मणिपुर में उग्रवाद का वर्तमान स्वरूप जातीय संघर्श और क्षेत्रीय विभाजन में बदल चुका है। हालांकि बड़े पैमाने पर दंगे रुके हैं, लेकिन राज्य में मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच बफर जोन पृथक-पृथक क्षेत्रों में बंट गया है। इस बफर जोन को केंद्र सरकार ने 2023 के दंगों को रोकने के लिए रेखांकित किया था। किंतु अध्र्यसैन्य बलों की चैकसी के बावजूद व्यावहारिक रूप से अलग-अलग सीमाओं में दिखाई दे रहा है। इस सीमा के एक तरफ घाटी क्षेत्र में मैतेई समुदाय और पहाड़ियों में कुकी-जो समुदाय एक-दूसरे के इलाकों में आज भी सुरक्षित आवाजाही से वंचित हैं। ऐसा होने पर बम विस्फोट, रॉकेट हमले और गोलीबारी की घटनाएं घटित हो जाती हैं। अतएव तीन साल से जारी इस जातीय हिंसा और अराजकता झेल रहे मणिपुर में अब केंद्र सरकार ने आर-पार की जंग शुरू कर दी है। नक्सलियों की तरह राज्य के सीमावर्ती जंगलों में छिपे उग्रवादियों का खात्मा करने के लिए केंद्र सरकार ने सबसे घातक और आक्रामक सैन्य-दक्षता वाले विलक्षण जंगल-वारफेयर यूनिट (कोबरा) को मैदान में उतार दिया है।
मणिपुर में इस समय चप्पे-चप्पे पर कोबरा की 207 और 2010 बटालियन के करीब 2000 प्रषिक्षित कमांडो ‘आॅपरेषन क्लीन‘ को अंजाम दे रहे हैं। ये कमांडों छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडीषा में नक्सलियों के खिलाफ सफाये की कार्यवाही को परिणाम तक पहुंचा चुके हैं। इनका लक्ष्य है कि मणिपुर में सक्रिय 20 से ज्यादा सरकार से बातचीत के लिए तैयार नहीं होने वाले भूमिगत उग्रवादी समूहों को या तो समर्पण कराना है या फिर इन पर काल बनकर टूट पड़ता हैं। इसके नतीजे मिलने लगे हैं। कोबरा जवानों ने असम राइफल्स, सेना और स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर कांगपोकपी और इंफाल घाटी के कई जिलों में उग्रवादियों के नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया है। अब तक 17 खतरनाक उग्रवादी हिरासत में लिए जा चुके हैं और इनके अवैध ठिकानों को मटियामेठ कर दिया है। आगे यह अभियान हथियारों से लैस उग्रवादियों के षिविरों को खोजकर उन्हें नियंत्रण में लेने का अभियान चला रहा है। हालांकि फरवरी 2026 में मुख्यमंत्री यमनाम खेमचंद्र सिंह की नई त्रि-जातीय संतुलित सरकार (जिसमें मैतेई मुख्यमंत्री के साथ कुकी और नागा उपमुख्यमंत्री षामिल हैं) बनने के बाद राजनीतिक संवाद की षुरूआत जरूर हुई है, लेकिन जमीनी स्तर पर अविष्वास की खाई को पाटना पूर्व की तरह बड़ी चुनौती बनी हुई है।
दरअसल 2023 की हिंसा भड़काने के जो कारण बने थे, उनका अब तक निराकरण नहीं हो पाया है। मैतेई समुदाय खुद को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा बहाल रखने की मांग कर रहा है। उनका तर्क है कि म्यांमार से हो रहे अवैध प्रवासन (घुसपैठ) और भूमि नहीं खरीद पाने के कानून के कारण वे अपनी ही मातृभूमि पर अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। दूसरी तरफ कुकी-जो और नागा समुदाय मैतेई समुदाय की अनुसूचित जाति की मांग का कड़ा विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि मैतेई पहले से ही राजनीतिक, षैक्षिक और आर्थिक रूप से मजबूत हैं। यदि इन्हें यह दर्जा मिल जाता है तो ये आदिवासियों की नौकरियों और पहाड़ी जमीनों पर काबिज होकर उनके वैद्य मालिक बन जाएंगे। इस विवाद के चलते कुकी-जो विधायकों और संगठनों ने ऐलान कर दिया है कि वे अब मैतेई बहुल राज्य सरकार के तहत नहीं रह सकते है। अतएव कुकी केंद्र सरकार से ‘केंद्र षासित प्रदेष‘ (यूटी) या पूर्ण स्वायत्ता के रूप में एक अलग प्रषासनिक व्यवस्था की मांग पर अड़े हुए हैं।
फरवरी 2023 में राज्य सरकार ने पहाड़ी और जंगली क्षेत्रों से अवैध प्रवासियों को बाहर करने की षुरूआत की थी। इन क्षेत्रों की नगा और कूकी समुदाय की 34 जातियां, जनजाति की श्रेणी में अधिसूचित हंै। अतएव इनके लिए चिन्हित भूभाग पर किसी गैर-जनजातीय समुदाय के लोग काबिज नहीं हो सकते हैं। विडंबना देखिए जिन लोगों को प्रवासी बताकर विस्थापन का सिलसिला षुरू किया गया उन्हें इस इलाके के मूल निवासी कुकी समुदाय ने अपना बताया। किंतु सरकार ने इस तथ्य पर ध्यान न देते हुए कुकियों की बेदखली का सिलसिला तो बनाए ही रखा, साथ ही मैतेई समुदाय को जब जनजाति का दर्जा मिल गया, तब उन्हें बलपूर्वक नगा और कुकी समुदाय के आरक्षित भूखंडों पर भी काबिज होने से नहीं रोका। विवाद की असली जड़ यही विरोधाभास रहा। मैतेई समुदाय इस इलाके में षैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से सक्षम वर्ग है। संख्याबल में भी वे अधिक हैं। यही नहीं मणिपुर की विधानसभा की 60 में से 40 विधानसभा क्षेत्रों में वहीं काबिज हैं। जबकि पहाड़ी इलाकों के 90 प्रतिषत दुर्गम भू-भाग में रहने वाली नगा और कूकी 34 जनजातियों के केवल 20 विधायक ही हैं। ज्यादातर मैतेई हिंदू होने के साथ वैश्णव संप्रदाय से जुड़े हैं। इनमें से कुछ मतांतरित मुसलमान भी है। जबकि नगा और कूकियों में से 90 फीसदी धर्मांतरित ईसाई हैं। इस लिहाज से यह विवाद आसानी से धार्मिक रंग में बदलकर हिंसक हो जाता है। इसे धार्मिक रंग देने में ड्रग माफिया भी आग में घी डालने का काम करता है। समूचे पूर्वोत्तर भारत में अंतरराश्ट्रीय स्तर पर निर्यात नषे का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। बड़ी मात्रा में यहां अफीम की खेती होती है। पूर्व मुख्यमंत्री नोंगथोंबम बीरेन सिंह ने अफीम की खेती और ड्रग माफिया के खिलाफ जबरदस्त अभियान छेड़ा हुआ था, इसी समय उच्च न्यायालय का आदेष आया कि सरकार मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने वाले कानून के अमल पर विचार करे। इस अदालती आदेष पर अमल की षुरूआत के साथ ही मणिपुर में जातीय दंगे भड़क उठे, जिन पर नियंत्रण के लिए अब कोबरा बटालियन तैनात की गई है। े
वैसे, ऐसे हालातों के निर्माण की प्रक्रिया तभी षुरू हो गई थी, जब विधानसभा से 2015 में तीन नए विधेयक पारित हुए थे। तब भी हिंसा के खतरनाक हालात निर्मित हुए थे। दरअसल इन कानूनों को स्थानीय जनजातीय समुदायों ने व्यापक हितों के प्रतिकूल मान लिया था। एक साथ लाए गए तीन विधेयकों से खासतौर से आदिवासी समूहों में ये आशंका गहरी हुई कि बाहरी लोगों को पर्वताचंलों का स्थाई निवासी बनाए जाने के रास्ते इन कानूनों के जरिए खोले जा रहे हैं। इसीलिए यह मामले में बाहरी बनाम मूल निवासियों की जंग में उलझकर विस्फोटक हो गया है। स्थानीय समुदायों में पनपे इस असुरक्षा-बोध पर सद्भाव और विश्वास की मलहम लगाने की जरूरत है। उत्तर-पूर्व के इन सात राज्यों को सात बहनों के नाम से जाना जाता है, वे पश्चिम बंगाल और असम के विभाजित रूप हैं। लिहाजा बृहत्तर असम का ‘असम‘ नाम यूं ही नहीं पड़ा। उसकी पृश्ठभूमि वे असमानताएं रही हैं, जिनकी वजह से यहां के षासकों ने इस क्षेत्र का ‘असम‘ नाम से नामाकरण किया। ‘असम‘ का सामान्य सा अर्थ है, जो ‘सम‘ न हो। अर्थात जो असमानताओं और विसंगतियों से भरा हो। भूमि से लेकर जीवन-यापन के हर क्षेत्र में इस विरोधाभासी पहलू को सकारात्मक सोच देने की दृश्टि से हमने इसे ‘विविधता में एकता‘ के पर्याय से जोड़ दिया। केंद्र सरकार आॅपरेषन क्लीन के जरिए उग्रवादियों को नियंत्रित करके इस एकता को बहाल रखना चाहती है।
ये कानून हैं, मणिपुर यात्री किराएदार एवं प्रवासी नियमन विधेयक, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संषोधन) विधेयक और मणिपुर दुकान एवं प्रतिश्ठान (दूसरा संषोधन) विधेयक। विवाद व हिंसक आंदोलन का मूल कारण ‘यात्री किराएदार एवं प्रवासी नियमन विधेयक-2015‘ बना हुआ है। इस विधेयक में इनर लाइन परमिट हासिल करने के तरीके को कड़ा किया गया है। यह उपाय जीसीआरएलपीएस नामक संगठन द्वारा सालों से उठाई जा रही मांग के परिप्रेक्ष्य में किया गया है। संगठन की प्रमुख मांग थी कि मणिपुर में प्रवासी मसलन बाहरी लोगों की संख्या और हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है। लिहाजा इसे नियंत्रित किया जाए। मूल निवासियों की ऐसी धारणा पुख्ता हुई है कि ये लोग मणिपुर की प्राकृतिक संपदाओं पर तो कब्जा कर ही रहे हैं, रोजगार और आजीविका के दुकान व श्रम से जुड़े संसाधनों को भी हथिया रहे हैं। सरकारी नौकरियों में स्थानीय और प्रवासियों के बीच प्रतिस्पर्धा उत्तरोत्तर बड़ी होती जा रही है। नतीजतन मणिपुर की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री रहे ओकराम इबोबी सिंह को इनर लाइन परमिट के नियमों को सख्त बनाने की जरूरत पड़ी।
मूल रूप से यह मांग मणिपुर के बहुसंख्यक मैतेई समुदाय की थी। इसका विरोध आदिवासी समुदाय शुरुआत से ही कर रहे हैं। उन्हें यह भय है कि अगर ये ये कानून अमल में आ जाते हैं तो उन्हें जो ‘मणिपुर घाटी जन-प्रशासन नियमन अधिनियम 1947 के तहत विशेष अधिकार मिले हुए हैं, उनका हनन होगा। दरअसल इस कानून के तहत राज्य के पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में अनादि काल से रह रहे जनजातीय समुदायों के हितों को विषेश रूप से संरक्षित करने के उपाय किए गए हैं। नए कानून के अनुसार 1951 के पहले से मणिपुर में रह रहे अथवा पलायन करके आए प्रवासी ही मणिपुर में रह सकेंगे। मसलन 1951 के बाद बसने वाले प्रवासियों को राज्य के नागरिकों को दी जाने वाली सुविधाएं भी नहीं मिलेंगी, दूसरे जरूरत महसूस होने पर सरकार उन्हें राज्य से बेदखल भी कर सकती है। यानी 1951 के पहले आ गए घुसपैठियों को भी मणिपुर की आदिवासियों के लिए आरक्षित की गईं पहाड़ी ग्रामों में भी संपत्ति खरीदने व रोजगार हासिल करने के अधिकार प्राप्त हो जाएंगे।
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