न्यूयार्क।बहरीन ने ईरान पर आरोप लगाया कि उसने नागरिक ठिकानों, जल संयंत्र और बंदरगाहों को निशाना बनाया जो अंतरराष्ट्रीय कानून का सीधा उल्लंघन है। इस बीच इस संकट का असर सिर्फ राजनीतिक तक सीमित नहीं है।
स्टेट ऑफ होर्मुज को लेकर तनाव लगातार बढ़ते जा रहा है। खाड़ी देशों ने इस रणनीतिक मार्ग को खोलने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल का दरवाजा खटखटाया। बहरीन की अगुवाई में लाए गए इस प्रस्ताव में साफ तौर पर मांग की गई थी कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री आवाजाही को सुरक्षित रखने के लिए जरूरत पड़ी तो सैन्य कारवाही की अनुमति दी जाए। लेकिन जैसे ही मामला वोटिंग की ओर बढ़ा दुनिया की बड़ी ताकतें आमने-सामने आ गई। रूस, चीन और फ्रांस तीनों स्थाई सदस्यों ने इस प्रस्ताव के उस हिस्से पर सख्त आपत्ति जता दी जिसमें सभी आवश्यक साधनों यानी सैन्य बल के इस्तेमाल की बात कही गई थी। इन देशों का साफ कहना है कि इस तरह की भाषा सीधे टकराव को और भड़का सकती है और क्षेत्र को बड़े युद्ध की ओर धकेल सकती है। इस विरोध के चलते प्रस्ताव फिलहाल अटक गया है।
दरअसल यह पूरा विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब 28 फरवरी 2026 को ईरान ने अमेरिका और इजराइल के साथ बढ़ते संघर्ष के बीच होर्मुज ट्रेड को बंद कर दिया। यह वो समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का करीब 20% तेल और गैस गुजरता है। इसके बंद होते ही वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर सीधा असर पड़ा। तेल की कीमतें बढ़ी, शिपिंग महंगी हुई और बीमा लागत भी आसमान छूने लगी। खाड़ी देशों का तर्क है कि यह सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था से जुड़ा मामला है। इसलिए बहरीन और उसके सहयोगी देशों ने प्रस्ताव में यह मांग रखी कि बहुराष्ट्रीय नौसैनिक बलों को इस मार्ग को सुरक्षित करने के लिए कारवाई की खुली छूट दी जाए। लेकिन दूसरी तरफ मैक्रोन जैसे नेताओं का मानना है कि सैन्य विकल्प अवास्तविक है। उनका कहना है कि अगर इस तरह की कारवाई होती है तो ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और उसकी बैलस्टिक मिसाइलों का खतरा और बढ़ सकता है जिससे हालात और बिगड़ेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम ने सुरक्षा परिषद के भीतर भी गहरे मतभेद उजागर कर दिए हैं। सिर्फ स्थाई सदस्य ही नहीं बल्कि अस्थाई सदस्य देशों के बीच भी इस मुद्दे पर एक राय नहीं बन पाई। इधर खाड़ी देशों का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है। बहरीन ने ईरान पर आरोप लगाया कि उसने नागरिक ठिकानों, जल संयंत्र और बंदरगाहों को निशाना बनाया जो अंतरराष्ट्रीय कानून का सीधा उल्लंघन है। इस बीच इस संकट का असर सिर्फ राजनीतिक तक सीमित नहीं है। क़तर जैसे देशों को अपने ऊर्जा उत्पादन पर रोक लगानी पड़ी जिससे अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा। वहीं क्षेत्र में हमलों और जवाबी कारवाई के चलते आम नागरिक भी इसकी कीमत चुका रहे हैं। कुल मिलाकर तस्वीर साफ है। एक तरफ खाड़ी देश हैं जो तुरंत और सख्त कारवाई चाहते हैं और दूसरी तरफ वैश्विक ताकतें हैं जो युद्ध के और विस्तार से बचना चाहती हैं। और स्टेट अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।
और सबसे बड़ी बात जहां पहले इस रूट से 100 से 150 जहाज रोजाना गुजरते थे। अब वो आंकड़ा करीब पांच से सात जहाजों पर आ गया है। तो कहीं ना कहीं दिक्कत सभी देशों के लिए है। हालांकि अगर यहां पर हम भारत के नजरिए से इसे देखें तो भारत के कई जहाज इस बीच हुरमुस को पार कर चुके हैं।
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