दिमागी नक्सली’यानी संविधान को नहीं मानने वाले

Posted On:- 2026-08-18




नई दिल्ली(वीएनएस)।लालकिले की प्राचीर से होने वाले प्रधानमंत्री के सालाना संबोधन पर चर्चाएं और बहसें होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री द्वारा प्रयुक्त दो शब्दों ‘दिमागी नक्सल’ ने चर्चाओं की तासीर बढ़ा दी है। लालकिले की प्राचीर से देश के संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने जो कहा, उस पर एक बार फिर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "21वीं सदी में यह बहुत ज़रूरी है कि हम दशकों पुरानी उन चुनौतियों को खत्म करें, जिन्होंने देश को पीछे रखा है। नक्सलवाद और माओवाद ने लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया है। उन्होंने अनगिनत माताओं के युवा बेटों को छीन लिया और देश भर के परिवारों के सपनों को चकनाचूर कर दिया। लगभग चार दशकों तक, नक्सलवाद ने भारत के बड़े हिस्सों और उसकी आबादी के एक बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में रखा, बंदूक के दम पर शासन किया और संविधान की धज्जियां उड़ाईं। आज हथियारों वाले नक्सल से बड़ी चुनौती दिमागी नक्सली ज्यादा खतरनाक हैं, इससे देश को बचाना होगा।
कभी देश के एक तिहाई हिस्से को लाल गलियारे के रूप में जाना जाता था। कभी माओवादियों और नक्सलियों की समानांतर सत्ता नेपाल से लेकर आंध्र प्रदेश तक समानांतर सत्ता चलती थी। उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों कों ‘ पशुपति से तिरूपति तक ’ के नाम से जाना जाता था। देश का गृहमंत्रालय की कमान संभालने के बाद अमित शाह ने 31 मार्च तक देश को लाल गलियारे से मुक्त कराने का वादा किया था। अमित शाह की दोहरी रणनीति के चलते यह गलियारा अब नक्सली हिंसा और आतंक से मुक्त हो चुका है। इसे संयोग कहें या कुछ और, जिस वक्त लाल किले से प्रधानमंत्री देश को संबोधित कर रहे थे, उसी वक्त लाल गलियारे वाले उड़ीसा के मलकानगिरी और छत्तीसगढ़ के बस्तर के कई गांवों में पहली बार तिरंगा लहरा रहा था। उन तिरंगों को सलामी देने वालों में वे लोग भी भारतीय संविधान के तहत हासिल पुलिस या होमगार्ड की वर्दी में शामिल थे, जो हाल के दिनों तो इन इलाकों में भारतीय संविधान को नहीं मानते थे, जिनका मानना था कि सत्ता बारूद से निकलती है। अब भी उनके हाथों में बंदूकें हैं, जिनके ट्रिगर पर अब भी उनकी ही उंगलियां हैं,लेकिन अब वे भारतीय संविधान की मर्यादा से बंध चुकी हैं। 
वैसे दिमागी नक्सली कोई नए शब्द नहीं है। करीब दशक भर पहले फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने इसी तरह अर्बन नक्सली शब्द का इस्तेमाल किया था। तब से वामपंथी हिंसा का विरोधी मानस इन शब्दों का खुलकर प्रयोग करता रहा है। वह मानता रहा है कि देश में जब भी अराजक परिस्थितियां बनती हैं, उसके पीछे अर्बन नक्सलियों की ही सोच काम करती है। कह सकते हैं कि दिमागी नक्सली शब्द ने उन्हीं शब्दों को नई पहचान दे दी है। देश का अधिसंख्य बौद्धिक समाज शायद ही इससे इत्तेफाक रखता हो, लेकिन अतीत में यह वर्ग ‘दबाव समूह’ के रूप में काम करता रहा है। छह अप्रैल 2020 को दंतेवाड़ा में घात लगाकर नक्सलियों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 75 और छत्तीसगढ़ पुलिस के एक सवाल को बारूदी सुरंगों से उड़ा दिया था। इस घटना के बाद देश का बड़ा वर्ग सदमे में था। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने नक्सलियों को सबक सिखाने के लिए सैनिक कार्रवाई करने की ठान ली थी। उस दौरान भी दिमागी नक्सलियों को विश्वविद्यालयों और दूसरे संस्थानों में चिन्हित करने की प्रक्रिया चली थी। लेकिन शहरों में वामपंथी उग्रवाद के समर्थक लोगों के प्रबल विरोध के चलते मनमोहन सरकार सैनिक कार्रवाई से पीछे हट गयी थी। हालाकि इस घटना के तीन साल एक महीने बाद 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में घात लगाकर नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस के तकरीबन समूचे नेतृत्व को उड़ा दिया था। 
भुक्तभोगी होने के बावजूद कांग्रेस की अगुआई वाली केंद्रीय सरकार ने नक्सलियों को नेस्तनाबूद करने के लिए न तो ठोस रणनीति बना सकी और न ही रोक लगाने में कामयाब हुई। वह सिर्फ 'रोकथाम' की रणनीति पर चलती रही, लेकिन अमित शाह ने इसे बदलकर 'पूरी तरह खत्म करने' की रणनीति को अपनाया। इसके तहत, 'वामपंथी उग्रवाद’ के प्रति 'ज़ीरो टॉलरेंस' नीति बनाई गई। देश को नक्सल मुक्त करने के राष्ट्रीय लक्ष्य के तहत संवाद, सुरक्षा और समन्वय पर जोर दिया। खुफिया जानकारी पर आधारित ऑपरेशन किए जाने लगे।  केंद्रीय और राज्य बलों के बीच बेहतर तालमेल बनाया गया और जरूरत के हिसाब से वित्तीय मदद के लिए खजाना खोला गया। इसके साथ ही मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों के पुनर्वास की व्यवस्था को भी जारी रखा गया। खुफिया जानकारी ही थी, कि बसवराजू, पतिराम मांझी, गणेश उइके और मिलिंद तेलतुंबडे जैसे कई बड़े माओवादी नेताओं को सुरक्षा बलों ने घेर कर ढेर कर दिया। सुरक्षा बलों के लगातार दबाव के चलते छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण हुए। हाल ही में सफल माने जा रहे काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में पीछे से वामपंथी उग्रवाद समर्थक ताकतों के हाथ की चर्चाएं रहीं। बीस जुलाई के संसद मार्च के दिन हुई हिंसा के पीछे दिल्ली पुलिस पेशेवर अपराधियों के साथ ही वामपंथी संगठनों के हाथ को भी मान रही है। सरकार का मानना है कि हथियार बंद नक्सलियों को पहचानना और उनका मुकाबला आसान है, बनिस्बत समाज के बीच उनकी जैसी मानसिकता का सामना आसान नहीं है। 



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