रायपुर (वीएनएस)। राष्ट्रसंत श्रीललितप्रभ सागरजी महाराज का गुरुवार को भिलाई-3 बाजार चौक स्थित जैन मंदिर उपाश्रय में पदार्पण हुआ। इस पावन प्रसंग पर राष्ट्रसंत, मुनि व साध्वी भगवंतों का भव्य स्वागत किया गया। यहां एक वृहद धर्मसभा हुई, जिसमें अंचल के विभिन्न स्थानों से श्रद्धालु पहुंचे। रायपुर श्रीसंघ से प्रमुख रूप से श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली सम्मिलित हुए। उन्होंने बताया कि राष्ट्रसंत कल शुक्रवार सुबह भिलाई-3 से पग विहार कर सुबह 8 बजे कैवल्यधाम कुम्हारी पहुंचेंगे। चातुर्मास के अवसर पर उनका 10 जुलाई रविवार को रायपुर शहर में सुबह 8 बजे दादावाड़ी एमजी रोड में भव्य मंगल प्रवेश होगा,जहां से गुरुजन शोभायात्रा के साथ इंडोर स्टेडियम बूढ़ापारा पहुंचेंगे, जहां उनके 52 दिवसीय विराट प्रवचन माला और सत्संग महाकुंभ का श्रीगणेश होगा जिसमें राजधानी रायपुर समेत प्रदेशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होंगे।
सोच को ऊंची हो तो हम एवरेस्ट से भी ज्यादा ऊंचे उठ सकते हैं: राष्ट्रसंत भिलाई-3 की धर्मसभा में श्रद्धालुओं को जीवन जीने की कला सिखाते हुए संतप्रवर ने कहा कि नकारात्मक सोच तोड़ती है, सकारात्मक सोच जोड़ती है। साधारण किस्म के लोग गिलास आधा खाली देखते हैं, समझदार लोग गिलास आधा भरा देखते हैं। ऊँचाई छूने वाले लोग गिलास पूरा भरा देखते हैं। ताड़ासन करके भी हम अपनी हाईट 2 इंच से ज्यादा नहीं बढ़ा सकते, पर सोच को ऊँची उठाकर एवरेस्ट से भी ज्यादा ऊँचे हो सकते हैं।
सुंदर सोच परम पिता की सबसे अच्छी पूजा है उन्होंने कहा कि ईश्वर के घर से हम में से हर इंसान को एक बहुत बड़ी ताकत मिली है, वह है- सोचने-समझने की क्षमता। अपनी इस एक क्षमता के बलबूते इंसान संसार के समस्त प्राणियों में सबसे ऊपर है। हम सोच सकते हैं इसीलिए हम इंसान हैं। यदि हमारे जीवन से सोचने की क्षमता को अलग कर दिया जाए तो हमारी औकात किसी चौपाये जानवर से अधिक न होगी। उन्होंने कहा कि आपकी सोच आपके विचारों को, विचार वाणी को, वाणी व्यवहार को, व्यवहार आपके व्यक्तित्व को प्रेरित और प्रभावित करता है। एक सुंदर और खूबसूरत व्यक्तित्व, व्यवहार, वाणी और विचारों का मालिक बनने के लिए अपनी सोच को कुतुबमीनार जैसी ऊँची, ताजमहल जैसी सुन्दर और देलवाड़ा के मन्दिरों जैसी खूबसूरत बनाइए। उन्होंने कहा कि सोच को सुन्दर बनाना न केवल अपने संबंध, सृजन और आभामंडल को सुन्दर तथा प्रभावी बनाने का तरीका है बल्कि सुन्दर सोच परमपिता परमेश्वर की सबसे अच्छी पूजा है। उन्होंने कहा कि एक अच्छी, सुन्दर और सकारात्मक सोच स्वयं ही महावीर का समवसरण, बुद्ध का स्वर्ण-कमल, राम का रामेश्वरम और कृष्ण का वृंदावन धाम है।
राष्ट्र-संत ने सभी श्रद्धालुओं को निवेदन किया कि जरा दो मिनट के लिए इस संसार के प्रति अच्छी सोच लाकर देखिए, आपको किसी दूसरे स्वर्ग को पाने की बजाय इसी धरती को स्वर्ग जैसा सुन्दर बनाने की तमन्ना जग जाएगी। उन्होंने कहा कि लाल बहादुर शास्त्री और अब्दुल कलाम जैसे लोग गरीब घर में पैदा होकर भी और धीरूभाई अंबानी इंटरमीडियट होकर भी शीर्ष पर पहुँच गए, तो फिर हम ही मुँह लटकाए मायूस क्यों बैठे हैं। जीवन में फिर से जोश जगाएँ और कामयाबी के आसमान को छूने के लिए अभी इसी वक्त छलांग लगा दें।
संतप्रवर ने कहा कि संकीर्ण सोच, स्वार्थी सोच, निराशा भरी सोच, मंथरा सोच, घमंडी सोच - सोच की विकृतियाँ हैं। इन विकृतियों के झाड़-झंखारों को अपने मन के खेत से उखाड़ फेंकिए। आपके दिमाग की जमीन उपजाऊ है, नई ऊर्जा और उमंग के साथ सबको मधुर फल देने वाले बीज बोइए। किसी में कोई कमी है तो उससे समझौता कर लो। र्इंट के रूप में न सही, मिट्टी के रूप में तो सबका उपयोग किया ही जा सकता है।
सॉरी कहने से प्रेम के पुल बन सकते हैं: डॉ. मुनि शांतिप्रिय इससे पूर्व डॉ. मुनि श्री शांतिप्रिय सागर जी महाराज ने कहा कि खुद से गलती हो गई तो माफी माँग लीजिए और दूसरे से गलती हो गई तो माफ कर दीजिए। भला जब सॉरी कहने से प्रेम के पुल बन सकते हैं तो लम्बे समय तक द्वेष की दीवारों से सिर क्यों टकराया जाए? फालतू की माथाफोड़ी में हाथ मत डालिए। किसी के काम में तभी दखल दीजिए, जब आपसे पूछा जाए। अनावश्यक टोका-टोकी, टीका-टिप्पणी आपके दुश्मन बढ़ाएगी और जिसके दुश्मन जितने ज्यादा, सिरदर्द उसका उतना ही ज्यादा। उन्होंने कहा कि समझौतावादी नजरिया अपनाइए। जैसा माहौल मिले, उसमें ढल जाइए। इस दौरान निपुणा मंडल प्रमुखा पूज्या साध्वी राजेश श्रीजी महाराज ने भी धर्म की महिमा पर प्रेरक उद्गार व्यक्त किए।