हर्रा वनौषधि प्रसंस्करण से स्व सहायता समूह की महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर

Posted On:- 2026-04-16




इच्छापुर के समूह ने अब तक 75 लाख रूपए के वनौषधि उत्पादों का किया निर्माण

उत्तर बस्तर कांकेर (वीएनएस)। जिला वनोपज सहकारी यूनियन मर्यादित कांकेर अंतर्गत वनधन योजना ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का कार्य किया है। हर्रा वनौषधि प्रसंस्करण केन्द्र इच्छापुर आज आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरा है।

वनधन विकास केन्द्र इच्छापुर की स्थापना पश्चात मर्दापोटी क्लस्टर अंतर्गत 17 ग्रामों के 2137 परिवार जुड़े हैं, इनमें से 1512 परिवार लघु वनोपज संग्रहण से अपनी आजीविका चला रहे हैं। जिला प्रशासन द्वारा खनिज विकास निधि मद के माध्यम से पलवेराइज़र मशीन, पैकेजिंग सामग्री, लेबल एवं अन्य आवश्यक सामग्री समूह को प्रदाय कर प्रसंस्करण केंद्र का संचालन प्रारंभ कराया गया। हर्रा वनौषधि प्रसंस्करण केन्द्र का संचालन इंदिरा वन मितान स्वसहायता समूह के  अध्यक्ष  नरसिंह तेता, सदस्य श्रीमती अनिता कावड़े, कविता और असिता के द्वारा किया जा रहा है। 10 सदस्यीय समूह की महिलाओं ने पहले वनौषधियों का संग्रहण, प्रसंस्करण और पैकेजिंग का कार्य शुरू किया, जिससे उन्हें स्थानीय स्तर पर ही रोजगार प्राप्त हुआ है। इस केन्द्र में वर्तमान में 08 प्रकार के वनौषधि उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जिसमें हर्रा, बहेड़ा, त्रिफला, अश्वगंधा, सफेद मूसली, नीम, सतावरी एवं आंवला चूर्ण शामिल है। उत्पादों को निर्धारित मानकों के अनुसार पैकेजिंग कर बाजार में उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे उनकी गुणवत्ता और पहचान दोनों में वृद्धि हुई है। इसके लिए समूह की महिलाओं को समय-समय पर विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य के आयुर्वेद विभाग एवं राज्य संघ मुख्यालय द्वारा तकनीकी सहयोग प्रदान किया जा रहा है, जिससे उत्पादों की गुणवत्ता में निरंतर सुधार हो रहा है। वर्तमान में हर्रा वनौषधि केन्द्र का संचालन इंदिरा वन मितान स्व-सहायता समूह इच्छापुर द्वारा किया जा रहा है। विगत चार वर्षों में 75 लाख 76 हजार 375 रूपए का प्रसंस्कृत वनौषधि उत्पादों का निर्माण कर मार्ट कांकेर को आपूर्ति की गई है, इससे प्रत्येक सदस्यों को प्रतिवर्ष 35 से 40 हजार रूपए तक की आय प्राप्त हो रही है। स्वसहायता समूह की सदस्यों ने बताया कि पहले वे गांवों में मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करती थीं। गांवों में कभी-कभार मजदूरी मिलने के कारण उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। लेकिन उन्होंने समूह के रूप में संगठित होकर वनौषधि प्रसंस्करण के क्षेत्र में कदम रखा और आयुर्वेदिक उत्पादों का निर्माण शुरू किया। शुरुआत में संसाधनों की कमी, बाजार की जानकारी का अभाव और तकनीकी चुनौतियां सामने आईं, लेकिन उनके मजबूत संकल्प, मेहनत और सामूहिक प्रयास ने हर बाधा को पार कर लिया। आज वही महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं और अपने परिवारों के साथ-साथ समाज में भी एक सशक्त पहचान बना चुकी हैं। अब वे न केवल अपने परिवार की जरूरतें पूरी कर पा रही हैं, बल्कि समाज में अपनी पहचान मजबूत की है। उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और वे अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही हैं।



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