पं.बंगाल की शेरनी कही जाने वाली ममता बनर्जी चुनाव हारने के बाद अपनी पार्टी को संभाल नहीं पाई,वह समझ रही थी कि पार्टी का अस्तित्व उसके कारण है, वह है तो पं. बंगाल में टीएमसी है,उनके कारण ही पं.बंगाल में विधायक,सांसद चुने गए हैं।एक हार से उन्होंने पिछले १५ साल में जो बंगाल की शेरनी की तिलस्म खड़ा किया था,अपराजेय होने का तिलस्म खड़ा किया था,वह एक ही हार में टूट गया है और वह शेरनी से बिल्ली हो गई हैं।जिन कांग्रेस नेताओं से वह खुद को बड़ा नेता समझती थीं,वह कांग्रेस नेता आज उनके लिए बड़े हो गए हैं।पं.बंगाल में पीएम मोदी व भाजपा को हराने वाली ममता आज पीएम मोदी से हारने वाले नेताओं की कतार में खुद को खड़ी पा रही है और उनके साथ उनको समझौता करना पड़ रहा है।
टीएमसी के विधायकों ने पहले ही ममता से अलग होने का फैसला कर लिया है, अब सासंद भी ममता के साथ रहने को तैयार नहीं हैं।एक एक नेता टीएमसी व ममता का साथ छोड़ते जा रहे हैं।हर घटनाक्रम से ममता कमजोर से कमजोर होती जा रही हैं। पहले उनकी सरकार गई अब उनकी पार्टी भी हाथ से जाने वाली है।ऐसे में ममता बैनर्जी की सोनिया गांधी व अभिषेक बैनर्जी की राहुल गांधी से मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे हैं। सोनिया गांधी, राहुल गांधी व ममता बैनर्जी व अभिषेक बैनर्जी का एक ही दुख है।उनको दुखी करने वाला एक ही शख्स है, पीएम मोदी।सोनिया गांधी का राहुल गांधी को पीएम बनाने का सपना पीएम मोदी के कारण पूरा नहीं हो पा रहा है।राहुल गांधी चुनाव के बाद चुनाव हारते जा रहे हैं।ममता बैनर्जी का सपना था कि अपनी जगह मजबूती से अभिषेक बैनर्जी को पं.बंगाल में नेता के रूप में स्थापित करना,लेकिन पीएम मोदी से चुनाव हारने के बाद अभिषेक की वही हालत हो गई है जो राहुल गांधी की है। राहुल गांधी पीएम नहीं बन पा रहे हैं और अभिषेक इस बार पं.बंगाल का सीएम बनना चाहते थे, नहीं बन सके हैं।
इस बात में दो मत नहीं है कि ममता बैनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर टीएमसी बनाई तो अपने दम पर पं.बंगाल में एक मुकाम हासिल किया। पं.बंगाल में उसने कांग्रेस की जगह ली और कांग्रेस को जमीन पर इतना कमजोर कर दिया कि उसके होने नहीं होेेने का कोई मतलब ही नहीं रह गया था।पं.बंगाल में कांग्रेस की आज बुरी हालत है तो वह ममता के कारण हैं क्योंकि उसने न कांग्रेस का सहयोग किया और न कांग्रेस का सहयोग लिया। वह किसी के साथ सत्ता में हिस्सेदारी की पक्षधर नही थी, वह अकेले चुनाव लड़ती, जीतती थी और अकेले सत्ता का भोग करती थी।वह पंद्रह साल इसी मुगालते में रहीं कि वह अकेली है इसलिए ताकतवर हैं,सबसे शक्तिशाली हैं लेकिन आज उनको अपनी गलती का एहसास हो रहा होगा कि मैं अकेली भाजपा को हरा नहीं सकी अगर कांग्रेस को उसने मजबूत बनाए रखा होता तो कांग्रेस के साथ मिलकर वह भाजपा को सत्ता में आने से रोक सकते थे।
टीएमसी और ममता की हार कांग्रेस के लिए आपदा मे अवसर जैसा है क्योंकि पं.बंगाल में कांग्रेस को मजबूत करना राहुल गांधी के बूते की बात नहीं है। वह बीस साल में पं.बंगाल मे कांग्रेस को मजबूत करने के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं, आगे भी नहीं कर पाएंगे ।इससे अच्छा है कि कमजोर हो गई ममता को ही यह काम दे दिया जाए जब ममता खुद उनके पास आई हैं उनकी शरण में आई है्ं।माना जा रहा है कि सोनिया गांधी की तरफ से ममता के लिए आफर है कि वह टीएमसी का विलय कांग्रेस में कर दे। बदले में उसे कांग्रेस का महासचिव पद दिया जाएगा और पं.बंगाल में कांग्रेस की वही सबसे बड़ी नेता होंगी। यानी टीएमसी के पहले ममता को कांग्रेस में जो कद था उनका पं.बंगाल में वही कद होगा।उनको भाजपा से लड़ना होगा, यानी सोनिया गांधी चाहती हैं जैसे कांग्रेस के नेता अन्य राज्यों में जैसे कांग्रेस को चला रहा है, कांग्रेस के अस्तित्व को बनाए हुए है, पं.बंगाल में कांग्रेस के अस्तित्व को ममता बचाए और मजबूत करे यानी कांग्रेस को वापस सत्ता में लेकर आए।
अगर ममता कांग्रेस में शामिल होना मान लेती हैं तो इससे उनका राजनीतिक कद राहुल गांधी से छोटा हो जाएगा, वह अब तक खुद को राहुल गांधी से बेहतर नेता इसलिए कहती थी क्योंकि वह मोदी को हराने वाली थी, अब वह भी राहुल गांधी की तरह मोदी से हारने वाली नेता हो गई है और कांग्रेस में शामिल हो जाती है तो उनको राहुल गांधी के नेतृत्व का न चाहकर भी स्वीकारना होगा।सोनिया गांधी एक तरह से ममता को राहुल गांधी के रास्ते से हटाना चाहती हैं क्योंकि अभी भी वह राहुल गांधी की राह में बाधा बन सकती हैं। ममता अगर कांग्रेस में शामिल नहीं होती है तो वह दिल्ली की राजनीति करेंगी, दिल्ली की राजनीति करेंगी तो वह राहुल विपक्ष के नेता न बने या न माने जाए, इसके लिए केजरीवाल,स्टालिन,अखिलेश आदि नेताओं का उपयोग कर सकती हैं। राहुल की जगह खुद विपक्ष का नेता बनना चाहेंगी।उनकी मुश्किल यही है कि ऐसे में उनकी पार्टी के नेता ही उनका साथ नहीं दे रहे हैं।
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