बैठक से साबित किया फैसला मिलकर लेते हैं...

Posted On:- 2026-09-27




सुनील दास

चुनाव आयोग के तीनो सदस्यों के बीच किसी बात की असहमति को कड़ा विरोध मानकर माहौल बनाया जा रहा था कि चुनाव आयोग ने अब तक जो फैसले लिए हैं, वह गलत हैं,वह अवैध हैं।चुनाव आयोग के यह साफ कर देने के बाद भी विपक्ष मानने को तैयार नहीं था कि तीनों ने सारे फैसले कुछ बातों पर असहमत होते हुए भी आम सहमति से लिए गए हैं।देश में मांग भी की जा रही थी कि चुनाव आयोग को विज्ञप्ति जारी करने की जगह तीनों चुनाव आयुक्तों को बैठक लेकर साफ कर देना चाहिए कि उनके बीच कुछ बातों को लेकर असहमति होती है और वह निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन अंतिम फैसला आमसहमति से लिया जाता है यानी कि फैसले के कागज पर तीनों नहीं तो दो के दस्तखत होते ही हैं। यानी कानूनी तौर पर चुनाव आयोग ने जो फैसले लिए हैं वह सही तरीके के लिए गए हैं।तीनों चुनाव आयुक्त ने एक बैठक लेकर यह साबित किया है कि उनके बीच असहमति हो सकती है लेकिन जब भी वह कोई फैसला करते हैं तो आमसहमति से करते है और संयुक्त बैठक में फैसलों की जानकारी देते भी हैं।
शनिवार को हुई चुनाव आयोग में बैठक आमसहमति से लिए गए फैसलों की जानकारी तीनों ने दी है और तीनों के बीच किसी तरह के विरोध को पूरी तरह खारिज कर दिया है।एसआईआर को लेकर चल रहे विवाद पर तीनों की बैठक में बताया गया है कि एसआईआर से सभी आदेश तीनों आयुक्तों की मंजूरी के बाद जारी किए गए हैं।फार्म ६ में किए गए बदलावों को उच्चतम न्यायालय ने बरकरार रखा है।जिन लोगों के नाम एसआईआर में कट गए हैं,उनके दावे व आपत्तियों की समयसीमा बढ़ाई गई है।यानी उनके नाम जोड़े जाएंगे।इसके लिए लोगों को चुनाव आयोग के दफ्तर नहीं आना होगा,बीएलओ उनके घर जाकर दस्तावेज लेंगे।इसके अलावा वोटर लिस्ट में भी नाम जाेडे जाएंगे।चुनाव आयोग अपने बैठकों का सभी एजेंडा पहले से साझा करेगा।यह तमाम फैसले तीनों आयुक्त ने लिए है और तीनों ने बैठक में बताए हैं।यानी विपक्ष ने जो सवाल उठाए तीनों आयुक्तों ने बैठक में जवाब दे दिया है और साबित कर दिया है कि विपक्ष जो कुछ कह रहा है या प्रचारित कर रहा है,वह सही नहीं है।यानी राहुल गांधी व विपक्ष जिस नरैटिव के गुब्बारे में दो दिन से हवा भर रहे थे और उसे गंभीर मुद्दा बताने का प्रयास कर रहे थे, उसकी हवा चुनाव आयोग की बैठक के बाद निकल गई है।
वर्ष 1993 के पहले चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ही हुआ करते थे,इसलिए चुनाव आयोग में किसी मुद्दे पर असहमति का सवाल ही नहीं होता था लेकिन १९९३ के बाद चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय संस्था बनाया गया तो माना तो यही गया था कि उनके बीच किसी मुद्दे पर असहमति हो सकती है, इसलिए यह नियम बनाया गया था कि यदि किसी मुद्दे पर असहमति तो फैसला दो के बहुमत से लिया जाए। वर्ष 1993 में चुनाव आयोग को स्थायी रूप से तीन सदस्यीय संस्था बनाए जाने के बाद से ही उसके भीतर मतभेद सामने आते रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन और निर्वाचन आयुक्त एम.एस. गिल तथा जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति के बीच तीखे मतभेद हुए थे। साल 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी।2019 में निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के विरुद्ध आदर्श आचार संहिता की शिकायतों पर आयोग के बहुमत से अलग राय दर्ज की थी।ऐसे में आज यदि दो निर्वाचन आयुक्त किसी प्रक्रिया पर टिप्पणी या आपत्ति दर्ज करते हैं यह कोई संवैधानिक संकट है, कोई ऐसा मानता है तो यह इतिहास और कानून दोनों की जानबुझकर की गई अनदेखी है।
इस बार हुआ क्या है? इस बार चुनाव आयोग के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े कुछ निर्णयों पर पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 बार आपत्तियां या टिप्पणियां दर्ज कीं। आयोग ने इसे स्वीकार किया है,इसे आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा बताया है तथा कहा है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। 
यह समझने वाली बात यह है कि असहमति दर्ज करने का मतलब फैसले में शामिल नहीं होना नहीं लेकिन यह समझने व समझाने का प्रयास किया गया। यदि किसी संस्था में सवाल पूछने की अनुमति ही न हो तो वह संस्था मजबूत नहीं मानी जाती है लेकिन सवाल पूछे जाने के बाद कानून के मुताबिक अंतिम फैसला हो, उसका रिकॉर्ड रहे और उस फैसले को चुनौती देने की वैधानिक व्यवस्था हो तो लिए गए फैसले को गलत नहीं कहा जा सकता। 
यहां यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि चुनाव आयोग के फैसलों का मुल्यांकन उनके मतभेदों के आधार पर क्यों किया जा रहा है। चुनाव आयोग के फैसलों का मूल्यांकन तो उसके परिणाम से किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग ने २०२५ के बाद जो चुनाव कराए हैं। क्या निष्पक्ष नहीं थे, क्यों पिछले चुनावों से बेहतर नहीं थे, क्या पिछले चुनावों से ज्यादा लोगों ने वोट नहीं डाले।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में 67.13 प्रतिशत मतदान 1951 के बाद राज्य में सबसे अधिक रहा। महिला मतदाताओं की भागीदारी 71.78 प्रतिशत रही। कहीं कोई पुनर्मतदान नहीं कराया गया और एसआईआर के बाद मतदाता सूची में गलत तरीके से नाम जोड़ने या हटाने के संबंध में कोई अपील प्राप्त नहीं हुई।2026 में तमिलनाडु में लगभग 85.05 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ। केरल में 78.03 प्रतिशत मतदान हुआ, जो पिछले विधानसभा चुनाव से अधिक था। असम में 85.38 प्रतिशत और पुडुचेरी में 89.83 प्रतिशत मतदान हुआ। दोनों राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश ने विधानसभा चुनावों में अपने अब तक के सर्वोच्च मतदान का रिकॉर्ड बनाया।राहुल गांधी व विपक्ष को निरंतर हार के कारण चुनाव आयोग की सफलता दिखाई नहीं देती है।जबकि हकीकत यह भी है कि चुनाव आयोग बेहतर चुनाव करा रहा है और उसके कारण कई राज्यों में कांग्रेस व विपक्ष भी जीते है।



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