लोकतंत्र में लोगों को कई तरह के अधिकार मिले हुए हैं,लोगों को मिले हुए अधिकार का उपयोग करने का हक है,अधिकार का जब सदुपयोग होता है तो उसका सब स्वागत करते हैं कि लोगों ने अपने अधिकार का उपयोग किया। अधिकार के सदुपयोग को कोई अपराध नहीं कहता है लेकिन जब अधिकार का दुरुपयोग होता है तो वह अपराध होता है। लोकतंत्र में हर तरह के अपराध को रोकने के लिए कानून है और पुलिस है।पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना और हर तरह के अपराध को रोकना है।देश के लोग पुलिस से यह अपेक्षा करते हैं कि उसका जो काम है वह अच्छी तरह से करे।जब भी वह अपना काम करती है तो कानून को न मानने वाले लोग,कानून व्यवस्था को बिगाड़ने वाले लोग यही आरोप लगाते हैं कि पुलिस ने अपना काम अच्छे से नहीं किया। हम लोगों के साथ ज्यादती की है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है तो ज्यादातर लोग तो पुलिस के खिलाफ ही शिकायत लेकर पहुंचते है और पुलिस के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हैं।
जंतर मंतर आंदोलन के दौरान संसद मार्च के दौरान पुलिस पर आरोप लगाया है कि उसने प्रदर्शनकारियों के साथ ज्यादती की है यानी उसने अति बल प्रयोग किया है,जितना बल उसे प्रयोग करना था, उससे ज्यादा बल प्रयोग किया है, इससे प्रदर्शनकारियों को चोट लगी है,वह घायल हुए हैं।अदालत को न्याय करना है,एक व्यवस्था देना है ताकि भविष्य इस तरह की घटना न हो इसलिए अदालत जब तक सभी पक्षों की सुन नहीं लेती तब तक कोई फैसला नहीं दे सकती। सभी पक्ष के पीडि़त पक्ष के लोगों की शिकायत सुनने के लिए कोर्ट ने एक उच्चस्तरीय समिति गठन करने का फैसला किया है।यह समिति पुलिस ज्यादती की जांच करेगी, साथ ही यह समिति और भी कई बातों की जांच करेगी,जैसे पुलिस पर किए हमले की जांच करेगी,प्रदर्शन में शामिल अपराधियों के मामले की जांच करेगी।समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद यह तय किया जाएगा जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज है,उनमें किन लोगों का एफआईआर वापस हो सकता है।कुछ लोगों ने आपत्ति की है इसलिए फेशियल रिकग्निशन टेक्नालांजी,सर्विलांस प्राइवेसी और आर्टिकल २१ से जुड़े संवैधानिक सवालों पर फैसला करेगा।
छात्रों का आंदोलन हो या किसी भी वर्ग के लोगों का आंदोलन हो,आंदोलन की अनुमति देते वक्त वह लिखित में देते हैं कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण होगा, कुछ गड़बड़ होती है तो उसके लिए वह जिम्मेदार होंगे तो काेर्ट को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए और आंदोलन शांतिपूर्ण न होने पर आयोजकों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और उसकी सजा भी आयोजकों को मिलनी चाहिए।वह शांतिपूर्ण आंदोलन की जिम्मेदारी लेते हैं तो शांतिपूर्ण आंदोलन उनकी जिम्मेदारी होनी चाहिए। वह यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि असामाजिक तत्व आंदोलन में शामिल हो गए और जो अपराध हुआ है,उसके लिए वह आयोजक जिम्मेदार नहीं है। यह तो पुलिस का काम था कि वह असामाजिक तत्वों को पकड़ती।पुलिस फेशियल रिकग्निशन टेक्नालाजी,सर्विलांस तकनीक का इस्तेमाल कर ऐसा करती है तो वकील लोग काेर्ट में कहते हैं कि पुलिस को यह करने का अधिकार नहीं है,ऐसे में पुलिस कैसे पता कर सकती है कि आंदोलन में असामाजिक तत्व शामिल थे,पुलिस ने इस तकनीक के जरिए है तो पता लगाया है कि २० जुलाई के प्रदर्शन में ऐसे २८०० लोग शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट के सामने पुलिस का पक्ष भी आया है तो इससे पता चलता है कि पुलिस पर जो आरोप लगाया गया है वह आदतन लगाया गया है क्योंकि पुलिस को तो हमेेशा कार्रवाई करने पर और कार्रवाई न करने पर दोनों तरफ से आरोंपो का सामना करना पड़ता है। हकीकत यह है कि पुलिस के लिए जो नियम बने हुए हैं कि किस स्थिति में क्या करना है, वह स्थिति के अनुसार वही करती है।प्रदर्शनकारियों को आंदोलन की अनुमति थी,उनको आंदोलन करने से तो पुलिस ने नहीं रोका,संसद मार्च बगैर अनुमति के किया गया था।वह गैरकानूनी था और पुलिस काम था वह कुछ भी गैरकानूनी न होने दे और पुलिस ने जो कुछ भी किया वह स्थिति के मुताबिक किया।पुलिस ने कोर्ट को बताया है कि स्थिति क्या थी।३० हजार लोग तीन किमी के दायरे में फैले हुए थे।उन्हें नियंत्रित करने के लिए मौके पर पांच हजार पुलिस कर्मी ही थे,भीड़ के नियंत्रण के बाहर होने पर ही संघर्ष हुआ और इस दौरान २४० पुलिस वाले व २०० आम लोग घायल हुए हैं।पुलिस ने ज्यादती की होती तो सिर्फ आमलोग ही घायल हुए होते,पुलिस वाले ज्यादा घायल हुए हैं इससे साफ है कि ज्यादती तो पुलिस वालों के साथ भी हुई जबकि वह संसद,आम लोगों,सरकारी संपत्ति की सुरक्षा के लिए वहां थी। उसने जो किया सुरक्षा के लिए किया।इसके लिए पुलिस वालों की सराहना होनी चाहिए तो आलोचना हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने आंदोलन के बाद जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर हुई है, उसकी सूची मांगी है ताकि जाना जा सके कि किन लोगों की एफआईआर वापस हो सकती है।सुप्रीम काेर्ट को संविधान के अनु्च्छेद १४२ के तहत विशेष शक्ति प्राप्त है कि वह चाहे तो किसी के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस ले सकता है।सुप्रीम कोर्ट ऐसा करता है तो लगना चाहिए कि उसने अपने अधिकार का सदुपयोग किया है,ऐसा नहीं लगना चाहिए कि अपराध करने वालों के एफआईआर वापस लेकर सुप्रीम काेर्ट ने उनको फिर से अपराध करने का मौका दे दिया है।किसी ने भी अपराध किया है तो किए गए अपराध के मुताबिक उसे सजा तो मिलनी ही चाहिए।संसद मार्च करके अपराध किया है,पुलिस पर हमला करके अपराध किया है तो ऐसा करने वालों को सजा जरूर मिलनी चाहिए।संसद मार्च मामले में अभी फैसला आना है,उसके बाद साफ होगा जनता को पता चलेगा कि सुप्रीम कोर्ट ने जो किया वह कितना सही और कितना गलत था।सुप्रीम कोर्ट खुद ही कहता है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए न्याय होते हुए भी दिखना चाहिए तो लोग इंतजार कर रहे हैं कि कैसा न्याय होता है।
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