ताजा हुए पुराने जख्म: क्या इस बार तय होगी जिम्मेदारी या फिर दोहराएगा इतिहास

Posted On:- 2026-04-15




-दुबेजी की दिव्यदृष्टि

छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में हुए भीषण बॉयलर विस्फोट ने सिर्फ एक और औद्योगिक हादसे की खबर नहीं दी, बल्कि यह भी दिखा दिया कि बीते हादसों से अब तक कोई ठोस सबक नहीं लिया गया। 16 मजदूरों की मौत और दर्जनों के झुलसने के बाद फिर वही सवाल सामने है—क्या इस बार जिम्मेदारों तक कानून पहुंचेगा, या यह मामला भी लंबी कानूनी प्रक्रिया में खो जाएगा?

छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों में सुरक्षा मानकों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सक्ती जिले में स्थित वेदांता लिमिटेड के पावर प्लांट में मंगलवार दोपहर हुए भीषण बॉयलर ब्लास्ट में 16 मजदूरों की मौत हो गई, जबकि 30 से अधिक श्रमिक गंभीर रूप से घायल हैं। कई घायलों की हालत नाजुक बनी हुई है, जिससे मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

यह हादसा डभरा थाना क्षेत्र के सिंघीतराई स्थित संयंत्र में उस समय हुआ, जब प्लांट में रोज की तरह सामान्य काम चल रहा था। दोपहर करीब 2 बजे अचानक हुए विस्फोट ने पूरे इलाके को दहला दिया। मौके पर अफरा-तफरी मच गई और राहत-बचाव के लिए पुलिस, दमकल और प्रशासन की टीमों को तत्काल जुटना पड़ा।

लेकिन यह कोई पहली घटना नहीं है।

15 साल पहले भी हुआ था बड़ा हादसा
सितंबर 2009 में कोरबा स्थित बालको के 1200 मेगावाट पावर प्लांट में निर्माणाधीन 110 मीटर ऊंची चिमनी गिरने से 40 से ज्यादा मजदूरों की मौत हो गई थी। उस समय भी सुरक्षा में लापरवाही और निर्माण संबंधी खामियों पर सवाल उठे थे।

मामले में सेपको और जीडीसीएल समेत पांच कंपनियों को आरोपी बनाया गया। सेपको के इंजीनियरों पर गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हुआ, लेकिन वे देश छोड़कर चले गए और अब तक अदालत में पेश नहीं हुए।

करीब 15 साल तक मामला अदालतों में चलता रहा। 2025 में जाकर कोर्ट ने इसे गंभीर मानते हुए कंपनियों और उनके अधिकारियों को आरोपी माना, लेकिन अब तक न तो किसी को सजा मिली है और न ही अंतिम जिम्मेदारी तय हो पाई है।

वही पुराना सवाल फिर सामने
बालको हादसे के पीड़ित परिवार आज भी न्याय का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में सक्ती की ताजा घटना ने एक बार फिर लोगों के मन में चिंता बढ़ा दी है कि कहीं यह मामला भी वर्षों तक फाइलों में दबकर न रह जाए।

हादसे के बाद शुरुआती जांच और बयानबाजी शुरू हो चुकी है, लेकिन पिछले अनुभवों को देखते हुए भरोसा कमजोर नजर आता है।

क्या इस बार बदलेगा कुछ?
विशेषज्ञ मानते हैं कि औद्योगिक सुरक्षा नियमों की अनदेखी, निगरानी की कमी और दोषियों पर समय पर कार्रवाई न होना ऐसे हादसों की बड़ी वजह है। जब तक कंपनियों और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक मजदूरों की सुरक्षा सिर्फ कागजों में ही सीमित रहेगी।

सक्ति का यह हादसा अब प्रशासन, न्याय व्यवस्था और उद्योग प्रबंधन के सामने सीधा सवाल रखता है: क्या इस बार 16 मजदूरों की मौत का हिसाब तय होगा, या फिर यह मामला भी सालों तक न्याय की प्रतीक्षा में भटकता रहेगा?



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