सीजेआई जो चाहते हैं, वह तो अच्छी बात है लेकिन...

Posted On:- 2026-07-27




सुनील दास

बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के लिए बडी़ बात करना जरूरी होता है क्योंकि वह बडे पद पर बैठकर बड़ी बातें नहीं करेगा तो उसकी इसी बात को लेकर आलोचना होगी कि बड़े पद बैठा व्यक्ति किसी एक पक्ष के बारे में बात कैसे कर सकता है,वह ऐसा करता है तो उसे पक्षपाती और भेदभाव करने वाला बताया जाएगा। बड़े व्यक्ति के पास जब दो पक्षों से संबंधित मामला आता है तो उसके लिए किसी एक पक्ष में कोई बात करना ठीक नहीं माना जाता है, उससे अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसी बात करे जिससे दोनो पक्षों का भला हो। मूल समस्या का समाधान हो।बड़े व्यक्ति के लिए जानना जरूरी होता है कि मूल समस्या क्या है। उसका समाधान क्या हो सकता है। समाधान भी ऐसा होना चाहिए जिसे दोनो पक्ष खुशी खुशी स्वीकारे।समाधान भी ऐसा होना चाहिए फिर वैसी समस्या का सामना दोनो पक्षों का जमीन पर न करना पड़े।

सीजेपी आंदोलन के दौरान पुलिस ज्यादती मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। एक पक्ष का कहना है कि आंदोलन को दबाने के लिए कुचलने के लिए पुलिस ने आंदोलनकारियों के साथ ज्यादती है। मारपीट की है, हिंसा की है। वहीं पुलिस वालों का पक्ष है कि किसी क्षेत्र में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भीड़ जब बाधा बनती है तो उसे बलप्रयोग करना पड़ता है। पुलिस जवानों पर पथराव किया जाता है, उनके साथ मारपीट की जाती है तो उसे बल प्रयोग करना पड़ता है। इस तरह की शिकायते तो हर आंदोलन के बाद सामने आती है और इसका कोई समाधान अब तक तो किया नहीं जा सका है। सीजेआई अगर इस समस्या के समाधान के लिए कुछ करना चाहते हैं तो उसका दोनों पक्षों सहित लोगों को स्वागत करना चाहिए।

दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बेहद अहम टिप्पणी की है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन संविधान से मिला मौलिक अधिकार है और केवल यह कहकर कि कहीं आंदोलन चल रहा था,पुलिस की कथित ज्यादतियों को उचित नहीं ठहराया जा सकता। शीर्ष अदालत ने साफ संकेत दिए कि अब पूरे देश में विरोध-प्रदर्शनों के लिए एक समान प्रोटोकॉल बनाने की जरूरत है, ताकि लोकतांत्रिक अधिकार भी सुरक्षित रहें और कानून-व्यवस्था भी कायम रहे।

यह सच है कि लोकतंत्र में प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था दोनों जरूरी हैं। इसके लिए बहुत किया जा सकता है जैसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के लिए पहले से कोई स्थान निर्धारित और उपयुक्त स्थान तय किया जा सकता है। पदर्शनकारियों की संख्या तय की जा सकती है। इसके बाद भी हिंसा हो तो आंदोलन करने वाले संगठन को दोषी ठहराया जा सकता, हानि की वसूली की जा सकती है। यदि किसी प्रदर्शन में असामाजिक तत्व घुसकर हिंसा फैलाने की कोशिश करें तो उनके खिलाफ कानून के मुताबिक सख्त कार्रवाई की जा सकती है,पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के लिए भी नए और कड़े कायदे कानून बनाए जा सकते हैं कि पुलिस के साथ मारपीट करने पर क्या सजा मिलेगी। सुरक्षा के लिए लगाए बेरिकेड तोड़ने पर क्या सजा होगी,भीड़ के नाम पर लोग बच जाते हैं इसलिए भीड़ में शामिल लोगों को हिंसा करने पर सजा जरूर मिले ऐसी व्यवस्था करनी होगी।

आए दिन होने वाले आंदोलन के दौरान हिंसा को देखते हुए अब जरूरी हो गया है कि  पूरे देश में ऐसा स्पष्ट और एक जैसा प्रोटोकॉल होना चाहिए, जिसमें यह तय हो कि कोई भी व्यक्ति या संगठन यदि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना चाहता है तो उसके लिए क्या प्रक्रिया होगी, किन स्थानों का उपयोग किया जाएगा और प्रशासन की जिम्मेदारियां क्या होंगी।इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकारों के साथ टकराव की बजाय सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, ताकि पूरे देश के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के शासन के साथ ही आत्मानुशासन भी जरूरी है। जब भीड़ जुटती है और वह आत्मअनुशासित हो तो पुलिस की जरूरत नहीं पड़ेगी लेकिन भीड़ में अनुशासन होता नहीं है और वह किसी की नहीं सुनती है, इसी वजह से कानून का शासन जरूरी हो जाता है। भीड़ के लिए कानून का शासन मतलब होता है कि पुलिस ने उसके साथ ज्यादती की है।

आंदोलन के दौरान हिंसा,तोड़फोड़, मारपीट यह आज किसी एक राज्य या एक घटना का मामला नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा राष्ट्रीय महत्व का एक गंभीर प्रश्न है।यह सच है कि शांतिपूर्ण विरोध हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसे दबाया किसी भी तरह से नहीं रोका जाना चाहिए लेकिन उतना ही सच यह भी है कि प्रदर्शन के नाम पर हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान या पुलिस पर हमले को किसी भी कीमत पर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता लेकिन आज कल प्रदर्शन या आंदोलन तब ही सफल माना जाता है जब बहुत भीड़ एकत्र हो और वह सड़क पर हिंसा व अराजकता फैलाए। लोकतंत्र में भीड़ एकत्र करना आसान हैं लेकिन उसे नियंत्रित करना बहुत मुश्किल है। लोकतंत्र में विरोध के लिए भीड़ जरूरी है और समर्थन के लिए भीड़ जरूरी है।भीड़ है तो समस्या है,भीड़ ही सबसे बड़ी समस्या है।



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