अमरीका व ईरान के लड़़कर थकने के बाद अस्थायी युध्दविराम हुआ है, इसका समय २१ अप्रैल को समाप्त होना है। इससे पहले अमरीका व ईरान के नेताओं के बीच बातचीत तो शुरू होनी ही थी क्योंकि अगर बातचीत नहीं होती तो सवाल उठता कि दोनों को जब बातचीत नहीं करनी थी तो दोनों ने युध्दविराम क्यों किया। युध्दविराम के बाद दोनों देश दुनिया को यह बताना चाहते थे कि अब हम युध्द नहीं करना चाहते हैं, हम शांति चाहते हैं लेकिन शांति तो तब ही हो सकती है जब दोनों देश बिना शर्तों के बात करें। दोनों देशों ने तो बातचीत करने के पहले ही शर्ते रख दीं कि हमारी यह शर्तें मानी जाएंगी तो हम शांति के लिए तैयार हैं। ईरान ने दस शर्तें रखी हैं तो अमरीका ने भी कई शर्तें रखी हैं।
दोनों देश खुद को युद्ध में जीता हुआ मान रहे हैं और वैसी बयानबाजी भी कर रहे हैं कि युध्द मे तो हम विजयी हुए हैं। दोनों खुद को विजयी मान रहे हैं इसलिए एक दूसरे के लिए ऐसी शर्तें रख रहे हैं कि सामने वाला उन शर्तों को स्वीकार नहीं कर सकता। अमरीका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद कर देश होर्मूज स्ट्रेट को पहले की तरह खुला रहने दे,मिसाइल कार्यक्रम सीमित रखे।वहीं ईरान चाहता है कि जब अमरीका वार्ता की टेबल पर आ गया है और वह शांति चाहता है तो उससे ऐसी शर्ते मनवाने का प्रयास क्यों न किया जाए जो वह सामान्य स्थिति में कभी नहीं मानता। यही वजह है कि ईरान शर्ते रखी हैं कि होर्मूज स्ट्रेट पर उसका नियंत्रण रहे,जबकि अमरीका अब दोनों के नियंत्रण के पक्ष में है।
ईरान शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम जारी रखना चाहता है जबकि अमरीका चाहता है कि ईरान परमाणु कार्यक्रम बंद कर दे।ईरान चाहता है कि अमरीका ने उस पर जो प्रतिबंध लगाए हैं, वह हटाए,उसकी १५ लाख करोड़ रुपए की संपत्ति पर फ्रीज हटाए।ट्रंप ने ऐसा किया नहीं है लेकिन ईरान को एक माह तेल बेचने की छूट दी है।ईरान चाहता है कि अमरीका व इजराइल भविष्य में उस पर हमला न करने की गारंटी दे।खाड़ी के देशों मे जहां अमरीका सैन्य बेस हैं, उनको हटाया जाए।अमरीका की बात ईरान नहीं मान रहा है तो ईरान की बात अमरीका नहीं मान रहा है। ऐसे में फिर भी अमरीका व ईरान बात करने के लिए टेबल पर आए तो उसकी वजह यह है कि दोनों को इतना नुकसान हो चुका है कि दोनों और नुकसान नहीं चाहते हैं। दोनों के देश के भीतर की राजनीति में भी नुकसान होने का अंदेशा होगा और दोनों नहीं चाहते हैं कि देश के भीतर उनके खिलाफ माहौल बने इसलिए दोनों देश बातचीत का कोई नतीजा निकले या न निकले दुनिया व देश के लोगों को बताना चाहते हैं कि देखो हम बात कर रहे हैं।देखों हमने युध्द बंद कर दिया है।
अमरीका व ईरान के बीच २१ घंटे की बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला है और निकलने की उम्मीद भी नहीं थी। अमरीका ने कोशिश की कि किसी तरह परमाणु कार्यक्रम बंद करने व होर्मूज स्ट्रेट को खुला रखने को ईरान राजी हो जाए। पहली कोशिश में तो अमरीका सफल नहीं हुआ है। ईरान ने दोनों बातें नहीं मानी और इस बात पर भी नाराजगी जताई की इजराइल लेबनान पर हमला कर रहा है।अमरीका ने साफ कहा कि शांति वार्ता में लेबनान की बात नहीं थी जबकि ईरान का कहना था कि युध्दविराम मतलब ईरान के साथ लेबनान पर हमला रोकना है।ईरान अमरीका का सामने झुका हुआ नहीं दिखना चाहता है क्योकि ऐसा करने पर ही उसका महत्व क्षेत्र का राजनीति व विश्व राजनीति में बना रहेगा।
ऐसे में अमरीका के सामने ईरान को शांति के लिए मनाना एक बड़ी चुनौती है।क्योंकि उसके सामने दो ही विकल्प हैं एक फिर से युध्द शुरू किया जाए, यह रास्ता ट्रंप के लिए अमरीका में नुकसानदायक है, उनको चुनाव में नुकसान हो सकता है।दूसरा बातचीत के सिलसिले को बनाए रखा जाए.एक दौर की बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला तो दूसरे दौर की बातचीत के लिए जमीन तैयार की जाए।इससे अमरीका युध्द से बचा रहेगा।अभी ट्रंप अमरीका में जो नुकसान हो सकता है, उससे बचना चाहते हैं, इसलिए उनकी मजबूरी है कि वह ईरान के साथ ईरान चाहे न चाहे वह अमरीका के लोगों को और खाड़ी के देशों को बताना चाहते हैं कि मैं तो बातचीत करना चाहता हूं, ईरान नहीं चाहता है।ऐसे में ईरान को बातचीत का नतीजा निकले या न निकले बात तो करनी ही पड़ेगी। दोनों देशों के हित में यही है कि नतीजा निकले या न निकले बातचीत के दौर चलते रहें।जब तक देश में स्थिति उनके अनुकूल न हो जाए।
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