बेमेतरा (वीएनएस)। जिले के ग्राम पथर्रा निवासी प्रगतिशील कृषक कमलेश साहू ने इस वर्ष खेती में एक सराहनीय और दूरदर्शी निर्णय लेते हुए ग्रीष्मकालीन धान की पारंपरिक खेती के स्थान पर सरसों की फसल को अपनाया है। लगभग 7 एकड़ क्षेत्र में सरसों की खेती कर उन्होंने यह सिद्ध किया है कि परिस्थितियों और संसाधनों के अनुरूप फसल चयन से खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।
परिवर्तन के पीछे की सोच
श्री साहू ने बताया कि ग्रीष्मकालीन धान की खेती में अत्यधिक पानी, श्रम और लागत की आवश्यकता होती है, जिससे उत्पादन लागत लगातार बढ़ती जा रही थी। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वैकल्पिक फसल के रूप में सरसों को चुना। सरसों एक प्रमुख तिलहनी फसल है, जो कम पानी, कम समय और अपेक्षाकृत कम लागत में तैयार हो जाती है। कृषि विभाग द्वारा दी गई तकनीकी जानकारी, मार्गदर्शन एवं अपने पूर्व अनुभव के आधार पर उन्होंने यह निर्णय लिया।
वैज्ञानिक पद्धतियों से किया गया फसल प्रबंधन
श्री साहू द्वारा सरसों की खेती में वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाया गया है, जिनमें प्रमुख रूप से उन्नत एवं प्रमाणित किस्म के सरसों बीजों का उपयोग, मृदा परीक्षण के अनुसार अनुशंसित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग, समय-समय पर निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण, कीट एवं रोग प्रबंधन के लिए आवश्यकतानुसार उपचार, आवश्यकता आधारित सिंचाई, जिससे जल संरक्षण सुनिश्चित हुआ | इन सभी प्रयासों का सकारात्मक परिणाम यह है कि वर्तमान में सरसों की फसल पूर्णतः स्वस्थ, सुदृढ़ एवं संतोषजनक अवस्था में है।
उत्पादन की उज्ज्वल संभावनाएँ
फसल की वर्तमान स्थिति को देखते हुए पौधों में अच्छी बढ़वार तथा फलियों की संख्या अधिक दिखाई दे रही है, जिससे उत्कृष्ट उत्पादन की प्रबल संभावना बन रही है। श्री साहू को उम्मीद है कि सरसों की फसल से उन्हें ग्रीष्मकालीन धान की तुलना में कम लागत में अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त होगा।
आर्थिक लाभ के साथ जल संरक्षण
इस फसल परिवर्तन से न केवल आर्थिक लाभ की संभावना है, बल्कि जल संरक्षण और समय की बचत भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। कम सिंचाई की आवश्यकता होने के कारण जल संसाधनों पर दबाव कम हुआ है, जो वर्तमान परिस्थितियों में अत्यंत आवश्यक है।
अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत
कमलेश साहू की यह पहल क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए एक प्रेरणास्रोत है। यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि किसान बदलती परिस्थितियों, जल उपलब्धता और बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए फसल चयन करें, तो खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है। ग्रीष्मकालीन धान के विकल्प के रूप में सरसों एवं अन्य तिलहनी फसलों को अपनाकर किसान अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं। निस्संदेह, श्री कमलेश साहू की यह पहल एक उभरती हुई सफलता की कहानी है, जो यह प्रमाणित करती है कि सही निर्णय, वैज्ञानिक तकनीक और नवाचार से किसान आत्मनिर्भरता और समृद्धि की ओर बढ़ सकता है।
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