लोकतंत्र में सबको अपनी राय रखने का अधिकार है

Posted On:- 2026-10-05




सुनील दास


देश में लोकतंत्र है,लोकतंत्र में सबको अपनी बात,अपनी राय रखने का अधिकार होता है,सब हर मामले पर अपनी अपनी राय रखते हैं और इससे तो यह पता चलता है कि देश में लोकतंत्र है और वह मजबूत है।इससे तो वे लोग झूठे साबित होते हैं जो आए दिन कहते रहते हैं कि देश में लोकतंत्र नहीं है, देश के संविधान को खतरा है। देश में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है।कोई सुप्रीम कोर्ट का जज है और वह किसी मामले में अपनी राय रख रहा है तो यह उसका अधिकार है।यह समझने की जरूरत है कि किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों के बीच अलग अलग राय हो सकती है।यहां यह समझने की जरूरत है कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने जो फैसला दिया है,अहम वह फैसला होता है, उस फैसले पर कोई अपनी अलग राय रख सकता है बिना यह कहे कि सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है वह गलत है।यानी सुप्रीम कोर्ट के जजों का किसी विषय़ में कोई फैसला है तो वह अलग है और उस पर किसी जज ने कुछ कहा है वह कथन अलग है,वह राय अलग है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एसआईआर की प्रक्रिया को लगातार सही ठहराता रहा है औऱ इसे चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार बताता रहा है तो कोई सुप्रीम कोर्ट का जज जब किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में चुनाव आयोग पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए एक तरह से शीर्ष अदालत को सवालों के कठघरे में खड़ा करते हुए कहता है कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो लाखों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करती है,वह मूलरूप से मनमानी व संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है,इसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता तो यह साफ हो जाता है कि वह फैसले को गलत नहीं कह रहा है वह फैसले पर अपनी राय रख रहा है, यानी वह कोई फैसला नहीं कर रहा है क्योंकि फैसला करना उसका अधिकार नहीं है, किसी फैसले पर अपनी राय रखना उसका अधिकार है।
इसी तरह जब कोई सुप्रीम कोर्ट का जज यह कहता है कि भारतीय संविधान नागरिकों को दो वर्गों में बांटता नहीं है।एक वर्ग जिसके पास वोट देने का अधिकार है और दूसरा वर्ग जिसके पास वोट देने का अधिकार नही है। सुप्रीम कोर्ट के जज उज्जवल भुइयां जब ऐसा कहते हैं तो समझा तो जा सकता है कि वह एसआईआर के बारे में बोल रहे हैं।एसआईआर के बारे में उनका अपना लाजिक हो सकता है कि एसआईआर देश के नागरिकों को दो भागों में बांटने वाला है लेकिन यह सच नही हैं क्योंकि एसआईआर से यह तय होता है कि वैध,पात्र वोटर कौन हैं,यानी शुध्द मतदाता सूची बनाने का काम है एसआईआर। क्योंकि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है जो भी वैध मतदाता है, वह वोट डाले।एक भी ऐसा व्यक्ति वोट न डाल सके जिसे वोट डालने का अधिकार नहीं है।देश में ऐसी कोई भी प्रक्रिया नहीं है जो करोड़ो भारतीयों को वोट के अधिकार से वंचित करती हो,देश मे ऐसी कोई भी प्रक्रिया नहीं है जो देश में अपने नागरिकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाती है।अगर ऐसा हो रहा होता तो क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसा होने देता।
देश में सुप्रीम कोर्ट है इसलिए ऐसा होने की कोई आशंका नहीं है,जिनका आशंका है वह अपने दुराग्रह के कारण है, निगेटिव सोचने के कारण। किसी राजनीतिक दल, किसी विचारधारा का विरोधी होने के कारण है। यह तो सबको पता है कि कुछ राजनीतिक दल,गैर राजनीतिक दल और उनके नेता चुनाव हारने के कारण चुनाव आयोग को महज आरोप लगाकर गलत साबित करने का प्रयास कर रहे है,सुप्रीम कोर्ट में वह बार बार गलत साबित हुए हैं क्योंकि चुनाव आयोग का गलत साबित करने के लिए वह कोई सबूत ही पेश नहीं कर पाए हैं। आरोपों के जरिए, बयानों के जरिए चुनाव आयोग को बार बार गलत साबित करने का प्रयास जारी है।इस तरह तो चुनाव आयोग को गलत साबित नहीं किया जा सकता। अब तक तो साबित नहीं किया जा सकता, किसी सुप्रीम कोर्ट के जज के एक बयान देने से न तो एसआईआर गलत साबित होता है न ही सुप्रीम कोर्ट गलत साबित होता है।
इससे यह संदेश जरुर कुछ लोगों को दिया जा सकता है कि आप लोग जो कर रहे हो वह सही है, मैं आपके साथ हूं।सुप्रीम कोर्ट के जज अपनी राय कहां व्यक्त कर रहे हैं,यह भी मायने रखता है।हैदराबाद के नालसार विवि के एक कार्यक्रम में छात्रों के सामने सुप्रीम कोर्ट के जज भुइयां ने अपनी राय ऱखी है।ये वही युनिवर्सिटी है जहां के कार्यक्रम में छात्रों ने सीजेआई को बुलाने का विरोध किया था।यहां जज भुइयां छात्रों से कहते हैं कि आप निर्भीक हो,बहादुर हो,आप देशदुनिया को दिखाया है कि कानून के छात्र को कैसा होना चाहिए।इस देश में बड़े पदों पर बैठे लोगों की कमजोरी कहिए या डर कहिए कोई छात्रो को उनकी बुराई नहीं बताता है,वह जो करते हैं,उसे अच्छा बता कर छात्रों की नजर में अच्छा बनने का प्रयास करता है। देश में पीएम मोदी जिनको दिमागी नक्सली कहते हैं, वह तो चाहते हैं कि यहां के छात्र भी देश के भीतर किसी भी बात को लेकर बांग्लादेश,नेपाल,श्रीलंका जैसे हालात बना दें। ऐसे छात्रों को ही चाहे वह कुछ राजनीतिक दलों के नेता हो या न्याय क्षेत्र के कुछ लोग निर्भीक,बहादुर कहते हैं।यही वजह है कि इन दिनों चुनाव आयोग,सीईसी को लेकर देश की राजधानी में आए दिन आंदोलन किया जा रहा है।कुछ लोग चाहते तो हैं कि यहां भी फ्रांस जैसे हालात बना दिए जाए लेकिन हमारे देश के ज्यादातर युवा जो वामपंथी विचारधारा वाले नहीं है,इस वजह से यहां ऐसा माहौल नहीं बना पा रहे हैं।समझने वाली बात यह भी है कि विश्व में दक्षिणपंथी दलों की सरकारों की संख्या बढ़ती जा रही है और वामपंथी कमजोर होते जा रहे है, इसलिए जहां भी दक्षिणपंथी सरकार है वहां वामपंथी आए दिन हंगामा,अराजकता फैलाने का प्रयास करते रहते हैं।



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