राजनीति मेें चुनाव जीतने के लिए कई बार ऐसे वादे कर दिए जाते हैं जो हकीकत में आसानी से पूरे नहीं किए जा सकते। वोट लेना है इसलिए कहते वक्त ऐसा कहते हैं कि इधर सरकार बनी उधर वादा पूरा हुआ। कई बार ऐसा नहीं हो पाता है। घोषणा पत्र में वादा पूरा करना जितना आसान लगता है, हकीकत में उतना आसान होता नहीं है। चाहे बिहार में की गई शराबबंदी हो,या छत्तीसगढ़ में शराबबंदी का वादा हो।सरकार के लिए उसे पूरा करना आसान तो नहीं है। शराबबंदी मतलब कई तरह की समस्याओं को निमंत्रण देना है।छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव को एक साल से ज्यादा समय ही बचा है। कांग्रेस सरकार ने कई वादे पूरे नहीं किए हैं। एक प्रमुख वादा शराबबंदी का है। अगर सरकार का इरादा शराबबंदी का होता तो वह कुच तैयारी करती दिखती। सरकार की ऐसी कोई तैयारी तो दिखती नहीं देती है। सब जानते हैं कि शराब से सरकार को बड़ी आय होती है। एक अनुमान के मुताबिक पाच हजार करोड से ज्यादा।यह कोई छोटी रकम तो नहीं है कि सरकार इसका जुगाड़़ आसानी से कर लेगी।शराबबंदी का मतलब है कि एक साथ पांच हजार करोड़ से ज्यादा की आय खत्म। आरटीआई के पता चला है कि सरकार की शराब से होने वाली आय तो हर साल बढ़ रही है, शराब की खपत जरूर कम हुई है। अगर शराबबंदी करनी है तो सरकार की आय के लिए शराब पर निर्भरता कम होनी चाहिए लेेकिन यह तो कम नहीं हुई है। शराब की खपत कम होना अच्छी बात लगती है लेकिन इसकी वजह लोगों का स्वेच्छा से शराब पीना छोडऩा नहीं है। इसकी वजह है शराब का महेगा होना है। लोग देशी व विदेशी शराब महंगी होने के कारण कम पी रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया है। इसका मतलब यह भी होता है कि शराब महंगी होने के कारण लोग सरकारी शराब तो नहीं पी रहे हैं लेकिन सस्ती अवैध शराब पी रहे हैं, या शराब की जगह कोई सस्ता नशा कर रहे हैं। सरकारी शराब की खपत के आं$कड़ से लग सकता है कि छत्तीसगड़ में लोगों ने भूपेश सरकार के समय शराब पीना छोड़ दिया है या कम कर दिया है। हकीकत इसके उल्टी भी हो सकती है। किसी भी राज्य में वैध शराब की बिक्री तो कई कारणों से कम हो जाती है।इससे खपत भी कम हो जाती है। लेकिन इसकी तुलना में अवैध शराब की बिक्री उतनी ही बढ़ जाती है। यानी कुल शराब की बिक्री राज्य में जितनी होती रहती है,उतनी तो होती ही रहती है। आंकड़ो से सिर्फ भ्रम पैदा होता है कि शराब की राज्य में खपत कम हो गई है। राज्य में बड़ी संख्या में शराब पीने वाले हैं तो शराबबंदी भी एक बड़ी समस्या है। क्योंकि वह शराब के आदी हैं्। राज्य में शराब की मांग तो उतनी ही रहेगी,जितनी है। सरकारी शराब की बिक्री बंद हो जाती है तो राज्य में अवैध शराब की बिक्री को रोकना एक बड़ी चुनौती होगी। बिहार में ऐसा ही हुआ ैहै। वहां कई महीनों तक पुलिस का काम शराब की अवैध बिक्री को रोकना। राज्य के बाहर से शराब पीकर आने से रोकना। शराबियों पर कार्रवाई से परिवार में नाराजगी की बढऩा। शराबबंदी से दूसरी समस्या यह पैदा होगी कि लोग शराब की जगह दूसरा नशा करने लगेंगे।यानी राज्य में शराबबंदी होने पर राज्य नशाुमुक्त तो नहीं होगा। बिहार इसका उदाहरण है वहां शराबबंदी की गई है लेकिन बिहार नशामुक्त हो गया है ऐसा कोई कह नहीं सकता। छत्तीस$गढ़ की कांग्रेस सरकार के लिए आने वाला समय आर्थिक परेशानी को हो सकता है। राज्य सरकार को जीएसटी क्षतिपूर्ति पांच हजार करोड़ जून से मिलनी बंद हो गईॉ है।इसलिए सरकार शराबबंदी कर अपनी आय और कम तो नहीं कर सकती। उसे कोई न कोई रास्ता तो निकालना होगा।आने वाले दिनो में पता चलेगा कि भूपेश बघेल ने क्या रास्ता निकाला है।