नई दिल्ली (वीएनएस)। पेरिस जलवायु समझौते के एक दशक बाद भी कई विकसित देश अपने तय जलवायु लक्ष्यों से पीछे चल रहे हैं, जबकि भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा है। 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर' (CEEW) की नई रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि यूरोपीय संघ (EU), अंब्रेला ग्रुप और एनवायरनमेंटल इंटीग्रिटी ग्रुप (EIG) के कई सदस्य देश 2030 और 2035 के उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों को हासिल करने की राह से भटक चुके हैं।
बॉन, जर्मनी में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु बैठक (SB64) के दौरान जारी रिपोर्ट ‘Holding up the Mirror: Tracking Climate Action across UNFCCC Negotiating Groups in the Era of Geopolitical Uncertainty’ के अनुसार, विकसित देशों के ये समूह 2030 तक अपने निर्धारित लक्ष्यों की तुलना में करीब 9 प्रतिशत और 2035 तक लगभग 19 प्रतिशत अधिक उत्सर्जन कर सकते हैं।
रिपोर्ट बताती है कि यूरोपीय संघ को अपने 2030 लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उत्सर्जन कटौती की मौजूदा रफ्तार को लगभग चार गुना बढ़ाना होगा। वहीं अमेरिका और कनाडा को भी हर साल 5 से 6 प्रतिशत अतिरिक्त कटौती सुनिश्चित करनी होगी। इसके विपरीत, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे BASIC देशों ने उत्सर्जन वृद्धि की गति को नियंत्रित करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
रिपोर्ट के अनुसार, BASIC देशों ने 2016 से 2022 के बीच पुरानी प्रवृत्तियों को जारी न रखते हुए सामूहिक रूप से 8.5 गीगाटन CO₂ समतुल्य उत्सर्जन कम किया। यह 2022 के कुल वैश्विक उत्सर्जन के 10 प्रतिशत से भी अधिक के बराबर है। वहीं विकसित देशों के प्रमुख समूह इसी अवधि में केवल 3.7 गीगाटन उत्सर्जन कटौती ही कर सके।
भारत का प्रदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को कुल स्थापित क्षमता के 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया है। साथ ही देश ने अपनी जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में करीब 37 प्रतिशत की कमी दर्ज की है और लगभग 2.4 अरब टन CO₂ समतुल्य अतिरिक्त कार्बन सिंक भी तैयार किया है।
चीन ने भी अपने पवन और सौर ऊर्जा क्षमता संबंधी 2030 के लक्ष्य पहले ही पूरे कर लिए हैं। वहीं दक्षिण अफ्रीका का वर्तमान उत्सर्जन स्तर उसके 2030 लक्ष्य की निर्धारित सीमा के भीतर पहुंच चुका है।
सीईईडब्ल्यू के विशिष्ट फेलो और भारत के पूर्व मुख्य जलवायु वार्ताकार रवि एस. प्रसाद ने कहा कि अब जलवायु नेतृत्व केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि वादों को पूरा करने की क्षमता से तय होगा। उन्होंने कहा कि विकसित देशों को अपने उत्सर्जन में तेज कटौती के साथ विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता भी बढ़ानी होगी।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि आकलन किए गए विकसित देशों में केवल कजाकिस्तान, जॉर्जिया और यूक्रेन ही ऐसे देश हैं जो 2030 और 2035 दोनों जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में सही रास्ते पर हैं। नॉर्वे के 2030 और न्यूजीलैंड के 2035 लक्ष्य पूरे होने की संभावना जताई गई है।
अध्ययन का निष्कर्ष है कि पेरिस समझौते की सफलता अब नए वादों पर नहीं, बल्कि मौजूदा प्रतिबद्धताओं को लागू करने की क्षमता पर निर्भर करेगी। रिपोर्ट ने विकसित देशों से घरेलू स्तर पर तेज जलवायु कार्रवाई और विकासशील देशों के लिए पर्याप्त वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।
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