नई दिल्ली(वीएनएस)।सबसे खतरनाक बात यह नहीं है कि अमेरिका ने हथियार तैनात किए हैं, बल्कि यह है कि उसने यह नहीं बताया कि वे हथियार आखिर हैं क्या। उनकी संख्या कितनी है, वे किस कक्षा में हैं, उनका लक्ष्य क्या हो सकता है, वे किसी उपग्रह को नष्ट कर सकते हैं या केवल उसकी संचार व्यवस्था बाधित कर सकते हैं।
दुनिया ने दशकों तक यह मानकर चलने की कोशिश की कि अंतरिक्ष मानव सभ्यता की साझा उपलब्धि है, लेकिन अमेरिका के ताजा खुलासे ने इस धारणा की बुनियाद हिला दी है। वाशिंगटन ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि उसने अंतरिक्ष की कक्षा में ऐसे हथियार तैनात कर दिए हैं, जिन्हें वह अपने सैन्य बलों को शत्रु की कार्रवाई से बचाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है। अमेरिकी वायु सेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने स्पष्ट किया कि अमेरिका के पास अब कक्षा में तैनात ऐसे अंतरिक्ष-नियंत्रण हथियार हैं, जो संयुक्त सैन्य बलों को शत्रुतापूर्ण कार्रवाई से बचाने में सक्षम हैं। अमेरिकी वायु सेना ने भी पुष्टि की है कि अंतरिक्ष को लेकर उसकी सैन्य तैयारी तेजी से बढ़ रही है और भविष्य के युद्ध में अंतरिक्ष को निर्णायक युद्धक्षेत्र माना जा रहा है।
खतरा बढ़ा रहा है अमेरिका
देखा जाये तो सबसे खतरनाक बात यह नहीं है कि अमेरिका ने हथियार तैनात किए हैं, बल्कि यह है कि उसने यह नहीं बताया कि वे हथियार आखिर हैं क्या। उनकी संख्या कितनी है, वे किस कक्षा में हैं, उनका लक्ष्य क्या हो सकता है, वे किसी उपग्रह को नष्ट कर सकते हैं या केवल उसकी संचार व्यवस्था बाधित कर सकते हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने केवल इतना संकेत दिया है कि अंतरिक्ष-नियंत्रण अभियान में भौतिक और गैर-भौतिक दोनों प्रकार की क्षमताएं शामिल हो सकती हैं। इनमें संचार बाधित करना, उपग्रहों की क्षमता घटाना और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें नष्ट करना तक शामिल हो सकता है।यही अस्पष्टता अपने आप में एक सामरिक हथियार बन जाती है। प्रतिद्वंद्वी को यह पता है कि क्षमता मौजूद है, लेकिन यह नहीं पता कि उसकी सीमा क्या है। यह भय, अनिश्चितता और प्रतिरोध, तीनों को एक साथ जन्म देता है। ट्रॉय मिंक ने भी संकेत दिया कि क्षमता की पूरी जानकारी सार्वजनिक करना उसके प्रतिरोधक प्रभाव को कमजोर कर सकता है। इसलिए अमेरिका ने हथियार दिखाए नहीं, लेकिन दुनिया को यह बता दिया कि वे अंतरिक्ष में मौजूद हैं।
देखा जाये तो अमेरिका की अंतरिक्ष रणनीति को केवल एक नए हथियार की घोषणा मानना बड़ी भूल होगी। इसके पीछे व्यापक सैन्य पुनर्गठन दिखाई देता है। अमेरिका प्रस्तावित ‘स्वर्ण गुंबद’ मिसाइल रक्षा व्यवस्था के लिए अंतरिक्ष आधारित अवरोधक प्रणालियों को भी आगे बढ़ा रहा है। मिंक ने ऐसी प्रणालियों के लिए उड़ान के लिए तैयार उपकरण उपलब्ध होने की बात कही है, जिनका उद्देश्य अंतरिक्ष में ही आने वाली मिसाइलों को नष्ट करना है।
अमेरिकी सैन्य नेतृत्व का संदेश साफ है कि भविष्य का युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आकाश में नहीं लड़ा जाएगा। संचार, नेविगेशन, निगरानी, मिसाइल चेतावनी, लक्ष्य निर्धारण और सैन्य सूचना का विशाल हिस्सा उपग्रहों पर निर्भर है। यानी किसी देश की अंतरिक्ष क्षमता को निष्क्रिय कर देना उसके युद्ध तंत्र की नसों पर प्रहार करने जैसा होगा।अमेरिका अब इसी क्षेत्र में बढ़त को निर्णायक मान रहा है। अमेरिकी वायु सेना ने भी कहा है कि उसे तेजी से बदलते खतरों के बीच अपनी युद्ध क्षमता बढ़ानी होगी और नई तकनीकों को तेजी से सैन्य उपयोग में लाना होगा।
अमेरिकी खुलासे पर भड़के चीन और रूस
उधर, अमेरिका के खुलासे के बाद चीन ने तत्काल विरोध दर्ज कराया है। चीन ने अमेरिका से अंतरिक्ष में सैन्य विस्तार रोकने और बाहरी अंतरिक्ष को युद्धक्षेत्र बनने से बचाने का आग्रह किया है। चीन ने चेतावनी दी है कि ऐसी गतिविधियां अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ को तेज कर सकती हैं। रूस ने भी अमेरिकी कदम की आलोचना करते हुए इसे अंतरिक्ष की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए चिंता का विषय बताया है।यहां असली खतरा किसी एक हथियार से अधिक उस प्रतिक्रिया-श्रृंखला में छिपा है जो इसके बाद शुरू हो सकती है। एक देश अपनी सुरक्षा के नाम पर नई क्षमता विकसित करता है। दूसरा उसे आक्रामक क्षमता मानकर प्रतिरोधी हथियार तैयार करता है। पहला देश फिर उससे भी अधिक उन्नत प्रणाली विकसित करता है। इस तरह युद्ध की शुरुआत किए बिना ही हथियारों की दौड़ तेज हो सकती है।
संधि है लेकिन अमेरिका मानता नहीं
हम आपको यह भी बता दें कि वर्ष 1967 की बाहरी अंतरिक्ष संधि कक्षा में व्यापक विनाश के हथियारों की तैनाती पर रोक लगाती है, लेकिन पारंपरिक हथियारों या उपग्रहों को बाधित अथवा नष्ट करने वाली सभी प्रणालियों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाती। यही कानूनी खाली स्थान अंतरिक्ष युद्ध की नई दौड़ को जटिल बनाता है। अमेरिका का कहना है कि उसकी गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय कानून और युद्ध संबंधी कानूनों के अनुरूप होंगी।लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने का दावा और वास्तविक सामरिक प्रतिस्पर्धा दो अलग विषय हैं। जब अंतरिक्ष में मौजूद कोई प्रणाली दूसरे देश के संचार, निगरानी या सैन्य उपग्रहों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है, तो उसका प्रभाव पृथ्वी पर होने वाले युद्ध से कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।
भारत के लिए यह क्या मायने रखता है?
वहीं भारत के संदर्भ में देखें तो देश पहले ही वर्ष 2019 में ‘मिशन शक्ति’ के माध्यम से अपनी उपग्रह-विरोधी क्षमता का प्रदर्शन कर चुका है। हालांकि भारत ने अमेरिका की तरह कक्षा में तैनात किसी हथियार की सार्वजनिक घोषणा नहीं की है। भारत ने अंतरिक्ष स्थिति की निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी क्षमताओं में भी प्रगति की है। दक्षिण-एशियाईऔर प्रवासीहालांकि भारत को अपनी उपग्रह व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, विकेंद्रीकृत और बहुस्तरीय बनाना होगा। एक ही उपग्रह या एक ही संचार प्रणाली पर निर्भरता घटानी होगी। अंतरिक्ष में संदिग्ध गतिविधियों की पहचान के लिए निगरानी क्षमता बढ़ानी होगी। इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप से बचाव, सुरक्षित सैन्य संचार, वैकल्पिक नौवहन व्यवस्था और उपग्रहों की क्षति के बाद तेजी से क्षमता बहाल करने की व्यवस्था को राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताओं में ऊपर लाना होगा।साथ ही, भारत को अंतरिक्ष युद्ध के लिए केवल रक्षात्मक सोच तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रतिरोधक क्षमता का अर्थ यह भी है कि संभावित विरोधी को पता हो कि भारत की अंतरिक्ष आधारित सैन्य संरचना पर हमला एकतरफा लाभ नहीं देगाउधर, अमेरिका की घोषणा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक अनुसंधान या संचार का क्षेत्र नहीं रह गया है। वह सैन्य शक्ति का अगला निर्णायक आयाम बन चुका है। अमेरिका ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर दुनिया को बता दिया है कि वह भविष्य के युद्ध की तैयारी पृथ्वी की सतह पर ही नहीं, पृथ्वी की कक्षा में भी कर रहा है।
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