अमित शाह ने सरकारी कामकाज में बढ़ाई हिंदी की पैठ, तकनीक और अनुवाद पर दिया जोर

Posted On:- 2026-09-18




नई दिल्ली(वीएनएस)।केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को जोड़ने के लिए कई तकनीकी व प्रशासनिक पहल की गई हैं। शाह हिंदी को अन्य भाषाओं की प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि परस्पर संवाद की समावेशी भाषा मानते हैं। उनका यह दृष्टिकोण भाषायी विविधता का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की हिंदी सेवा एक नहीं, अनेक दृष्टियों से ध्यान देने योग्य है। मूलतः गुजरातीभाषी शाह स्वयं हिंदी में काम करते हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर हिंदी में सरकारी कामकाज बढ़ा है। शाह के कारण सरकारी पत्रावलियां हिंदी में बनती हैं। शाह के मार्गदर्शन में केंद्रीय गृह मंत्रालय राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं, अनुवाद-कार्य और हिंदी-सलाहकार समितियों के माध्यम से लगातार प्रयासरत है। शाह हिंदी को प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, पत्रकारिता और उच्च ज्ञान-विमर्श की भाषा बनाने के लिए गुणवत्तापूर्ण सामग्री, आधुनिक शब्दावली और अनुवाद की मजबूत व्यवस्था की अनवरत हिमायत करते हैं।
हिंदी के प्रति अमित शाह का लगाव केवल औपचारिक राजभाषा-नीति तक सीमित नहीं दिखाई देता। वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के अवसर पर उन्होंने हिंदी को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ा था। गत वर्ष 2025 में भी शाह ने हिंदी दिवस पर आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में हिंदी के संवर्धन से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर बल दिया था।
पिछले एक वर्ष में माननीय गृह मंत्री जी के नेतृत्‍व में राजभाषा विभाग ने हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के लिए भी कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। जून 2025 में भारतीय भाषा अनुभाग की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाना और उन्हें तकनीक तथा प्रशासन से जोड़ना है। इस पहल से राजभाषा विभाग के काम का दायरा भी व्यापक हुआ है। विभाग ने नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों यानी नराकासों के काम को प्रोत्साहित करने के लिए ‘नराकास प्रोत्साहन सम्मान’ की व्यवस्था भी शुरू की है। इससे उन नराकासों को आगे आने का अवसर मिलेगा, जो अपने क्षेत्र में राजभाषा के काम को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा रही हैं।
दयानंद सरस्वती, गांधी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह - इन चारों की हिंदी संबंधी दृष्टियों को एक साथ देखने पर हिंदी के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र निकलता है: हिंदी जितनी जनभाषा होगी, उतनी ही प्रभावी होगी; जितनी समावेशी होगी, उतनी ही स्वीकार्य होगी; और जितनी भारतीय भाषाओं से जुड़ेगी, उतनी ही समृद्ध होगी।
हिंदी प्रेम का सर्वोच्च रूप हिंदी को दूसरों पर थोपना नहीं, बल्कि उसे ऐसा सक्षम माध्यम बनाना है जो भारत की विविध आवाजों को एक-दूसरे तक पहुँचाए। दयानंद ने हिंदी को जनजागरण का माध्यम बनाया, गांधी ने उसे राष्ट्रीय संवाद की शक्ति दी और आज हिंदी के सामने डिजिटल युग में विश्वव्यापी संवाद की नई संभावनाएँ हैं। इन पड़ावों को जोड़कर देखा जाए तो हिंदी की यात्रा केवल एक भाषा की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में संवाद, जागरण और आत्मविश्वास की यात्रा भी है। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, वह समाज की स्मृति, संस्कृति और सामूहिक चेतना को भी अपने भीतर संजोए रहती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा का प्रश्न इसलिए और अधिक संवेदनशील हो जाता है।




Related News

thumb

अपनी पार्टी का इतिहास भी नहीं जानते राहुल गांधी,सुधांशु त्रिवेदी का...

चुनाव आयोग द्वारा टीएमसी का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज करने के फैसले पर राहुल गांधी ने भाजपा और आयोग पर विपक्षी दलों को तोड़ने का आरोप लगाया।


thumb

हम साथ हैं...ममता बनर्जी की पार्टी का सिंबल फ्रीज होते ही आया राहुल...

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की है। यह निर्णय टीएम...


thumb

1947 में सिर्फ सियासी आजादी मिली, कल्चरल आजादी नहीं: राजनाथ सिंह का...

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कोच्चि में कहा कि भारत को 1947 में राजनीतिक आज़ादी मिली, लेकिन सांस्कृतिक आज़ादी नहीं। उन्होंने पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता ...


thumb

टीएमसी चुनाव चिन्ह: ममता गुट को फुटबॉल खिलाड़ी और अरूप रॉय खेमे को ...

पश्चिम बंगाल में छह अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उपचुनाव के लिए निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अंतरिम नाम और नए ...