ताजमहल है या तेजाे महालय ? अदालत के रुख के बाद बंद कमरों का सच सामने आने की उम्मीद बढ़ी!

Posted On:- 2026-07-07




लखनऊ(वीएनएस)।मामला वर्ष 2015 में आगरा की दीवानी अदालत में दायर उस वाद से जुड़ा है जिसमें दावा किया गया कि ताजमहल मूल रूप से भगवान शिव का मंदिर था। याचिकाकर्ताओं में भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान, अधिवक्ता हरिशंकर जैन, रंजना अग्निहोत्री समेत अन्य लोग शामिल हैं।

ताज महल को लेकर एक बार फिर अदालत में बहस तेज हो गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर याचिका ने उस पुराने विवाद को फिर जगा दिया है जिसमें दावा किया जा रहा है कि ताज महल दरअसल प्राचीन शिव मंदिर "तेजो महालय" है। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सर्वे से इतनी परेशानी क्यों है? यदि दावे गलत हैं तो वैज्ञानिक और ऐतिहासिक जांच से डर किस बात का है, और यदि दावे सही नहीं ठहरते तो अदालत के सामने सच अपने आप आ जाएगा। फिर सर्वे कराने में हिचकिचाहट क्यों दिखाई जा रही है?

दरअसल मामला वर्ष 2015 में आगरा की दीवानी अदालत में दायर उस वाद से जुड़ा है जिसमें दावा किया गया कि ताजमहल मूल रूप से भगवान शिव का मंदिर था। याचिकाकर्ताओं में भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान, अधिवक्ता हरिशंकर जैन, रंजना अग्निहोत्री समेत अन्य लोग शामिल हैं। उनका कहना है कि यह संरचना मुगल काल से पहले की है और इसे राजा परमर्दि देव ने वर्ष 1212 में बनवाया था। बाद में यह राजा मानसिंह और फिर जयसिंह के अधिकार में रही, जिसके बाद शाहजहां ने इसे अपने कब्जे में लेकर मुमताज महल के मकबरे में बदल दिया।

याचिका में यह भी कहा गया कि ताज महल परिसर के कई हिस्से आज भी आम जनता के लिए बंद हैं और उन्हीं हिस्सों की जांच सबसे ज्यादा जरूरी है। इसी उद्देश्य से वर्ष 2019 में अदालत से मांग की गई थी कि एक अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त कर ताजमहल का सर्वे कराया जाए, उसकी तस्वीरें ली जाएं और वीडियोग्रफी कराई जाए ताकि संरचना के वास्तविक स्वरूप की जांच हो सके।

लेकिन आगरा की दीवानी अदालत ने यह मांग ठुकरा दी। अदालत ने कहा कि वादियों ने विवादित संपत्ति के पर्याप्त अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए और संपत्ति के विवरण में भी विसंगतियां हैं। इसके बाद अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के समक्ष दायर पुनरीक्षण याचिका भी यह कहते हुए खारिज कर दी गई कि वह विचारणीय नहीं है। अब यही मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय पहुंचा है।

सोमवार को न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की अदालत ने केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से जवाब मांगा है। अदालत ने प्रतिवादी पक्ष को भी प्रति शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। हम आपको बता दें कि याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया है कि न केवल अधिवक्ता आयुक्त की मांग गलत तरीके से खारिज की गई, बल्कि परिसर की तस्वीरें लेने की मांग भी अनुचित ढंग से रोकी गई।

देखा जाये तो यहीं से बहस का असली केंद्र शुरू होता है। यदि ताज महल को लेकर सभी ऐतिहासिक तथ्य इतने स्पष्ट हैं, यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पूरी दृढ़ता से इसे मुगलकालीन मकबरा मानता है, यदि दशकों से यही आधिकारिक इतिहास है, तो फिर एक निष्पक्ष सर्वे से परहेज क्यों है? सवाल यह भी उठता है कि आखिर वैज्ञानिक जांच और ऐतिहासिक परीक्षण से किसे खतरा है? अदालत की निगरानी में होने वाला सर्वे न तो किसी स्मारक को गिरा देगा और न ही किसी की आस्था पर हमला करेगा। फिर विरोध इतना तीखा क्यों दिखाई देता है?

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सच सामने आना चाहिए। उनका कहना है कि यदि संरचना में ऐसे स्थापत्य संकेत मौजूद हैं जो मंदिर की ओर इशारा करते हैं, तो उनकी जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और इतिहासकारों का एक वर्ग इन दावों को खारिज करता रहा है। उनका कहना है कि ताजमहल शाहजहां द्वारा मुमताज महल की याद में बनवाया गया मकबरा है और इसके पर्याप्त ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं।


म आपको बता दें कि यह विवाद नया नहीं है। लेखक पीएन ओक ने भी अपनी पुस्तक में इसी प्रकार के दावे किए थे। वर्ष 2000 में उच्चतम न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बावजूद समय समय पर यह मुद्दा अदालतों और सार्वजनिक विमर्श में लौटता रहा है। कभी बंद कमरों को खोलने की मांग उठती है, तो कभी नए सर्वे की।

इसमें कोई दो राय नहीं कि ताज महल विश्व धरोहर स्थल है और देश की पहचान भी। लेकिन किसी स्मारक का महत्व इस बात से कम नहीं होता कि उसके इतिहास पर सवाल पूछे जाएं। इतिहास की जांच कोई अपराध नहीं होती। लोकतंत्र में सवाल पूछना और तथ्यों की मांग करना स्वाभाविक प्रक्रिया है। अदालतें भी अंततः साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय देती हैं।

सबसे अहम बात यह है कि याचिकाकर्ता केवल घोषणा नहीं मांग रहे, बल्कि जांच की मांग कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि अदालत की निगरानी में विशेषज्ञों की टीम जांच करे, तस्वीरें ले, संरचना का अध्ययन करे और सच्चाई सामने रखे। ऐसे में यह बहस अब केवल ताज महल तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह पारदर्शिता बनाम भय का सवाल बनती जा रही है। अब निगाहें इलाहाबाद उच्च न्यायालय पर टिकी हैं। अदालत के सामने केवल एक याचिका नहीं, बल्कि वह सवाल भी खड़ा है जो लगातार गूंज रहा है कि आखिर सर्वे से इतनी दिक्कत क्यों है?



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