केजरीवाल देश में एक ऐसे नेता हैं जो वह काम करते हैं जो काम कोई नेता करने की सोचता नहीं है।कोई नेता किसी जज या अदालत के साथ राजनीति करने से डरता है लेकिन केजरीवाल ऐसे नेता हैं जो अदालत व जज के साथ राजनीति करने से नहीं डरते हैं। आबकारी घोटाले में केजरीवाल का पहला दांव जज को हटाने का फेल हो गया है तो उन्होंने अब दूसरा दांव चल दिया है कि वह न खुद अदालत में पेश होंगे और न ही उनकी तरफ से अदालत में कोई वकील पेश होगा। वह इसे सत्याग्रह का नाम दे रहे हैं और जनता को बताने का प्रयास कर रहे हैं कि अदालत उनके साथ अन्याय कर रही है और वह अदालत के किए जा रहे अन्याय के विरोध में सत्याग्रह कर रहे हैं।यानी वह एक तरह से अदालत का बहिष्कार कर रहे हैं और चुनौती दे रहे है कि मैं अदालत नहीं जाऊंगा तो अदालत को जो करना है कर ले। ऐसा करके केजरीवाल व सिसोदिया ने गेंद अदालत के पाले में डाल दी थी।
आबकारी घोटाले मामले में केजरीवाल व सिसोदिया ने भले ही सुनवाई से खुद को अलग कर लिया हो लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने आप नेताओं सहित अऩ्य प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए बुधवार को एक और मौका दिया है। सीबीआई की अपील याचिका पर न्याय मूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की पीठ ने कहा है कि आप नेताओं सहित सभी प्रतिवादियों ने अब भी जवाब दाखिल नहीं किया है।ऐसे में सभी प्रतिवादियों को शनिवार तक जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका दिया जाता है।साथ ही अदालत ने ट्रायल कोर्ट को मामले से जुड़े सभी रिकार्ड पेश करने का निर्देश दिया है।ऐसा करके अदालत ने केजरीवाल सिसोदिया के पाले में गेंद डाल दी है।केजरीवाल ने उनका मामला खारिज हो जाने पर जैसा राजनीति में करते हैं वैसा ही अब भी किया है उन्होंने जज के नाम पत्र लिखा और उसे सार्वजनिक भी कर दिया और जनता को बताने की कोशिश की कि अब वह भी महात्मा गांधी की तरह अतंरात्मा की आवाज सुनकर सत्याग्रह करने का फैसला किया है। यानी अब वह कानूनी लड़ाई नहीं लड़ेंगे वह नैतिक व वैचारिक विरोध का रास्ता अपनाएंगे।उनका यह कदम न्याय व्यवस्था के खिलाफ नहीं है।बल्कि अपने सिध्दांतों के समर्थन में है और वह अपने इस फैसले का जो भी नतीजा होगा वह भुगतने को तैयार हैं।
केजरीवाल क्या कर रहे है, इसे केजरीवाल जितने अच्छे से समझ रहे हैं, उसे अदालत व जज भी समझ रहे हैं कि केजरीवाल उनके सामने यह चुनौती पेश कर रहे हैं कि अदालत की कोई भी कार्रवाई तब ही ठीक समझी और मानी जाती है जब अदालत दोनों पक्षों की दलीले सुनती हैं, पेश किए सबूत को देखती है और उसके बाद ही अदालत कोई फैसला करती है। कोई भी अदालत किसी पक्ष को सुने बगैर कोई फैसला नहीं दे सकती। इस बात को केजरीवाल भी समझ रहे है और अदालत भी समझ रही है।यही वजह है कि अदालत ने केजरीवाल सहित सभी प्रतिवादियों को अब तक अदालत में कोई जवाब दाखिल नहीं करने पर आखिरी मौका शनिवार तक जवाब दाखिल करने को दिया है। इससे अदालत पर यह आरोप कोई नहीं लगा पाएगा कि अदालत ने उनका पक्ष सुने बगैर कोई फैसला कर दिया।
अदालत केजरीवाल सहित सभी प्रतिवादियों को आखिरी मौका दे दिया है यानी गेंद केजरीवाल के पाले में डाल दी है और अब भी अगर वह शनिवार को कोई जवाब दाखिल नहीं करते हैं तो अदालत जो कार्रवाई कर सकती है वह करेगी।कानून के जानकार लोगों के मुताबिक ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर होने पर जब संबंधित अदालत प्रतिवादी को नोटिस जारी कर जवाब मांगती है तो उसका कोर्ट के समक्ष स्वयं या वकील के माध्यम से पेश होना अनिवार्य होता है।कार्रवाई का बहिष्कार करने की स्थिति में अदालत संबंधित प्रतिवादी के खिलाफ कानून के तहत पहले जमानती व बाद में गैरजमानती वारंट जारी कर सकती है।इसके अलावा नोटिस जारी होने के बाद मामलें मे अदालत या तो केजरीवाल की तरफ से बिना जिरह सुने एक पक्षीय निर्णय पारित कर सकती है या फिर प्रतिवादी की तरफ से जिरह पेश करने के लिए न्याय मित्र नियुक्त कर सकती है।
हमारे देश में न्यायाधीश को राजनीतिक दृषि्ट से देखने की प्रवृत्ति को ठीक नहीं माना जाता है।केजरीवाल यही कर रहे है। उनका तर्क यही है कि जज संघ के कार्यक्रम में गई इसलिए उनका वैचारिक जुड़ाव संघ के साथ है और इसीलिए वह उनके साथ न्याय नहीं कर सकती। इसलिए उनको मेरे मामले हट जाना चाहिए। जज ने हटने से मना कर दिया तो केजरीवाल न्यायाधीश को उसी नजर से देख रहे हैं जिस नजर से वह संघ को देखते हैं।सही बात तो यह है कि राजनीतिक मुद्दों पर संघर्ष सड़क व संसद में होना चाहिए, अदालत में नहीं लेकिन केजरीवाल तो केजरीवाल है वह विक्टिम कार्ड खेलने के लिए कुछ भी कर सकते हैं और जनता के बीच जाकर कह सकते है। वह तो उनके साथ हो रहे अन्याय का विरोध कर रहे हैं। वह अदालत का बहिष्कार कर रहे हैं,अदालत को जाे करना है करे वह भुगतने को तैयार हैं।
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