डिग्री मतलब रोजगार की गारंटी नहीं है

Posted On:- 2026-04-15




सुनील दास

रोजगार दो क्षेत्रों में मिला करता है। एक सरकारी क्षेत्र और दूसरा निजी क्षेत्र।सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर सीमित होते हैं लेकिन ज्यादातर लोग सरकारी नौकरी चाहते हैं और अवसर सीमित होने के कारण सबको सरकारी नौकरी मिलती नहीं है। सरकारी नौकरी की मांग ज्यादा है, इसलिए उसके प्रतिस्पर्धा भी सबसे ज्यादा है।जो प्रतिस्पर्धा मे सफल होते हैं, उनको सरकारी नौकरी मिलती है।निजी क्षेत्र मे सरकारी से ज्यादा रोजगार के मौके होते हैं। आदमी के पास किसी भी तरह की योग्यता है, जिसकी निजी क्षेत्र में मांग है तो वहां उसको काम की कमी नहीं है।यही वजह है निजी क्षेत्र में देश के सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है।

कई लोग इसलिए उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं कि उनके पास उच्च शिक्षा की डिग्री होगी तो नौकरी तो मिल ही जाएगी। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि जिनके पास उच्च शिक्षा की डिग्री है उनको भी नौकरी नही मिलती है। यानी डिग्री या उच्चशिक्षा की डिग्री होने का मतलब यह नहीं है कि नौकरी मिलने की गारंटी है।छत्तीसगढ़ के रोजगार कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक तो १५ लाख शिक्षित बेरोजगार है,इनमें से ४.७ लाख युवाओं के पास उच्च शिक्षा की डिग्री है,लेकिन उनको नौकरी नहीं मिल रही है। बीई,बीटेक,आईटीआई डिप्लोमा कर बेरोजगारों की संख्या ३.५९ लाख है।उनके पास स्किल है लेकिन उनको नौकरी नहीं मिल रही है। बताया जाता है उनके पास वो स्किल नही है, जिसकी बाजार में मांग है।

कोई भी प्रदेश हो वहां शिक्षा व रोजगार के बीच असंतुलन गंभीर समस्या है।शिक्षा संस्थानों की संख्या बढ़ने से राज्य में शिक्षित युवाओं की संख्या तो बढ़ती है लेकिन शिक्षित युवाओं के लिए रोजगार के उतने अवसर नहीं बढ़ते हैं। ऐसे में युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार के लिए प्रयास करना पड़ता है। निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बहुत है, लाखो करोड़ों लोगों को रोजगार मिला भी हुआ है।निजी क्षेत्र में सीधा सा गणित होता है कि जैसी योग्यता की बाजार में मांग है, वैसी योग्यता है तो युवाओं को बहुत पैसा मिलता है। औसत योग्यता वालों को उतना ही मिलता है जितना औसत योग्यता वालों को मिलना चाहिए।

ऐसा भी नहीं है कि सरकार शिक्षित व श्रमिक वर्ग के लिए कुछ नहीं करती है। सरकार के प्रयास से ही यह तय होता है कि किस पद पर कितना वेतन मिलेगा,कुशल,अकुशल व अर्धकुशल श्रमिक को कम से कम कितना पैसा मिलना चाहिए। इसके बाद भी कई क्षेत्रों में लोगों को तय पैसा भी नहीं मिलता है। निजी क्षेत्र मे बहुत से लोगों को कम वेतन में काम करना पड़ता है क्योंकि उनके पास विकल्प नहीं होता है।कई क्षेत्र में लोगों से ज्यादा वेतन पर्ची पर हस्ताक्षर करवा कर कम पैसे दिए जाते हैं।कई जगह सरकार द्वारा घोषित वेतनमान नहीं दिया जाता है। वेतनमान न देना पड़े इसलिए संविदा में काम कराया जाता है।

आदमी चाहे कम वेतन मे काम करे,संविदा में काम करे,उसका शोषण तो होता है तो इसके लिए सरकार को लोग दोषी ठहरा सकते हैं। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि बेरोजगारों की संख्या बढ़ जाती है,बहुत होती है तो उनकी मांग कम हो जाती है। यानी श्रम सस्ता हो जाता है, यानी ज्यादा पैसा नहीं मिलता है।भारत में लोगों को काम का ज्यादा पैसा नहीं मिलता है यह एक समस्या है यानी इसे जहां श्रमिकों के नजरिए से देखा जाए तो उनको ज्यादा पैसा न मिलना एक समस्या तो है, लेकिन औद्योगिक क्षेत्र के विकास के लिए भारत में श्रम सस्ता होना एक ऐसी विशेषता है कि दूसरे देशों के उद्योगपति यहां कारखाने लगाने आ रहे हैं। यानी भारत मे श्रम सस्ता होने के कारण भारत का औद्योगिक विकास तेजी से हो रहा है।यानी जितने कल कारखाने देश व राज्योे मे लगेगे लोगों को आने वाले दिनों में उतना ही रोजगार मिलेगा। श्रमिक अशांति फैलाने वालों को समझने की जरूरत है कि रोजगार सबको तब ही मिलेगा जब देश में उद्योग लगेंगे,उद्योग तब ही किसी देश में लगते हैं जब वहां शांति होती है।



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