बाल दिवस विशेष...

Posted On:- 2025-11-12




डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

 " बच्चों को समझने और खुद को  परखने का महापर्व "

" बच्चे मन के सच्चे , सारे जग के ये आंख के तारे ..." कितना सुकून मिलता है गीत की इन पंक्तियों को सुनकर । बच्चों का में और उनके हृदय की छोटी सी सोच भी निः स्वार्थ हुआ करती है ।

न किसी के प्रति कटु भावना और न ही किसी के प्रति विरोध । बच्चों की विचारधारा की पवित्र गंगा सदैव मानवीय समाज को पुण्य फल प्रदान करती रही है । प्रत्येक माता -पिता का यह स्वप्न होता है कि उनका बच्चा हमेशा मुस्कुराता रहे । वे उसकी खुशियों के लिए हर प्रकार के जतन भी किया करते हैं ।

समय के साथ परिवर्तन इस दुनिया का नियम है । साथ ही परिवर्तन में शामिल नकारात्मकता को पहचान कर उसे दूर रखना प्रत्येक माता -पिता का कर्तव्य भी माना जाना चाहिए । वर्तमान समय में बच्चे आंख के तारे तो हैं ,किंतु उनकी टिमटिमाहट मद्धिम क्यों पड़ रही है ? इस पर चिंतन की जरूरत है ! बच्चों की निः स्वार्थ आत्मा छोटे से घटनाक्रम से क्यों आहत होने लगी है ? प्राथमिक और मिडिल कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चे अपना विवेक क्यों खो रहे हैं ? उनके द्वारा जीवन की कोमल उम्र में आत्महत्याएं अथवा हत्या जैसे कदम क्यों उठाए जा रहे हैं ? क्या इन सब समस्याओं पर गंभीर चिंतन पालकों के लिए चुनौती नहीं है ? बावजूद इसके लगातार बच्चों का अपराध में शामिल होना मेरी नजर में माता - पिता के साथ हमारी शिक्षा व्यवस्था का दुष्परिणाम ही हो सकता है !  

आज की दबावयुक्त जीवनशैली ही बढ़ते बच्चों के मार्ग का कंटक बनकर  सामने आ रही है । तीन वर्ष की मासूम उम्र से शुरू हुई शिक्षा की दबाव पूर्ण नीति जीवन संवारने के स्वर्णिम पाठ्यक्रम तक लगातार बच्चों के लिए चुनौती बनी हुई है । मै यदि अपना बचपन याद करूं तो मुझे मेरे माता - पिता ने छह वर्ष में स्कूल भेजा था । क्या मेरी पीढ़ी के लोग आज की पीढ़ी से कम ज्ञान रखते हैं ? शायद नहीं !

कमजोरी मुझे आज की नन्हीं उम्र से शुरू की गई शिक्षा व्यवस्था पर ही नजर आती है । उन्मुक्त बचपन कहीं खो गया है ! मां के आंचल तले दुग्धपान का अधिकार मासूमों से छीन लिया गया है !

घर के आंगन में हौले - हौले चलते और भागते हुए बच्चों की मनभावन हलचल प्ले स्कूल से लेकर नर्सरी कक्षाओं की चहार-दिवारी में दम तोड़ चुकी है ! तब मेरे विचार मुझसे कहने लगे हैं -" बच्चों को खुश रखने के लिए उनके साथ मजबूत संबंध बनाएं ।

बच्चों के साथ समय बिताएं । बच्चों की बातों को सुनें । उनकी तारीफ करें । उन्हें प्रोत्साहित करें । साथ ही उनकी रुचियों और कल्पनाओं को पंख लगाने के प्रयास करें । " हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि स्वस्थ आदतें , पौष्टिक भोजन , पर्याप्त नींद तथा शारीरिक गतिविधि बच्चों के समग्र कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है । 

                    वर्तमान की दौड़ती - भागती जीवनशैली में माता - पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं है ! अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूर्ण करने दोनों को नौकरी अथवा आर्थिक संपन्नता के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है । ऐसी परिस्थिति में बच्चे आया के भरोसे या फिर झूला घर और प्ले स्कूल में भेज दिए जाते हैं ! माता - पिता थक हारकर घर लौटते और बच्चे को साथ लेकर केवल सोने तक सीमित रह गए हैं । वह दिनभर क्या खाता है ? कैसे खेलता है ? अन्य लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है ? अपनी सीखने की उम्र में किस संस्कृति को समझ पा रहा है और किसे अपने हृदय में स्थान दे पा रहा है ? इन सारे गंभीर प्रश्नों से माता - पिता अनभिज्ञ हैं ! वे न तो उन्हें ठीक तरीके से देख पा रहे हैं और न ही यह अनुभव कर पा रहे हैं कि बच्चा उन्हें किश्तियां स्वीकार कर पाएगा ! इतनी अनदेखी के बावजूद हर पालक अपने बच्चे की तुलना समाज में पल - बढ़ रहे ऐसे बच्चों से करने से पीछे नहीं रहता , जो बच्चे परिजनों के बीच अपना बचपन गुजार रहे हैं । ऐसे पालकों से मै कहना चाहता हूं कि कृपया अपने बच्चे की तुलना किसी अन्य के बच्चे से कतई न करें । अपने बच्चे के मस्तिष्क को पढ़ने का प्रयास करें तथा सकारात्मक विचारों को समझते हुए बच्चे का मनोबल बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करें ।                    अब वह समय आ गया है जब बच्चों को नियम और कानून का ज्ञान छोटी उम्र से ही देने की जरूरत है । उनके जीवन में जरूरी नियमों को उन्हें समझाएं । उनके जीवन की सीमाएं निर्धारित करें । इतना जरूर ध्यान रखें कि उनकी गलतियों पर सजा देने के बजाए गलतियों को दूर करने के लिए काउंसिलिंग की जरूरत महसूस करें । बच्चों को इतना उन्मुक्त करने का प्रयास करें कि वे अपनी भावनाओं से माता - पिता को अवगत करा सकें । उन्हें इस बात की शिक्षा अवश्य दें कि जीवन में दुःख के क्षण आते हैं , किंतु उन्हें सामान्य मानकर अपना आपा न खोएं । छोटी उम्र में किसी प्रकार का ऐसा निर्णय न लें जो जीवन के लिए घातक हो जाए । बच्चों को अपने पास बैठाएं । उन्हें ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित कहानियां सुनाएं । साथ ही प्रयास करें कि वे आपके संरक्षण में कहानियां बना सकें । हर माता - पिता का यह कर्तव्य है कि वे बच्चों को नए तरीके से सोचनेवौर खेलने के लिए प्रोत्साहित करें । इस बात को ध्यान में रखना होगा कि यदि बच्चे का रिश्ता माता - पिता के साथ प्रगाढ़ होता है तो उसे इस बात का एहसास जल्द ही होने लगता है कि माता - पिता उसकी देखभाल कर रहे हैं । ऐसा होने से बच्चे के मन में खुशी का संचार होता है । 

                   प्रायः यह शिकायत सामने आती रही है कि बच्चों को खुश कैसे रखें ? मनोवैज्ञानिकों की माने तो बच्चों को खुश रखने का सबसे सस्ता और मजबूत तरीका उनकी सराहना करना है । ऐसी सराहना न केवल बच्चों की उपलब्धि तक सीमित हो बल्कि उनके द्वारा किए जा रहे प्रयासों तक विस्तृत होनी चाहिए । यह वैज्ञानिक तथ्य भी है कि बच्चों की कड़ी मेहनत और उनके व्यवहार की सराहना उन्हें मुस्कुराने के लिए विवश करती रही है । प्रत्येक माता -पिता अपने बच्चों को हार न मानने और लक्ष्य तक पहुंचने की प्रेरणा लगातार प्रदान करते रहें । यह अकाट्य है कि सफलता और असफलता एक सिक्के के दो पहलू हैं , उन्हें इसकी सटीक जानकारी प्रदान कर उनकी परिपक्वता को विकसित किया जा सकता है । बच्चों में आत्म सम्मान की सोच को विकसित करने के लिए जिम्मेदारी का एहसास कराना भी जरूरी है । बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार छोटे - छोटे काम सौंपना भी गलत नहीं है । काम की सफलता पूर्ण संपन्नता पर उनकी तारीफ जरूर करें । स्नेह से सिर पर हाथ फेरें । पीठ थपथपाएं । इस तरह की निः शुल्क प्रक्रिया उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने के मार्ग में जरूर अग्रसर करेगी और यही हमारा लक्ष्य भी होना चाहिए । 



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