देश में सबसे सफल राजनीतिक नेता उसे ही माना जाता है जो राजनीति में आने के बाद एक के बाद दूसरा चुनाव जीतकर देश का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल दे।पीएम मोदी ऐसे ही नेता हैं। उनके राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद देश का जो राजनीतिक नक्शा था आज १२ साल बाद वह नक्शा पूरी तरह बदल गया है। देश के राजनीतिक नक्शे को देखा जाए तो ७५ प्रतिशत नक्शा भगवा हो गया है।मात्र १२ साल में देश के ७५ प्रतिशत नक्शे भगवा कर देना ऐतिहासिक सफलता है।भाजपा के पुरानी पीढ़ी के नेता पूरे देश व राज्यों में भाजपा के शासन का सपना देखा करते थे। पीएम मोदी भाजपा के वह नेता है जिन्होंने अपने पहले के नेताओं के सपने को पूरा किया है।आज भाजपा नेता गर्व से कह सकते हैं कि बंगाल में भाजपा के जीतने के बाद और तमिलनाडु में द्रमुक के हारने के बाद पीएम मोदी को हराने वाला कोई नेता नहीं बचा है।
देश में दो ही राज्य ऐसे थे जहां के नेता अब तक यह दावा किया करते थे कि वह पीएम मोदी हराने वाले नेता हैं।एक ममता बैनर्जी यह दावा किया करती थी वही इस देश में ऐसी नेता हैं जिसने भाजपा को बंगाल मे तीन बार हराया है, पीएम मोदी को तीन बार हराया है।दूसरे तमिलनाडु के स्टालिन दावा करते थे उनके रहते भाजपा तमिलनाडु जीत नहीं सकती।स्टालिन को भले ही भाजपा व पीएम मोदी ने नहीं हराया है, उनको टीवीके ने हराया है तो इस आधार पर कहा जा सकता है कि अब तमिलनाडु में भाजपा व पीएम मोदी को हराने वाला नेता नहीं है।अब तो यह कहा जा रहा है कि पीएम मोदी को हराने का दावा करने वाले की पार्टी तो बंगाल में चुनाव हारी ही है, वह अपने विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए हैं। चाहे स्टालिन हो या ममता हो दोनों के लिए यह बहुत ही शर्म की बात है कि वह अपने विधानसभा क्षेत्र में ही चुनाव हार गए। दोनों अपनेअपने राज्य के सीएम और दोनों ही चुनाव हार गए तो इससे बुरी हार तो और कोई हो नहीं सकती।सरल शब्दों में कहा जाए तो दोनों की हार तो नाक कट जाने जैसी है।
पं.बंगाल में जनता किसी राजनीतिक दल या नेता को हमेशा सिर पर बिठाने की पक्षधर नहीं रहती है, वह जब किसी राजनीतिक दल को मौका देती है तो खूब मौका देती है, ताकि राजनीतिक दल को शिकायत न रहे की राज्य के विकास के लिए जनता ने उसे मौका नहीं दिया। कांग्रेस को आजादी के बाद से सबसे बड़ा मौका दिया लेकिन पं. बंगाल की जनता को उससे विकास की जितनी उम्मीद थी वह उम्मीद कांग्रेस कई दशकों में पूरी नहीं कर सकी तो जनता ने उसे हटाकर वामपंथी दलों को मौका दिया। तीन दशक तक जनता ने चुनाव में जिताया लेकिन जब देखा कि यह राज्य का अपेक्षित विकास नहीं कर पा रहे हैं और राज्य की राजनीति को बदल कर हिंसा की राजनीति कर दिया है तो जनता ने फिर बदलाव किया।वामपंथियों के इस वहम को तोड़ दिया कि जनता उन पर सबसे ज्यादा भरोसा करती है। जनता किसी राजनीतिक दल पर तब तक ही भरोसा करती है जब तक वह राज्य हित व जनहित में काम करता है जैसे कोई राजनीतिक दल अपने लक्ष्य से भटक जाता है तो जनता उसे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देती है।वामपंथियों के बाद बंगाल की जनता को ममता से बड़ी उम्मीदें थी लेकिन पंद्रहवें साल में जनता को टीएमसी व ममता में वह सब बुराई दिखाई देनी लगी थी जिसे जनता पसंद नहीं करती है।अहंकार,भ्रष्टाचार व परिवारवाद। इन तीनों बुराई के कारण ही ममता को जनता ने सबसे कम मौका दिया है और सत्ता से १५ साल में उतार दिया है।
इस बार के चुनाव ने जिस तरह बंगाल की राजनीति को पूरा बदल दिया है, ठीक वैसे ही तमिलनाडु की राजनीति भी इस चुनाव के बाद बदल गई है। माना जाता है कि छह दशकों से तमिलनाडु की राजनीति में दो ही राजनीतिक दलों की प्रमुख भूमिका रही। सत्ता में द्रमुक या अद्रमुक दोनों में से कोई एक रहता था। दोनों पारी पारी से चुनाव जीतकर सरकार बनाते आ रहे थे पिछली बार यह क्रम द्रमुक ने तोड़ दिया था वह लगातार दूसरी बार चुनाव जीती और फिर से उनकी सरकार बनी। ऐसा अद्रमुक के कमजोर होने के कारण हुआ। अद्रमुक व भाजपा द्रमुक का विकल्प नहीं बन पा रहे थे इसलिए पिछली बार जनता ने द्रमुक को फिर से चुना था इस बार भी ऐसा ही लग रहा था कि जनता के सामने द्रमुक का कोई विकल्प नहीं है,इसलिए जनता तीसरी बार द्रमुक को चुन सकती है लेकिन इस बार एक नए राजनीतिक दल टीवीए के चुनाव मैदान में होने के कारण जनता ने द्रमुक का विकल्प उसे चुना यानी जनता द्रमुक से नाराज थी और जैसे उसका विकल्प उसे मिला जनता ने द्रमुक को सत्ता से बाहर कर दिया है. इसी के साथ तमिलनाडु की द्रविड राजनीति पर सवालिया निशान लग गया है। पीएम मोदी के समय काम के लिए तो याद किया ही जाएगा, देश व राज्यों की राजनीति में बदलाव के लिए भी याद किया जाएगा।
इस चुनाव का देश की राजनीति पर भी प्रभाव पड़ेगा क्योंकि अब सारे नेता मोदी से हारे हुए नेता हैं। इस चुनाव के पहले तक ममता बैनर्जी चुनाव में पीएम मोदी व भाजपा को हराने के कारण खुद को बाकी विपक्षी नेताओं से अलग और बड़ा नेता समझती थी,वह कहा करती थी वही देश में पीएम मोदी को हरा सकती है। राहुल गांधी तो सबसे चुनाव हारने वाले नेता हैं, वह विपक्ष माने या न माने खुद विपक्ष का नेता समझते रहे हैं। अब ममता के हार जाने से राहुल गांधी और उनमें कोई फर्क नहीं रह गया दोनों मोदी से हारे हुए नेता बन गए हैं। इसलिए अब ममता व राहुल के बीच विपक्ष के नेतृत्व को लेकर फिर खींचतान शुरु हो सकती है। राहुल गांधी विपक्ष के स्वघोषित नेता बने रहना चाहेंगे और ममता अब विपक्ष की नेता बनने का प्रयास फिर से शुरू कर सकती हैं। इससे इंडिाया गठबंधन में नई कलह शुरू हो सकती है।
कोई भी राजनीतिक दल हो या उसका बड़ा नेता हो, वह चुनाव पार्टी को जिता नहीं पाता है या खुद जहां-जहां से चुनाव लड़ता है, वहां चुनाव जीत नहीं पाता है तो...
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