आलाकमान का दबदबा कम हो गया है

Posted On:- 2026-06-12




सुनील दास

सबसे बड़ा नेता या आलाकमान तो हर राजनीतिक दल मे होता है। यानी ऐसा नेता जिसने कुछ कह दिया,कर दिया तो उसका पालन करना ही होगा। पालन होता है तो माना जाता है कि आलाकमान का दबदबा है,सम्मान है,पार्टी में अनुशासन है, आस्था है, विश्वास है,भरोसा है कि आलाकमान जो कहता है या कहता है वह पार्टी हित में होता है, उससे ही पार्टी का भला हो सकता है।उसका विरोध कोई किसी तरह से नहीं करता है कोई करता है तो उसे इस गुस्ताखी की सजा जरूर मिलती है क्योंकि यह आलाकमान की इज्जत की बात होती है। किसी भी वजह से आलाकमान की बात न मानी जाए,यह आलाकमान की बेइज्जती समझी जाती है। आलाकमान ने तय कर दिया कि कोई नेता किसी प्रदेश से राज्यसभा में भेजा जाएगा। तो इस पर हर हाल में अमल होना चाहिए,अमल हो तो माना जाएगा कि आलाकमान की बात मानी गई,आलाकमान की पार्टी में दबदबा है, नहीं मानी जाती है तो माना जाता है कि आलाकमान की दबदबा कम हो रहा है।

राज्यसभा किस नेता को किस प्रदेश से भेजा जाना है,कांग्रेस में यह तय राहुल गांधी करते हैं। वही अघोषित आलाकमान है,वही अघोषित सबसे बड़े नेता है, उन्होंने तय कर दिया कि मप्र में मीनाक्षी नटराजन को राज्य सभा में भेजा जाना है।फिर तो यह मप्र के सब कांग्रेस नेताओं व संगठन की महती जिम्मेदारी है कि वह ऐसा करके दिखाए।ऐसा होना ही चाहिए था क्योंकि कांग्रेस के पास इसके लिए पर्याप्त संख्या बल था।इसके बाद भी कांग्रेस नेताओं की किसी लापरवाही की वजह से मीनाक्षी नटराजन का नामांकन ही कोई जानकारी न दिए के आधार पर रद्द कर दिया जाए तो यह कांग्रेस नेताओं की गलती मानी चाहिए लेकिन कांग्रेस के नेता इसके लिए भाजपा को दोषी ठहरा रहे हैं कि भाजपा ने शिकायत की नामांकन में कोई जरूरी जानकारी नहीं दी गई इसलिए नामांकन रद्द कर दिया। नामांकन में यह जानकारी कैसे नहीं दी गई। क्यों नहीं दी गई और भाजपा को नहीं दी जाने वाली जानकारी किसने दी। माना जा रहा है कि यह जानकारी भाजपा को कांग्रेस के किसी नेता या नेताओं ने दी है ताकि भाजपा शिकायत करे और मीनाक्षी नटराजन का नामांकन ही रद्द हो जाए। यानी मीनाक्षी मप्र से राज्यसभा में जा ही न सके।

सीधी सी बात है कि कांग्रेस आलाकमान चाहता था कि उनकी खास नेता मप्र से राज्यसभा में जाए और मप्र व तेलंगाना के कुछ कांग्रेस नेता नहीं चाहते थे कि मीनाक्षी मप्र से राज्यसभा में जाए। क्योंकि उनसे कांग्रेस नेताओं की पुरानी खुन्नस है, मौका मिला और उन्होंने मीनाक्षी को बता दिया कि हम भी क्या कर सकते हैं। आलाकमान मीनाक्षी को राज्यसभा में चाहकर भी नहीं भेज सका और कांग्रेस के कुछ  नेताओं ने चाहा कि मीनाक्षी राज्यसभा में न जा सके और वह अपनी कोशिश मे सफल रहे। इससे साफ हो जाता है कि कांग्रेस में आलाकमान की बात आंखमुंदकर मानने वालों की संख्या राज्यों में कम होती जा रही है।कांग्रेस आलाकमान का मालूम है या बताने वालों ने बता दिया होगा कि मीनाक्षी राज्यसभा में नहीं जा सकीं तो उसके लिए कौन से कांग्रेस नेता दोषी है लेकिन आलाकमान जाहिर तौर पर उनके खिलाफ कुछ कह नहीं सकता, कुछ कर नहीं कर सकता क्योंकि इससे फजीहत तो आलाकमान की ही होनी है कि कांग्रेस में आलाकमान की बात भी अब मानी नहीं जा रही है।

ऐसा नहीं है कि यह कोई पहला ऐसा मामला है जिससे संकेत मिलता है कि कांग्रेस आलाकमान का दबदबा अब कम हो रहा है यानी राज्य के बड़े नेता वह नहीं कर रहे हैं जो आलाकमान चाहता है।इसकी शुरुआत केरल से देखी जा सकती है, आलाकमान केरल में सीएम वेणुगोपाल को बनाना चाहता था, इसके लिए दस दिन तक सतीशन पर हर तरह से मनाने का प्रयास किया गया लेकिन सतीशन नहीं माने और आलाकमान को मजबूरी में सतीशन को सीएम बनाना पड़ा। कांग्रेस में पहली बार ऐसा हुआ कि आलाकमान जिसे सीएम बनाना चाहता था,वह नहीं बना,आलाकमान जिसे नहीं चाहता था वह सीएम बन गया।इसके बाद कर्नाटक में छह माह से सिध्दारमैया सीएम कुर्सी छोड़ नहीं रहे थे जबकि आलाकमान चाहता था कि वह स्वेच्छा से सीएम की कुर्सी छोड़ दें। आलाकमान को कहना पड़ा तब सिध्दारमैया ने सीएम की कुर्सी छोड़ी और आलाकमान के वादे के अनुसार शिवकुमार सीएम बन सके। सिध्दारमैया ने कुर्सी छोडने़ के बाद कहा भी आलाकमान के कहने पर कुर्सी छोड़ दिया हूं। लेकिन वह आलाकमान का यह कहना मानने से इंकार कर दिया कि वह दिल्ली की राजनीति करें और राज्य की राजनीति शिवकुमार को करने दें। उन्होंने आलाकमान से साफ कह दिया कि वह राज्य में ही रहेंगे और राज्य की राजनीति करेंगे यानी शिवकुमार काे आने वाले दिनों में परेशान करते रहेंगे।

राहुल गांधी कहते हैं कि पीएम मोदी कमजोर नेता हैं लेकिन हकीकत में पीेएम मोदी तो पार्टी के सबसे बड़े नेता होने के साथ ही गठबंधन के बड़े नेता है, देश के बड़े नेता हैं और विश्व के बड़े नेताओं में से एक हैं। पीएम मोदी की तुलना में राहुल गांधी तो इतने कमजोर नेता हैं कि अपनी पसंद की एक नेता को राज्यसभा में नहीं भेज पाते हैं कांग्रेस के कुछ नेता ही ऐसी साजिश करते हैं कि उनकी पसंद की नेता का नामांकन रद्द हो जाता है। वह राज्यसभा नहीं जा पाती है और राहुल गांधी अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए भाजपा पर आरोप लगाते हैं कि उसके कारण ऐसा हुआ है। वह हमेशा की तरह अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए भाजपा पर आरोप लगाते हैं, इस बार उनका आरोप है कि वोट चोरी,सरकार चोरी के बाद अब सीट चोरी के जरिए चुनाव के पहले ही मुकाबला खत्म कर दिया गया है। भाजपा और चुनाव आयोग के रहते कांग्रेस के कई नेता राज्यों से राज्यसभा में गए हैं, इससे राहुल गांधी के आरोप में कोई दम नहीं रह जाता है कि मप्र में जो कुछ हुआ उसके लिए महज भाजपा दोषी है।



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