राजनीति में बड़े नेताओं के बड़े समर्थक होते हैं.वह चाहते हैं कि हमारा नेता को हमेशा जीतना चाहिए। उसे किसी के सामने झुकना नही चाहिए। उसे ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए कि ऐसा लगे कि वह किसी के सामने झुक गया है। उसके किसी काम से ऐसा नहीं लगना चाहिए कि हमारा मजबूत नेता कमजोर साबित हो गया है।कई बार नेता जितना कट्टर नहीं होता है, उसके समर्थक उससे ज्यादा कट्टर होते हैं। नेता का झुकना उसे मंजूर नहीं होता है। नेता का हारना उसे स्वीकार्य नहीं होता है।नेता का कमजोर होना उनको पसंद नहीं आता है,उनका नेता ऐसा करता है तो उनको बुरा लगता है, वह उसका खुलकर विरोध करते हैं और कहते है उसके बड़े नेता को ऐसा नहीं करना था।पीएम मोदी ऐसे ही बड़े नेता हैं उनके समर्थक उनको कमजोर होते, किसी के सामने झुकते नहीं देख सकते। यही वजह है कि शिक्षामंत्री के इस्तीफा मामले में वह चाहते थे कि पीएम मोदी इस्तीफा न लें।आंदोलन करने वालों को आंदोलन करने दें, आंदोलनकारियों से सख्ती से निबटें।राजनीति में अहंकार कोई मायने नहीं रखता है।कई बार बड़ी जीत के लिए छोटी हार स्वीकार करनी पड़ती है।कई बार बड़ी जीत के लिए छोटी हार जरूरी होती है,इसलिए जो दूरदर्शी नेता होता है वह जानता है कि छोेटी हार के बाद बड़ी जीत है तो उसके छोटी हार कोई मायने नहीं रखती है, उसके लिए बड़ी जीत जरूरी होती है और वह वही करता है जिससे उसको और उसकी पार्टी को ज्यादा फायदा होता है।
राहुल गांधी सहित विपक्ष तो चाहते थे कि दिल्ली के जंतर मंतर में युवाओं को जो आंदोलन चल रहा है, वह जितना लंबा चल सकता है चलना चाहिए।इससे देश में एक धारणा तो बनती है कि देश का युवा मोदी सरकार से नाराज है। राहुल गांधी यही तो चाहते हैं कि देश के लोगों, देश के युवाओं में सरकार की असफलता को लेकर जो नाराजगी है, वह सामने आनी चाहिए। उनके किए धरे तो ऐसा हो नहीं पा रहा था लेेकिन जब सीजेपी के नेताओं ने अपना आंदोलन शुरू किया तो देश के सामने लोगों का गुस्सा सामने आने लगा।इससे देश में धारणा बन रही थी कि लोग मोदी सरकार से बहुत नाराज है।विपक्ष इस आंदोलन के जरिए यह बताना चाहता था कि मोदी सरकार असफल है और उसे लेकर लोगों में गुस्सा है और लोगों को इस बात के लिए तैयार किया जा सकता है कि वह मोदी सरकार को सत्ता से हटाए। लेकिन सीजेपी वह नहीं चाहता तो जो विपक्ष चाहता था, वह मोदी सरकार के खिलाफ दिखते हुए भी मोदी सरकार के खिलाफ नहीं था, वह तो अपने आंदोलन को सफल बनाना चाहता था, वह जानता था कि वह नीट पेपर लीक मामले में मोदी का इस्तीफा मांगेगा तो उनका सफल नहीं हो सकता क्योंकि इसके लिए मोदी तो कभी भी तैयार नहीं होंगे।इसलिए विपक्ष की इच्छा के खिलाफ सीजेपी ने आंदोलन का लक्ष्य शिक्षामंत्री के इस्तीफे तक सीमित रखा और युवाओं को प्रभावित करने के लिए एक यह मांग की जिन युवाओं ने नीट के चलते जान दी है, उनके परिवार को सरकार एक-एक करोड रुपए मुआवजा दे।
सीजेपी की यह मांगें ऐसी थी कि सरकार आसानी से पूरा कर सकती थी। कुछ दिन बाद विपक्ष भी यही मांग करने लगा ताकि युवा आंदोलन सफल हो तो उसका श्रेय विपक्ष को भी मिले। सीजेपी और विपक्ष की मांग एक हो जाने यानी शिक्षामंत्री का इस्तीफा हो जाने पर सरकार के लिए दोनों की मांग को पूरा करना आसान हो गया और एक बार में ही दोनों की मांग को पूरा करना संभव हुआ।सरकार ने एक दिन दोनों की मांग को पूरा कर दिया यानी शिक्षामंत्री से कह दिया गया कि वह अब इस्तीफा दे दें। शिक्षामंत्री के इस्तीफे के बाद सीजेपी व कांग्रेस सहित विपक्ष की मांग एक साथ पूरी हो गई है । इससे सड़क पर जो अराजकता फैलाई जा रही थी, वह बंद हो गई है और संसद के भीतर जो हंगामा कर संसद नहीं चलने दी जा रही थी, उस पर रोक लगने की संभावना बन गई है।
मोदी सरकार जानती थी कि संसद के बाहर सड़क पर जो अराजकता चल रही है, वह जब तक बंद नहीं होगी तो संसद के भीतर जो हंगामा हो रहा है वह भी नहीं रुकने वाला है।युवाओं के नाम पर संसद में हंगामा होता रहेगा।मोदी सरकार के लिए सड़क की अराजकता से ज्यादा जरूरी संसद चलना था क्योंकि युवाओं की समस्या का समाधान तो संसद में हो सकता है,वह पेपर लीक रोकने के लिए जो कानून लाना चाहती है, वह तो संसद के जरिए ही लाया जा सकता है। शिक्षामंत्री का इस्तीफा मोदी सरकार ने लिया है तो संसद चलाने के लिए लिया है।मोदी सरकार के लिए शिक्षामंत्री का इस्तीफा हार है तो छोटी हार है।मोदी सरकार यह छोटी हार इसलिए स्वीकार कर ली है कि उसके लिए संसद मे बड़ी जीत इसको स्वीकार करने पर ही मिल सकती है। इसलिए कहा जा सकता है कि छोटी हार मोदी सरकार की बड़ी जीत की भूमिका है।
संसद में पेपर लीक रोकन कानून पारित होने पर सरकार युवाओं को यह संदेश देने मे सफल होगी कि विपक्ष तो आपके लिए सिफ हंगामा करता है, अराजकता फैलाता है लेकिन सरकार तो वह कर रही है जो आप चाहते हैं यानी देश में अब पेपर लीक न होने देना। पेपर लीक के लिए हंगामा करने से बड़ा काम तो पेपर लीक न होने देने के लिए व्यवस्था बनाना है। इसके बाद संसद चलने पर ही तो वह सारे विधेयक संसद में पेश कर पारित किए जा सकते हैं जिसके लिए संसद सत्र बुलाया गया है।युवाओं का आंदोलन समाप्त होने से संसद के सुचारू चलने का रास्ता साफ हो गया है।शिक्षामंत्री के इस्तीफे का मेन मकसद यही था कि संसद चलने का रास्ता साफ हो और सरकार वह सब विधेयक संसद से पारित करा सके जिनके पारित होने से सरकार को बडी़ जीत मिल सकती है। अब तक हारी हुई सरकार सारे विधेयक पारित हो जाते है तो संसद सत्र के बाद विजयी सरकार दिखेगी क्योंकि वह देश व युवाओं के लिए काम करने वाली सरकार साबित होगी।
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