एक मनुष्य का जीवन तभी सार्थक माना जा सकता है जब वह समाज को ऐसा कुछ वापस करने की क्षमता रखता हो , जिसकी उम्मीद धूमिल हो चुकी हो ! ऐसा कोई मनुष्य मुझे नजर आता है तो वह एक डॉक्टर ही है । कुछ मिनटों और कुछ क्षणों में जीवन रक्षक निर्णय लेकर एक डॉक्टर ही सामाजिक बड़े उद्योगपति , समाजसेवी , राजनीति के धुरंधर या फिर कुशल कारीगर के साथ न जाने कितनों का जीवन बचाकर समाज की बड़ी सेवा करता दिखाई पड़ रहा है । एक डॉक्टर का पेशा असहाय होकर सिर्फ देखने के बजाए बीमार व्यक्ति को वह शक्ति प्रदान कर जाता है जिससे उसके अंदर जीने की इच्छा जागृत हो उठती है ! साथ ही उसकी आधी बीमारी मैदान छोड़कर भाग जाती है । जब एक व्यक्ति जीवन और मृत्यु के बीच बंधी डोर में उलझा होता है , तब उलझन से छुटकारा दिलाने वाला कोई किरदार यदि नजर आता है तो वह डॉक्टर ही हुआ करता है । एक सफल डॉक्टर वह होता है जो न केवल बीमारी को समझता है बल्कि मन की तकलीफ को भी बेहतर महसूस करता है । जब हर रास्ता बंद हो जाता है । जब परिवार की आंखों में आँसूं के सिवाय कुछ नहीं होता है । जब मनुष्य के दिल में भय पल - पल डरा रहा होता है । तब अंधकार में मशाल लेकर एक डॉक्टर प्रवेश करता हैबोर सारे भ्रम को दूर कर आशा की किरण का संचार करता है ।
डॉक्टर को हम जीवनदाता कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी । कारण यह कि समाज में एक वही ऐसा व्यक्ति है जो जीवन को मृत्यु के जबड़े से खींच लाता है ! कोई सड़क हादसे का शिकार हो जाए । किसी नवजात को जन्म से ही साँस न आए या फिर कोई लाइलाज मान ली जाने वाली बीमारी की जकड़न में हो - हर परिस्थिति में एक ही शख्स मैदान तैनात दिखाई पड़ता है , जिसे हम डॉक्टर के नाम से जानते हैं । एक डॉक्टर का उद्देश्य महज इलाज करना ही नहीं होता वरन उसका धर्म जीवन को बचाना भी होता है । एक कर्तव्यनिष्ठ डॉक्टर मरीज की न तो जाति देखता है और न ही धर्म । न तो दिन देखता है और न ही रात । वह अपने कर्तव्य में इस तरह मग्न हो जाता है , जैसे एक मां अपने बच्चों की देखभाल किया करती है । वह एक पिता की तरह निर्णय लेता है और एक मित्र की तरह सांत्वना देता है । इतने किरदारों को एक साथ निभाते हुए वह मरीज के मर्ज़ को दूर करने हर संभव प्रयत्न करता है । जब किसी ऑपरेशन में घंटों लग जाते हैं । जब मरीज की स्थिति नाजुक होती है । जब हर साँस गिनी जा रही होती है - उस समय एक डॉक्टर का दिमाग कंप्यूटर की तरह चल रहा होता है और उसका दिल एक फकीर की तरह धड़कता रहता है । वही डॉक्टर जब परिजनों से कहता है - " घबराएं नहीं , सब ठीक हो जाएगा " तब उसके ये शब्द सांत्वना नहीं बल्कि जिंदगी की तरफ बढ़ते कदम से कम नहीं होते हैं !
डॉक्टर की मुस्कान , उसका आत्मविश्वास , उसका अनुभव और उसका इलाज करने का तरीका मिश्रित रूप से नए जीवन को रचने में अहम भूमिका निभाता है । डॉक्टर के इंजेक्शन में दवाई होती है , किंतु उसकी बातों में जादू हुआ करता है ! वह न केवल शरीर का इलाज करता है वरन आशा , भरोसे और हिम्मत का संचार भी करता हैं। दुनिया में डॉक्टर का ही पेशा है जो न रात देखता है और न दिन । उसकी छुट्टी का दिन भी निर्धारित नहीं होता ! जब पूरी दुनिया सो रही होती है तब एक डॉक्टर अपने मरीज का जीवन बचाने के लिए रात के सन्नाटे में न केवल जाग रहा होता है बल्कि ईश्वर से चमत्कार की कामना करते हुए उसके इलाज में व्यस्त रहता है ! उसे तब तक न नींद आती है और न ही भूख लगती है जब तक वह अपने मरीज को नियंत्रण की स्थिति में नहीं ले आता ! एक चिकित्सक कभी गारंटी के साथ यह नहीं कह सकता है कि फलां त्यौहार या छुट्टियां वह अपने परिवार के साथ अवश्य मनाएगा ! उसका छोटे से छोटा फैसला सीधे - सीधे किसी की जान से संबंध रखता है । हम यह नहीं कह सकते कि डॉक्टर का जीवन आराम दायक होता है । मरीज की गंभीर स्थिति उसे मानसिक रूप से परेशान कर देती है । किसी असाध्य रोग से पीड़ित मरीज की स्वस्थता पर जो खुशी एक डॉक्टर को मिलती है , शायद ऐसी खुशी उसके परिवार के सदस्य को भी नहीं मिल पाती होगी !
जहां तक मै गलत नहीं सोच रहा हूं - एक समय था जब लोग डॉक्टर होने पर गर्व महसूस किया करते थे । समाज भी इस बात को मानता था कि इस प्रतिष्ठित और लोगों की जान बचाने की परवाह करने वाले काम के शिखर तक पहुंचने उन्होंने कितने साल और कितनी कठिन तपस्या की है । उनके बच्चे भी उन्हें गर्व से देखा करते थे और संकल्प लेते थे कि वे भी एक दिन अपने पापा की तरह डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करेंगे । बड़े दुःखी मन से कहना चाहता हूं कि मेरा यह भ्रम अब टूट चुका है ! कारण यह कि मैं एक बार अपने पुराने मित्रों के मिलन समारोह में शामिल था । इसी आयोजन में मेरे बहुत से पुराने मित्र एमबीबीएस जैसी गौरवान्वित करने वाली उपाधि से सुशोभित थे । हम सब पुरानी यादों में खोने लगे । यह चर्चा भी चल निकली कि क्या तुम्हें डॉक्टर बनकर वह सुकून मिला , जिसकी कल्पना की जाती थी ? पहले तो मेरे इस सवाल से आयोजन में सन्नाटा पसर गया । फिर मैं आश्चर्यचकित रह गया जब दस में से सात डॉक्टर मित्रों ने कहा कि वे नहीं चाहते कि उनकी संतानें भी डॉक्टर बनें और इस पेशे को अपनाएं !
मै सोचने पर विवश हो गया कि जिस पेशे को दुनिया सबसे ऊंचे स्थान पर रखती है , अब उसमें जाने से मन क्यों अनमना है ? समाज में ऐसा क्या बदलाव आया है , जिससे हम इसे अलग नजरिए से देखनेब्लॉज ? शायद यही कारण है कि पिछले कुछ दशक से कम से कम छात्र डॉक्टर बनने के विकल्प को चुन रहे हैं ! जहां तक मै समझता हूं यह सामाजबले बदलते रवैये का ही नतीजा है । मेरे पाठक इस संदर्भ में मुझसे सहमत हो सकते हैं कि आखिर इस महान पेशे के प्रति नकारात्मक विचार क्यों पनप रहे हैं ? एक डॉक्टर के पास जब परिजन किसी सदस्य को लेकर पहुंचते हैं , जिसके जीवन की प्रत्याशा लगभग समाप्त हो गई है । वे डॉक्टर से मिन्नतें करते हैं कि उस सदस्य का वे इलाज करें । हाथ - पैर जोड़ते हैं । वही मरीज जब डॉक्टर के लाख प्रयास के बाद भी नहीं बच पाता है , तब परिजन अपनी पूरी भड़ास डॉक्टर को नाकाबिल बताकर निकालने लगते हैं ! उन्हें यह बात पहले भी पता थी कि मरीज के बचने की संभावना क्षीण है । बावजूद इसके क्षतिपूर्ति के नाम पर हो - हल्ला मचाना और स्वार्थसिद्धि ही इस पेशे को न अपनाने का बड़ा कारण बन रही है । बहरहाल मै अपने पाठकों की ओर से देश के सभी डॉक्टर्स का धन्यवाद करना चाहता हूं कि विपरीत परिस्थितियों में भी वे मानव समाज के प्रति अपने कर्तव्य की पूर्ति कर रहे हैं ।
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