कोई भी राजनीतिक दल हो या उसका बड़ा नेता हो, वह चुनाव पार्टी को जिता नहीं पाता है या खुद जहां-जहां से चुनाव लड़ता है, वहां चुनाव जीत नहीं पाता है तो उसका राजनीतिक कद पार्टी,राज्य व देश में कम हो जाता है क्योंकि राजनीति में सीधा सा गणित होता है जो चुनाव खुद जीतता है और पार्टी को भी जिताता है, वह बड़ा नेता होता है, उसका राजनीतिक कद पार्टी में.प्रदेश में व देश में ऊंचा हो जाता है।वह जितने चुनाव खुद जीतता है और अपनी पार्टी को जिताता है, उसका राजनीतिक कद उतना ही ऊंचा होता है लेकिन कई चुनाव जिताने वाला नेता यदि एक चुनाव हार जाता है तो उसका जितना भी ऊंचा कद हो वह कम हो जाता है और उसे कोई बड़ा नेता नहीं मानता है क्योंकि वह अब हराने वाला नेता नहीं रह जाता है,वह चुनाव हारने वाला नेता बन जाता है और हारने वाले नेता को कोई बड़ा नेता नहीं मानता हैं। पार्टी के लोग नहीं मानते,राज्य के लोग नहीं मानते और देश में भी बड़ा नेता कोई नही मानता है।
पं.बंगाल चुनाव हारने के पहले ममता बैनर्जी पार्टी के सबसे बड़ी नेता थी,राज्य की सबसे बड़ी नेता थी और विपक्ष में देश की भी सबसे बड़ी नेता थी। वह खुद को विपक्ष का बड़ा नेता मानती थीं और विपक्ष के नेता उनको देश का बड़ा नेता मानते थे। क्योंकि विपक्ष के तमाम नेताओं के बीच वही एकमात्र ऐसी विपक्ष की नेता थी जिसने एक नहीं दो नहीं तीन चुनाव में पीएम मोदी व अमित शाह को पं.बंगाल में हराया था। विपक्ष में पीएम मोदी व शाह को किसी राज्य में तीन बार हराने वाला कोई और नेता नहीं था इसलिए ममता विपक्ष की मोदी व शाह को हरानेवाली नेता थी बाकी सब मोदी व शाह से चुनाव हारने वाले नेता थे। जब भी मोदी व शाह को किसी चुनाव में हराने की बात होती थी तो विपक्ष का कोई नेता यह कहे या न कहे ममता जरूर कहती थी कि उन्होंने मोदी व शाह को पं.बंगाल में तीन बार हराया है तो वही देश के चुनाव में भी उनको हरा सकती थी।यानी वह विपक्ष से चाहती थीं कि राहुल गांधी की जगह उनको विपक्ष का नेतृत्व सौंपा जाता है तो वह पीएम मोदी को देश मे हरा सकती हैं।
२६ के विधानसभा चुनाव मे पं.बंगाल में वह हुआ जिसकी कल्पना तक ममता नहीं करती थी यानी मोदी और शाह से पं.बंगाल में चुनाव हार जाना।वह भी बुरी तरह। इतनी बुरी तरह की वह खुद दो सीटो पर चुनाव लड़कर दोनों सीटों पर चुनाव हार गई और उनकी पार्टी जिसके दो सौ सीटों पर जीतने की कल्पना कर वह खुश हो रही थी,वह १०० सीट भी नहीं जीत सकीं। इससे ममता को बहुत राजनीतिक नुकसान हुआ। राज्य की सत्ता तो गई ही, देश के बड़ी नेता की जगह,देश की मोदी व शाह को हराने वाली व हरा सकने वाली नेता की जगह अब वह भी विपक्ष के सभी नेताओं की तरह मोदी शाह से हारने वाली नेता रह गई थीं।वह सत्ता के नशे में भूल गई थी कि पीएम मोदी व शाह भी तीन बार हारने पर भी हार मानने नही है और उसको हराकर कर दम लेने वाले हैं। पीएम मोदी व शाह को ममता को हराने में १५ साल लगे लेकिन आखिरकार उन्होंने वह काम कर दिखाया जिस देश की राजनीति में ऐतिहासिक माना जाएगा।
चुनाव हारने से ममता को सबसे बड़ा राजनीतिक रूप से नुकसान क्या हुआ, वह भी विपक्ष के तमाम नेताओं जैसा हो गई. उनका राजनीतिक कद भी कम हो गया और वह भी राज्य व देश की सबसे बड़ी राजनीतिक नेता नहीं रह गई है।ऐसे में उनके सामने खुद को विपक्ष से अलग व बड़ा नेता दिखाने के लिए कुछ ऐसा करना था जो विपक्ष के किसी नेता ने न किया हो। चुनाव हारने पर विपक्ष के तमाम नेताओं ने सहज इस्तीफा दे दिया था, ममता भी चुनाव हारने पर ऐसा करती तो वह विपक्ष के तमाम नेताओं जैसी हो जाती इसलिए उन्होंंने हारने के बाद भी सीएम पद से इस्तीफा देने से मना कर दिया ताकि वह विपक्ष के तमाम नेताओं से अलग दिखें। वह कह सकें कि तुम लोग जो काम नहीं कर सके मैंने किया है।मैं हारी नहीं हराई गई इसलिए मैंने विरोध मे सीएम पद से इस्तीफा नहीं दिया।
ममता ने सीएम पद से इस्तीफा न देकर खुद को विपक्ष के तमाम नेताओं के अलग बताने का प्रयास किया यानी वह विपक्ष के तमाम नेताओं को यह बताने का प्रयास किया कि मैं पहले भी तुम लोगों जैसी नहीं थी और बंगाल हारने के बाद भी नहीं हूं।यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ममता ने राहुल गांधी के बनाए हुए रास्ते पर चलने से क्यों मना नहीं किया क्योंक राहुल गांधी ही देश के पहले ऐेसे नेता जिन्होंने यह माना और कहा कि हम हारे नहीं है,हम हराए गए है। अब ममता ऐसा कर रही है। इसकी वजह यह है कि राहुलगांधी, ममता दोनो पीएम मोदी को कमजोर,डरपोक,कायर नेता कहते रहे हैं। ऐसे में उनको यह स्वीकारने में शर्म आती है कि हम जिसे कमजोर,डरपोक,कायर मानते हैं, हम ऐसे नेता से हार गए।उनके हार स्वीकारने का मतलब तो यह होता कि पीएम मोदी कमजोर,डरपोक,कायर नेता नहीं है।
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