नई दिल्ली(वीएनएस)।मनीष तिवारी की नाराजगी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह लंबे समय से कांग्रेस नेतृत्व से अलग राय रखने वाले नेताओं में गिने जाते रहे हैं। पार्टी के असंतुष्ट नेताओं के जी-23 समूह में शामिल होकर उन्होंने कांग्रेस में संगठनात्मक सुधार, सक्रिय नेतृत्व और आंतरिक लोकतंत्र की मांग उठाई थी।
कभी कांग्रेस के असंतुष्ट गुट जी-23 के सदस्य रहे मनीष तिवारी एक बार फिर नाराज नजर आ रहे हैं। पंजाब कांग्रेस में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर संगठनात्मक फेरबदल के बाद जिस तरह उन्हें पूरी तरह किनारे कर दिया गया, उससे उनकी नाराजगी खुलकर सामने आ गई है। चंडीगढ़ से लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने सीधे तौर पर तो पार्टी नेतृत्व पर हमला नहीं बोला, लेकिन उनके शब्दों में गहरी पीड़ा और असहमति साफ दिखाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि किसी व्यक्ति या संस्था में प्रतिभा और क्षमता होना क्या सबसे बड़ा दोष है? काश उनके पास असुरक्षाओं का कोई इलाज होता। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने उन्हें पिछले पैंतालीस वर्षों में बहुत कुछ दिया है और उन्होंने भी अपना पूरा जीवन पार्टी की सेवा में लगाया है।
दरअसल अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के तहत कई महत्वपूर्ण समितियों की घोषणा की है। चरणजीत सिंह चन्नी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया, विजय इंदर सिंगला को चुनाव प्रबंधन और समन्वय समिति की जिम्मेदारी दी गई, सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर समिति का प्रमुख बनाया गया तथा अमर सिंह को घोषणा पत्र समिति की कमान सौंपी गई है। इसके साथ ही अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और प्रताप सिंह बाजवा को विधायक दल का नेता बनाए रखने का निर्णय लिया गया। पार्टी ने तीन कार्यकारी अध्यक्षों की भी नियुक्ति की, लेकिन पंजाब कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल मनीष तिवारी को कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई। राजनीतिक हलकों में इसे केवल संगठनात्मक फैसला नहीं बल्कि अंदरूनी शक्ति संतुलन का संकेत माना जा रहा है।
हम आपको बता दें कि मनीष तिवारी की नाराजगी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह लंबे समय से कांग्रेस नेतृत्व से अलग राय रखने वाले नेताओं में गिने जाते रहे हैं। पार्टी के असंतुष्ट नेताओं के जी-23 समूह में शामिल होकर उन्होंने कांग्रेस में संगठनात्मक सुधार, सक्रिय नेतृत्व और आंतरिक लोकतंत्र की मांग उठाई थी। उस समय भी उन्होंने खुलकर कहा था कि पार्टी को वास्तविकताओं का सामना करना चाहिए। यही कारण है कि उन्हें कांग्रेस के भीतर एक स्वतंत्र सोच रखने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। भौगोलिकसंदर्भ
इसी बीच, भारत और पाकिस्तान संबंधों को लेकर उठा विवाद भी मनीष तिवारी को फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ले आया है। एक ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर समेत अनेक बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता भारत पाकिस्तान वार्ता बहाल करने की मांग कर रहे हैं, वहीं मनीष तिवारी ने इसका तीखा विरोध किया है। भारत और पाकिस्तान के सौ से अधिक प्रमुख नागरिकों द्वारा दोनों देशों के बीच शांति और संवाद बहाल करने की अपील वाले पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए मनीष तिवारी ने कहा कि कुछ लोग बैसरन नरसंहार को भूल चुके हैं। उन्होंने याद दिलाया कि निर्दोष पर्यटकों की उनके परिवारों के सामने हत्या की गई थी और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का इतिहास कोई नई बात नहीं है।
मनीष तिवारी ने साफ कहा कि पाकिस्तान दशकों से भारत के खिलाफ आतंकवाद को एक रणनीति के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। उन्होंने कहा कि जब भी भारत ने पाकिस्तान की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया, उसके बाद किसी न किसी आतंकी हमले ने उस प्रयास को चोट पहुंचाई। उन्होंने कहा कि भारत की पाकिस्तान से केवल एक अपेक्षा है कि वह आतंकवाद का निर्यात बंद करे। उन्होंने भारत पाकिस्तान संबंधों को सामान्य बनाने की मांग को भावुक और वास्तविकताओं से कटा हुआ बताया। उन्होंने साफ कहा कि यह रहस्यपूर्ण दबाव समझ से परे है कि आखिर भारत में कुछ लोग बार बार पाकिस्तान से संबंध सामान्य बनाने की वकालत क्यों करते हैं?
हम आपको यह भी बता दें कि मनीष तिवारी ने कई बार पार्टी लाइन से अलग जाकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर स्पष्ट राष्ट्रवादी रुख अपनाया है। वर्ष 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद भी उन्होंने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की मांग की थी। चीन के साथ सीमा विवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के कई मामलों में भी उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व से अलग अधिक स्पष्ट और कठोर रुख व्यक्त किया। यही नहीं, ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब मोदी सरकार ने कई संसदीय प्रतिनिधिमंडलों को विदेश भेजा था तब कांग्रेस नहीं चाहती थी कि मनीष तिवारी उस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनें लेकिन मनीष तिवारी ने संसदीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनकर विदेशों में भारत का पक्ष दृढ़ता से सामने रखा था।
इतना ही नहीं, जब कांग्रेस नेतृत्व ने कई मुद्दों पर केंद्र सरकार की आलोचना की, तब भी मनीष तिवारी ने अग्निवीर योजना समेत कई अन्य मामलों में राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देते हुए संतुलित बयान दिए। सर्जिकल स्ट्राइक और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उन्होंने सेना के मनोबल और राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि बताया था। यही कारण है कि उन्हें कांग्रेस के भीतर राष्ट्रवादी सोच रखने वाले नेताओं में गिना जाता है।
बहरहाल, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में उन्हें जिम्मेदारी नहीं मिलना केवल संगठनात्मक उपेक्षा नहीं बल्कि उनकी स्वतंत्र और मुखर राजनीति का परिणाम भी हो सकता है। हालांकि मनीष तिवारी ने फिलहाल संयमित भाषा का प्रयोग किया है, लेकिन उनके हालिया बयान यह संकेत दे रहे हैं कि कांग्रेस के भीतर विचारधारा और नेतृत्व शैली को लेकर मतभेद अभी समाप्त नहीं हुए हैं। हालांकि एक बार फिर मनीष तिवारी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उनके लिए पार्टी से ऊपर देशहित और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न हैं, और वह इन मुद्दों पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
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