिए। जो हमारा है ही नहीं उसका त्याग अहंकार पूर्वक होता है। त्याग भाव पूर्वक होनी चाहिए। जीवन में उपलब्धि हो तो त्याग स्वयं से हो जाता है। त्याग करने उच्च का लक्ष्य बांधना चाहिए।
सिद्धिजी ने वैराग्य पर चर्चा करते हुए बताया, हाथ से छूट जाना त्याग है और हृदय से छूट जाना वैराग्य। वैराग्य में राग भाव हृदय से छूट जाता है। आत्मा की अकल्पनीय महिमा जागती है, तो वैराग्य भाव आता है। वैराग्य के लिए राग भाव पर काम करता है। मनुष्य भव अत्यंत दुर्लभ है। सिर्फ श्रवण से परिवर्तन नहीं आएगा, परिवर्तन प्रयोगात्मक अभ्यास द्वारा लाना पड़ेगा।