क्रोध को भड़काते हैं ईर्ष्या, जिद, निंदा और चुगली : मुनि संवेगरत्न सागर

Posted On:- 2026-09-06




रायपुर (वीएनएस)। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में शनिवार को धर्मसभा में मुनि संवेगरत्न सागर ने क्रोध के कारणों और उससे बचने के उपायों के क्रम को गति दी। मुनिश्री रोजाना आचार्य वीरभद्राचार्य द्वारा रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से श्रावक- श्राविकाओं को आत्मकल्याण का मार्ग बता रहे हैं।

मुनिश्री ने कहा कि क्रोध अचानक उत्पन्न होने वाला भाव नहीं है, बल्कि उसके पीछे कई कारण और मानसिक विकार जुड़े होते हैं। क्रोध अकेला नहीं आता। क्रोध की उत्पत्ति के पीछे अभिमान और अपेक्षाएं प्रमुख कारण हैं। जब व्यक्ति की अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं या उसके अहंकार को ठेस पहुंचती है तो भीतर क्रोध का भाव पैदा होने लगता है। यदि समय रहते इस भाव पर नियंत्रण नहीं किया जाए तो यह धीरे-धीरे उग्र रूप धारण कर लेता है।

मुनिश्री ने कहा कि क्रोध के परिवार में ईर्ष्या, जिद, निंदा और चुगली जैसे विकार भी शामिल हैं। ये सभी मिलकर मन में अशांति और नकारात्मकता को बढ़ाते हैं तथा क्रोध को भड़काने का काम करते हैं। व्यक्ति जब दूसरों से तुलना करता है, अपनी बात मनवाने की जिद करता है या किसी की निंदा और चुगली में समय लगाता है तो उसके भीतर कषायों का प्रभाव बढ़ता जाता है।

मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को अपनी अपेक्षाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। जितनी अधिक अपेक्षाएं होंगी, उतनी ही निराशा और क्रोध की संभावना बढ़ेगी। दूसरों से अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार की अपेक्षा करने के बजाय परिस्थितियों को स्वीकार करने का अभ्यास करना चाहिए। इससे मन शांत रहता है और क्रोध को जन्म लेने का अवसर कम मिलता है।

मुनिश्री ने कहा कि अभिमान व्यक्ति के विवेक को कमजोर करता है। व्यक्ति जब स्वयं को सर्वोपरि मानने लगता है तो छोटी-छोटी बातों को भी अपने सम्मान से जोड़ लेता है। ऐसे में अपेक्षा पूरी नहीं होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। इसलिए जीवन में विनम्रता, धैर्य और आत्मचिंतन को स्थान देना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा कि ईर्ष्या व्यक्ति के भीतर लगातार अशांति पैदा करती है। दूसरों की उपलब्धियों को देखकर प्रसन्न होने के बजाय उनसे तुलना करना मन में नकारात्मक भाव पैदा करता है। इसी प्रकार जिद व्यक्ति को सही बात स्वीकार करने से रोकती है। दोनों ही स्थितियां क्रोध को बढ़ाने में सहायक बनती हैं।

मुनिश्री ने धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं से कहा कि क्रोध को जीतने के लिए पहले उसके कारणों को पहचानना जरूरी है। यदि व्यक्ति अभिमान, अपेक्षा, ईर्ष्या, जिद, निंदा और चुगली जैसे भावों पर नियंत्रण कर ले तो क्रोध पर विजय पाना आसान हो सकता है। वर्षावास आत्मचिंतन और आत्मसुधार का अवसर है, इसलिए जिनवाणी के संदेश को केवल सुनने तक सीमित न रखते हुए उसे जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।



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