ईरान में विदेश मंत्री पद से अब्बास अराघची को हटा सकते हैं राष्ट्रपति

Posted On:- 2026-05-01




तेहरान।ईरान में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के बीच सत्ता संघर्ष गहरा गया है, जिसके केंद्र में विदेश मंत्री अब्बास अराघची हैं, जिन पर परमाणु वार्ता में सैन्य नेतृत्व के निर्देशों का पालन करने का आरोप है और उन्हें पद से हटाया जा सकता है।

ईरान की सत्ता व्यवस्था इन दिनों गंभीर आंतरिक खींचतान से गुजर रही है, जहां राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में विदेश मंत्री अब्बास अराघची हैं, जिन पर राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ का भरोसा कमजोर पड़ता दिख रहा है। दोनों शीर्ष नेताओं द्वारा उन्हें पद से हटाने की संभावना जताई जा रही है, जिससे देश के भीतर सत्ता संतुलन को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति और संसद अध्यक्ष का मानना है कि अराघची ने हाल के सप्ताहों में सरकार की नीतियों को लागू करने वाले मंत्री की बजाय इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के कमांडर अहमद वाहिदी के सहयोगी की तरह काम किया है। आरोप है कि उन्होंने संवेदनशील परमाणु वार्ताओं के दौरान वाहिदी के निर्देशों का पालन किया और राष्ट्रपति को इस बारे में पूरी जानकारी नहीं दी। इससे कार्यपालिका के भीतर असंतोष बढ़ा है और राष्ट्रपति ने अपने करीबी सहयोगियों को संकेत दिया है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो वह कड़ा कदम उठा सकते हैं।

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब ईरान पहले से ही राजनीतिक और सैन्य संस्थानों के बीच गहरे मतभेदों से जूझ रहा है। जारी संघर्ष और उसके आर्थिक प्रभावों ने इन मतभेदों को और तीखा कर दिया है। पहले की रिपोर्टों में भी यह सामने आया था कि राष्ट्रपति पेजेशकियन और कमांडर अहमद वाहिदी के बीच युद्ध प्रबंधन और उसके आर्थिक असर को लेकर गंभीर असहमति है। राष्ट्रपति का मानना है कि युद्ध के कारण आम लोगों की आजीविका और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ रहा है, जबकि सैन्य नेतृत्व सुरक्षा प्राथमिकताओं को सर्वोपरि मानता है।

सूत्रों ने यह भी बताया कि राष्ट्रपति खुद को एक तरह के राजनीतिक गतिरोध में फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें महत्वपूर्ण सरकारी नियुक्तियों पर भी पूरा अधिकार नहीं मिल पा रहा है। दूसरी ओर, वाहिदी का तर्क है कि युद्धकालीन परिस्थितियों में संवेदनशील पदों का नियंत्रण सीधे रिवोल्यूशनरी गार्ड के हाथ में होना चाहिए। इस टकराव ने सरकार के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।




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