धर्म के लिए पाप और पाप के लिए धर्म करना महाअनाचार : मुनि संवेगरत्न सागर

Posted On:- 2026-08-22




रायपुर (वीएनएस)। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की चातुर्मासिक प्रवचनमाला में शुक्रवार को मुनिसंवेगरत्न सागर जी म.सा. ने धर्म और आचरण को लेकर श्रावकों को सावधान किया। मुनिश्री ने कहा कि धर्म के लिए कभी पाप नहीं करना चाहिए और पाप के लिए कभी धर्म नहीं करना चाहिए। ऐसा करना महाअनाचार है। यदि जीव इन महाअनाचारों का सेवन करता है तो वह दुख, दुर्गति और पीड़ा के चक्रव्यूह में फंस जाता है। ये अनाचार की भूमिका के अंतिम दो पड़ाव हैं।

उन्होंने कहा कि मन के चौकीदार बनो और उस पर हमेशा चौकसी रखो। मन पर सावधानी रही तो जीवन सद्गति की ओर बढ़ेगा, लेकिन मन को खुला छोड़ दिया तो दुख, दुर्गति और पीड़ा का सर्जन होगा। मन में अनाचार के विचार प्रवेश न करें, इसके लिए सदैव जागृत रहना जरूरी है। 

मोक्ष लक्ष्य हो तो बदल जाता है ध्यान 

मुनिश्री ने कहा कि जिसका लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है, उसके जीवन में कुदर्शन ध्यान के स्थान पर सुदर्शन ध्यान, अनाचार ध्यान के स्थान पर आचार ध्यान और अज्ञान ध्यान के स्थान पर ज्ञान ध्यान प्रवेश करता है। व्यक्ति व्यवहार में छोटी-छोटी बातों को लेकर सावधान रहता है, लेकिन आत्मा के प्रति उतनी ही सावधानी नहीं रखता। आत्मकल्याण के लिए इस दृष्टि को बदलना जरूरी है।

परमात्मा के वचन जीवन को करते हैं मर्यादित
मुनिश्री ने कहा कि परमात्मा के वचनों का सानिध्य जिस जीव को मिल जाता है, वह अपने जीवन को मर्यादित कर लेता है। पूर्व में किए गए पाप बंधों की तप के माध्यम से निर्जरा करते हुए जीव आगे बढ़ता है। सम्यक ज्ञान का संपर्क होने पर जीवन सद्गति की ओर अग्रसर होता है। आत्मा को पतन से बचाने के लिए बुद्धि की मर्यादा में एक रेखा खींचना आवश्यक है, तभी जीवन में सही और गलत स्पष्ट हो सकेगा।

मृत्यु को महोत्सव मानने वाला नहीं भटकता 
मुनिश्री ने कहा कि जिस व्यक्ति के मन में मृत्यु को महोत्सव बनाने का भाव जाग जाता है, वह अनाचार ध्यान के मार्ग पर नहीं जाता। मन का मालिक हो या मन का गुलाम, अंततः हर जीव को इस संसार से जाना है। इसलिए जीवन रहते मन को साधना और आत्मा के कल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

पात्र के लिए है देशना का दान 
मुनिश्री ने कहा कि परमात्मा ने देशना का व्यवहार और देशना के दान का मार्ग बताया है। देशना का दान भी पात्र व्यक्ति को ही देना चाहिए। बिना पात्रता के दी गई देशना कार्यकारी नहीं होती। धर्मसभा में पहुंचने वाले श्रद्धालु उत्तम कुल और जिन शासन की प्राप्ति जैसे सौभाग्य लेकर आए हैं। देव, गुरु और धर्म के सानिध्य में रहकर जो व्यक्ति अपना कल्याण करता है, वह दूसरों के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करता है।



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