भोपाल (वीएनएस)। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार की विवादित भोजशाला को वाग्देवी मंदिर बताया है। सुनवाई के दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों के याचिकाकर्ताओं ने दलीलें पेश कीं और स्मारक में अपने-अपने समुदाय के लोगों के लिए उपासना का विशेष अधिकार मांगा। फिलहाल यह स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नियंत्रण में है। हाई कोर्ट ने मामले से जुड़ी 5 याचिकाओं पर लंबी सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
कोर्ट ने कहा, ऐतिहासिक साहित्य स्थल विवाद के चरित्र को स्थापित करते हैं कि ये क्षेत्र भोजशाला था, जो परमार वंश के राजा भोज से संबंधित संस्कृत शिक्षा का केंद्र था। क्षेत्र का धार्मिक चरित्र वाग्देवी सरस्वती के मंदिर के साथ भोजशाला माना जाता है। पीठ 2003 के ASI के उस आदेश को रद्द करती है, जो परिसर में पूजा करने के लिए हिंदुओं के अधिकारों को प्रतिबंधित करता है और मुस्लिमों को नमाज अदा करने की अनुमति देता है।
कोर्ट ने कहा, मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए अगर प्रतिवादी धार के भीतर भूमि आवंटन या मस्जिद के निर्माण के लिए आवेदन प्रस्तुत करता है, तो राज्य आवेदन पर विचार कर सकता है। कोर्ट ने विवादित भोजशाला का संरक्षण ASI को देते हुए कहा, याचिकाकर्ता द्वारा देवी सरस्वती की मूर्ति को लंदन संग्रहालय से लाकर भोजशाला परिसर में स्थापित करने के लिए राहत का दावा किया गया है। सरकार इस पर विचार कर सकती है।
धार में 800 साल पुरानी भोजशाला को लेकर हिंदू-मुस्लिम के बीच विवाद है। हिंदू इसे सरस्वती मंदिर, जबकि मुस्लिम कमाल मौला मस्जिद बताते हैं। हिंदू संगठन बताते हैं कि राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला में सरस्वती सदन 1,000 वर्ष पूर्व शिक्षा का बड़ा संस्थान था। राजवंश काल में मुस्लिम समाज को नमाज के लिए अनुमति दी गई। 1951 में भोजशाला को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा प्राप्त है। हर साल यहां बसंत पंचमी पर पूजा और शुक्रवार को नमाज होती है।
2003 में हिंसा के बाद से भोजशाला में हर मंगलवार और बसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदू समुदाय पूजा करता है। वहीं, शुक्रवार यानी जुमे को मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज पढ़ते हैं।
हालांकि, जब-जब बंसत पंचमी शुक्रवार के दिन आती है, तब-तब विवाद की स्थिति पैदा होती है। इस साल, 2013 और 2016 में भी बसंत पंचमी और शुक्रवार साथ होने पर तनाव की स्थिति बनी थी।
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