टोक्यो (वीएनएस)। जापान को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री मिल गई हैं। 64 वर्षीय रूढ़ीवादी साने ताकाइची को जापानी संसद की निचली सदन ने प्रधानमंत्री चुना है। ये देश के राजनीतिक इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना है। वह आज शाम को जापान के 104वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेंगी। चीन की मुखर आलोचना के लिए चर्चित ताकाइची ने सदन में 465 में से 237 वोट पाकर बहुमत हासिल किया है। ताकाइची को उच्च सदन से समर्थन मिल सकता है।
ताकाइची को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बधाई दी है। उन्होंने एक्स पर जापानी भाषा में लिखा, 'मैं सुश्री साने ताकाइची को जापान की प्रधानमंत्री नियुक्त होने पर हार्दिक बधाई देता हूं। मैं जापान और भारत के बीच बनी विशेष रणनीतिक वैश्विक साझेदारी को और मज़बूत बनाने के लिए मिलकर काम करने के लिए उत्सुक हूं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उसके बाहर शांति, स्थिरता और समृद्धि प्राप्त करने के लिए मज़बूत जापान-भारत संबंध एक अनिवार्य तत्व हैं।
जापान को पिछले 5 साल में 5वां नया प्रधानमंत्री मिला है। ताकाइची प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा की जगह लेंगी, जिन्होंने सितंबर, 2024 में पद संभाला था। इशिबा के कार्यकाल में पार्टी ने दोनों सदनों में बहुमत खो दिया। पार्टी के भीतर से दबाव बढ़ने पर उन्होंने 7 सितंबर को इस्तीफा दे दिया था। 2020 में शिंजो आबे के बाद से कोई भी प्रधानमंत्री लंबे समय तक पद पर नहीं रहा। उनके बाद योशिहिदे सुगा, फुमिया किशिदा और शिगेरु इशिबा प्रधानमंत्री रहे।
जापान की 'आयरन लेडी' ताकाइची का जन्म 7 मार्च, 1961 को हुआ था। वह पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की करीबी हैं। वर्ष 1993 में पहली बार सांसद बनी ताकाइची ने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई की है। वह सरकार में आंतरिक मामलों और आर्थिक सुरक्षा विभाग संभाल चुकी हैं। वर्ष 2024 में घोटालों से त्रस्त सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) के अध्यक्ष पद के चुनाव में वह दूसरे स्थान पर थीं। ताकाइची ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की प्रशंसक हैं।
ताकाइची भारत को विशेष रणनीतिक साझेदार मानती हैं। वे क्वाड और हिंद-प्रशांत में सहयोग बढ़ाने पर जोर देती रही हैं। हालांकि, रूढ़िवादी विचारों और द्वितीय विश्व युद्ध की विरासत से जुड़े मुद्दों पर उनका रुख आक्रामक है। उन्होंने कई बार यासुकुनी तीर्थस्थल जाने की बात कही है, जहां जापानी सैनिकों की स्मृति में पूजा होती है। चीन और दक्षिण कोरिया ने इस पर आपत्ति जताई है। कट्टर रूढ़ीवादी होने के कारण उनका नजरिया क्षेत्रीय संतुलन के मामले में विवादित होगा।
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