आशीष तिवारी (संपादक)
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मनुष्य में मौजूद ईश्वरीय तत्व का ज्ञान आवश्यक : बाबा प्रियदर्शी

Posted On:- 2022-07-16




रायगढ़ (वीएनएस)। आनंद की मौजूदगी के बावजूद उसे भूलने के वजह की व्याख्या करते हुए बाबा प्रियदर्शी ने गुरुपूर्णिमा के आशीर्वचन पर कहा कि आज हम आत्मानंद की अनुभूति को भूल बैठे है l माता के गर्भ में  ईश्वर को दिए गए  वचन को जन्म के साथ ही भूलकर पुनः कर्म बंधन में फंस कर रह जाते है l वास्तविक आनंद पाने के लिए आत्मानुभूति की ओर कदम बढ़ाना होगा l जिसके पास अध्यात्म में चलने का साहस हो वही आत्मनिभूति को आसानी से पा सकता है l गुरु अध्यात्म की राह में चलने की प्रेरणा देता है l विनम्रता को जीवन का सबसे बड़ा गुण निरूपित करते हुए कहा बाबा प्रियदर्शी राम ने कहा  कि विनम्रता गुण मनुष्य को ऊंचाइयों तक ले जाता है l उपनिषद से श्वेत केतू का दृष्टांत का उदाहरण  देते हुए बताया कि मिट्टी को समझ लेने मात्र से ही मिट्टी से बने बर्तनों का ज्ञान हो जाता है l उसी तरह सोने को जान लेने से सोने (स्वर्ण) से निर्मित सभी गहनों का ज्ञान हो जाता है l ठीक  उसी तरह पूरी  सृष्टि का मूल तत्व ईश्वर है l ईश्वर के  ज्ञान  से समग्र सृष्टि का ज्ञान हो जाता है l बरगद के बीज को देखकर विशालकाय बरगद की कल्पना  संभव नही है l लेकिन  ब्रह्म ही इस सृष्टि में यह संभव है l  निराकार होते हुये भी विशाल सृष्टि के कण-कण में ईश्वरत्व मौजूद है । पूज्य प्रियदर्शी ने समाज में बढ़ रही भेद भाव की खाई के मद्देनजर कहा कि सभी प्राणियों में मौजूद परम पिता के अंश का ज्ञान आवश्यक है तभी जाति- पाँति ,उंच-नीच भेद भाव जैसी  दुर्भावनाये खत्म होगी और  सबके साथ समानता का भाव पैदा होगा l तभी समदर्शी बन सकेंगे l जब हम यह जान लेते है कि सबके अंदर ईश्वर ही मौजूद है l फिर विरोध स्वत: ही समाप्त हो जाएगा l जीवन में  ईर्ष्या,घृणा, द्वेष का कोई स्थान नहीं रह जायेगा l गुरु व संत का जीवन शिष्यों के लिए मिशाल है l इनसे हासिल करने के  लिए धैर्य के साथ उनके बताए मार्ग का अनुकरण करना चाहिए l हड़बड़ी को छोड़कर  अपने अंदर मौजूद  मद,मोह,छल कपट जैसे विकारों का परित्याग कर ज्ञान ग्रहण करने की अवस्था को हासिल करना है l गुरु हमारे अंदर मौजूद अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर उसे ज्ञान के प्रकाश से भर देते है l  और उसके अंदर मौजूद संभावनाओ को विकसित कर उसे आदर्श व्यक्ति बनाकर राष्ट्र निर्माण से जोड़ देते हैं l गुरु पूर्ण मां का दायित्व निभाता है मां जन्म देती है लेकिन गुरु माता का स्नेह देकर हर प्रकार से सरंक्षण करते हुए मार्गदर्शन देता है l क्षमता के अभाव की वजह से कई बार शिष्य गुरु ज्ञान से वंचित हो जाते है l जब तक मन में अनुसंधान की जिज्ञासा न हो l जो व्यक्त है उसके बारे में मन सदैव उलझा होता है लेकिन जो अव्यक्त है उसके बारे में कभी नही सोचते l ईश्वर के तत्त्व ज्ञान को सबसे अधिक आवश्यक बताते हुए कहा कि सुखों की तलाश में यह भूल गए कि आखिर वास्तविक आनंद बाहर है या अंदर है l सुख बाहरी नही बल्कि वह आत्मा में हमेशा मौजूद रहने वाला भाव है l बाबा प्रियदर्शी राम ने बताया कि सुख प्राप्ति से ज्यादा आवश्यक दुखों से मुक्ति का मार्ग तलाशना है l अधिकांश मनुष्य इससे अनभिज्ञ रहते है l बाबा प्रियदर्शी ने दुखो से मुक्ति का सरल मार्ग बताते हुए कहा कि  भ्रम से मुक्ति ही दुखो से मुक्ति का मार्ग है l हर मनुष्य  सत्य की व्याख्या अपनी अपनी सुविधा के  अनुसार करता है जिससे भ्रमित होना निश्चित है  ऐसे में जीवन के वास्तविक स्वरूप का बोध आवश्यक है प्रत्येक मनुष्य तर्क विश्लेषण के माध्यम से वास्तविक  तथ्य तक पहुंच सकता है l समाज में फैल रही विसंगतियों के बारे में प्रियदर्शी राम ने कहा कि समुद्र मंथन के बाद निकले विष को कोई ग्रहण नहीं करना चाहता l ऐसे विष को ग्रहण कर  महादेव तो  नील कंठ बन गए लेकिन अमृत ग्रहण करने वाले अमृत कंठ बनने से वंचित हो गए l केवल आशीर्वाद जीवन में बदलाव नही ला सकता l सिर्फ ज्ञान का  अमृत पान मनुष्य जीवन  को नही बदल सकता l हर व्यक्ति का हृदय समुद्र के समान विशाल है l जिसमे हर पल मंथन की प्रक्रिया चलती है l इसके साथ साथ मन मंथन की प्रक्रिया आवश्यक है l जब तक मन मंथन  से वैचारिक विष बाहर नही निकलेगा  तक अंदर मौजूद अमृत का दुरुपयोग होता रहेगा l आंसुओ को छुपाकर मुस्कान का सहारा लेने वाले व्यक्ति को महान बताते हुए पूज्य पाद ने आशीर्वचन में कहा कि कोई व्यक्ति हमारी वजह से सुरक्षित महसूस करे तो ऐसे मानव का चिंतन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है l यदि किसी वेदना को सहने से संसार का कल्याण होता है तो सहने वाले के लिए यह बहुत बड़ा  सौभाग्य है l अघोर पीठ ट्रस्ट बनोरा के संस्थापक ने समाज को इस तथ्य से अवगत कराया कि अभिमानी सदैव ईश्वर द्वारा प्रदत्त दिव्य शक्तियों से वंचित होता है

देश सुरक्षित रखने अध्यात्म का ज्ञान आवश्यक
राष्ट्रीय विचारधारा के खिलाफ भड़काने के षड्यंत्र पर भी बाबा प्रियदर्शी राम ने चिंता जाहिर की l उन्होंने देश को सुरक्षित रखने के लिए अध्यात्म का ज्ञान आवश्यक बताया l यूवाओ को भटकाव से रोकने सामाजिक विचार धारा से जुड़ना होगा l अन्यथा ऐसे भटके हुए यूवाओ से राष्ट्र का नुकसान होगा l किसी के कहने मात्र से भड़कावे में नही आना चाहिए l देश में अच्छा माहौल देने की दिशा मे पालको को भी चिंतन करना चाहिए l

बच्चो में मोबाइल का बढ़ता क्रेज चिंतनीय
माताएं अपनी परेशानियों से निजात पाने बच्चो के हाथो में मोबाइल थमा देती है l कोरोना के दौरान ऑन लाइन पढाई की बाध्यता की वजह से भी इसका इस्तेमाल बढ़ा है l मोबाइल की वजह से हमारी संस्कृति नष्ट हो रही है l मानसिक क्षति का बहुत बड़ा कारण है l सरकार को भी इसके नियंत्रण की दिशा में कदम उठाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को इसके दुरुपयोग से बचाया जा सके l



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