क्रोध पर विजय पाने के लिए मन में हो क्षमा भाव : मुनि संवेगरत्न सागर

Posted On:- 2026-09-02




रायपुर (वीएनएस)। क्रोध मनुष्य की शांति और विवेक को नष्ट कर देता है। क्रोध पर विजय पाने के लिए मन में क्षमा का भाव विकसित करना जरूरी है। जब व्यक्ति दूसरों की गलतियों को क्षमा करना सीख जाता है, तब उसके भीतर का तनाव और आक्रोश धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। ये सीख मुनि संवेगरत्न सागर ने धर्मसभा में दी। 

विवेकानंद नगर के ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में मंगलवार को मुनिश्री ने कहा कि क्रोध का जन्म तब होता है, जब हमारी अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं। हम चाहते हैं कि सामने वाला हमारी इच्छा और सोच के अनुसार व्यवहार करे। ऐसा नहीं होने पर मन में नाराजगी पैदा होती है और यही नाराजगी क्रोध का रूप ले लेती है। इसलिए क्रोध को समाप्त करने के लिए सबसे पहले अपनी अपेक्षाओं पर नियंत्रण रखना आवश्यक है।

मुनिश्री ने कहा कि अपेक्षा की उपेक्षा होती है तो मन व आत्मा शांत रहेंगे। क्रोध दुर्ध्यान  से बचने का पुरुषार्थ होना चाहिए। मन की इच्छा ही क्रोध को पोषित करती है। मुनिश्री ने कहा कि आचार्य वीरभद्राचार्य द्वारा रचित आतुर प्रत्याख्यान ग्रंथ से प्रतिदिन धर्मसभा में जो देशना दी जा रही है,इसे सिर्फ सुनना नहीं है। ज्ञान को ग्रहण कर जीवन को मर्यादित करना है।

मुनिश्री ने कहा कि जिसके पास इच्छाएं व अपेक्षाएं होगी उसकी चेष्टा स्वयं की भूल को नजरअंदाज करती है और दूसरों की भूल को ही देखती हैं। व्यक्ति अपनी बड़ी सी बड़ी भूल को भी छोटी मानता है और दूसरों की छोटी से छोटी भूल को भी बड़ी मानने लगता है। क्रोध आता है तो हमेशा दूसरों का ही दोष दिखाई देता है। हमें पर के दोष को नहीं देखना है,स्व के दोष को भी देखना है। क्रोध दुर्ध्यान के संस्कार का त्याग करना है।

मुनिश्री ने कहा कि हम दूसरों से अपने मन के अनुसार व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। जब सामने वाला हमारी अपेक्षा के अनुरूप व्यवहार नहीं करता तो हमें दुख और क्रोध होता है। वास्तव में समस्या दूसरे व्यक्ति के व्यवहार में कम और हमारी अपेक्षाओं में अधिक होती है। अपेक्षा कम होगी तो शिकायत भी कम होगी और मन अधिक शांत रहेगा।

49 दिवसीय पंच परमेष्ठी श्रेणी तप की अंतिम श्रेणी शुरू 
सर्वमंगलमय वर्षावास में तप, त्याग और धर्म आराधना को लेकर श्रावक-श्राविकाओं में उत्साह है। तप साधनाओं के माध्यम से श्रावक-श्राविकाएं आत्मकल्याण और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। 49 दिवसीय पंच परमेष्ठी श्रेणी तप की चौथी श्रेणी का सामूहिक व्यासना 31 अगस्त को संपन्न हुआ। इसके साथ ही 1 सितंबर से तप की पांचवीं और अंतिम श्रेणी शुरू हो गई है। अंतिम श्रेणी में अब 15 उपवास की साधना तपस्वी कर रहे हैं। इस महातप का सामूहिक पारणा 29 सितंबर को होगा।

चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया एवं महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि 2 अगस्त से शुरू हुए पंच परमेष्ठी श्रेणी तप में कुल 35 उपवास और 15 व्यासना की तपस्वी साधना कर रहे हैं। पांचवीं एवं अंतिम श्रेणी शुरू होने के साथ ही तपस्या का अंतिम चरण शुरू हो गया है। उन्होंने बताया कि तप की कड़ी में 16 दिवसीय अक्षय निधि समवसरण विजय कषाय तप भी जारी है। इस तप की पूर्णाहुति के बाद 8 दिवसीय मोक्ष तप का शुभारंभ होगा।



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