एमसीबी (वीएनएस)। जब प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग सामूहिक प्रयास, तकनीकी मार्गदर्शन और वैज्ञानिक सोच के साथ किया जाए, तो वही संसाधन ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार और नियमित आय का मजबूत आधार बन सकते हैं।
मनेन्द्रगढ़ विकासखंड के ग्राम मोरगा की आदर्श मछुआ सहकारी समिति मर्यादित ने अपनी मेहनत, सामूहिक प्रयास और विभागीय मार्गदर्शन से इसे साबित किया है। वर्ष 2018 में गठित इस समिति में वर्तमान में 25 सदस्य हैं और समिति के अध्यक्ष आनंद सिंह हैं। मत्स्य विभाग के सहयोग एवं तकनीकी मार्गदर्शन से समिति ने जलाशय आधारित मत्स्य पालन को संगठित एवं वैज्ञानिक तरीके से अपनाया। आज मत्स्य पालन समिति के सदस्यों के लिए केवल मछली उत्पादन का कार्य नहीं, बल्कि रोजगार, अतिरिक्त आय और आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है।
जलाशय के संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग, 25 सदस्यों को मिला रोजगार का आधार :
आदर्श मछुआ सहकारी समिति मर्यादित मोरगा का पंजीयन 5 जून 2018 को हुआ था। समिति का मुख्य उद्देश्य जलाशय में उपलब्ध मत्स्य संसाधनों का उचित उपयोग करते हुए अपने सदस्यों को रोजगार एवं नियमित आय का साधन उपलब्ध कराना रहा है। समिति द्वारा लगभग 11 हेक्टेयर जलक्षेत्र वाले जलाशय में सामूहिक रूप से मत्स्य पालन एवं मत्स्याखेट किया जाता है।
समिति के सदस्यों ने जल संसाधन को केवल पारंपरिक तरीके से उपयोग करने के बजाय इसे संगठित आर्थिक गतिविधि में बदलने का प्रयास किया। मत्स्य विभाग के अधिकारियों से प्राप्त तकनीकी मार्गदर्शन के आधार पर जलाशय प्रबंधन, मत्स्य बीज संचयन, मछलियों की देखभाल, हार्वेस्टिंग और विपणन की प्रक्रिया को व्यवस्थित किया गया। इससे सदस्यों को मत्स्य पालन के साथ उत्पादन, प्रबंधन और बाजार से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी भी प्राप्त हुई।
80 हजार रुपये के निवेश से बढ़ी उत्पादन क्षमता, 3.50 लाख का वार्षिक कारोबार :
समिति ने पिछले वर्ष लगभग 80 हजार रुपये की लागत से मत्स्य बीज का संचयन किया। विभागीय अधिकारियों के तकनीकी मार्गदर्शन में जलाशय में गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज डाले गए और जलाशय प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया। मछलियों के उचित आकार और वजन तक पहुंचने के बाद समिति के सदस्य सामूहिक रूप से उनकी हार्वेस्टिंग करते हैं। इसके बाद मछलियों को स्थानीय बाजार तथा आसपास के क्षेत्रों में समिति के सदस्य स्वयं बेचते हैं। इससे समिति को उत्पादन के साथ सीधे विपणन का लाभ मिलता है। वर्तमान में समिति को जलाशय से लगभग 3.50 लाख रुपये का वार्षिक मत्स्य उत्पादन/कारोबार प्राप्त हो रहा है। पिछले वर्ष लगभग 80 हजार रुपये के निवेश के बाद समिति को लगभग 2.80 लाख रुपये का वार्षिक कुल लाभ प्राप्त हुआ। समिति के सदस्यों को लगभग 12 हजार रुपये प्रति सदस्य प्रतिवर्ष लाभांश वितरित किया जाता है।
मछली पालन के साथ खुद बिक्री भी, बाजार से सीधे जुड़ रहे समिति के सदस्य :
समिति की सफलता का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सदस्य केवल मछली उत्पादन तक सीमित नहीं हैं। हार्वेस्टिंग के बाद वे स्वयं स्थानीय बाजार एवं आसपास के क्षेत्रों में मछलियों का विक्रय करते हैं। इससे सदस्यों को मछली की गुणवत्ता, हैंडलिंग, संरक्षण, बाजार की मांग और विपणन की व्यावहारिक जानकारी प्राप्त हो रही है।
मत्स्य विभाग द्वारा समय-समय पर सदस्यों को मत्स्य बीज संचयन, जलाशय प्रबंधन, मत्स्याखेट, मछलियों की हैंडलिंग, संरक्षण और विपणन से संबंधित तकनीकी जानकारी दी जाती है। इससे समिति के कार्यों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और बेहतर प्रबंधन विकसित हुआ है।
कृषि के साथ मत्स्य पालन बना अतिरिक्त आय का मजबूत जरिया :
मत्स्य गतिविधियों से जुड़ने के बाद समिति के सदस्यों के लिए रोजगार और आय का एक नया स्रोत विकसित हुआ है। पहले सदस्यों की आजीविका मुख्य रूप से कृषि और स्थानीय स्तर के अन्य कार्यों पर निर्भर थी। मत्स्य पालन को अतिरिक्त गतिविधि के रूप में अपनाने से उन्हें जलाशय से अतिरिक्त आय प्राप्त होने लगी।
समिति के सदस्य मत्स्य पालन के साथ कृषि गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। इस प्रकार कृषि और मत्स्य पालन का संयोजन परिवारों की आय में विविधता लाने और आजीविका को मजबूत करने में मददगार साबित हो रहा है।
नई तकनीक और नवाचार ने बनाया मत्स्य पालन को अधिक व्यवस्थित :
समिति द्वारा नियमित रूप से गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज का संचयन किया जाता है। विभागीय तकनीकी सलाह के अनुसार जलाशय प्रबंधन किया जाता है और मछलियों की उचित वृद्धि के बाद समय पर हार्वेस्टिंग की जाती है।
मछलियों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आइस बॉक्स तथा बेहतर मत्स्याखेट के लिए फिशिंग नेट का उपयोग किया जाता है। समिति को मत्स्य विभाग से 100 प्रतिशत अनुदान पर आइस बॉक्स एवं फिशिंग नेट भी प्राप्त हुए हैं, जिससे मछलियों की सुरक्षित हैंडलिंग, संरक्षण और बेहतर विपणन में सहायता मिल रही है।
समिति के सदस्यों को अन्य राज्य में एक्सपोजर विजिट एवं शैक्षणिक भ्रमण का अवसर भी मिला। वहां उन्होंने आधुनिक मत्स्य पालन तकनीकों, जलाशय प्रबंधन, मछली उत्पादन, हार्वेस्टिंग, हैंडलिंग और विपणन की गतिविधियों को प्रत्यक्ष रूप से देखा और समझा। इस अनुभव से उन्हें अपने क्षेत्र में बेहतर मत्स्य प्रबंधन करने की प्रेरणा मिली।
मत्स्य पालन ने बदली सोच, सहकारिता बनी आर्थिक मजबूती का आधार :
आदर्श मछुआ सहकारी समिति की सफलता बताती है कि सहकारिता के माध्यम से सामूहिक रूप से काम करने पर उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। 25 सदस्यों ने मिलकर जलाशय आधारित मत्स्य पालन को आगे बढ़ाया और उत्पादन से लेकर विपणन तक अपनी भागीदारी सुनिश्चित की।
समिति के लिए मत्स्य पालन अब केवल पारंपरिक गतिविधि नहीं, बल्कि रोजगार, आय और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का माध्यम बन चुका है। विभागीय अधिकारियों के मार्गदर्शन से सदस्यों को लगातार नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी मिल रही है।
तकनीकी मार्गदर्शन से लाभदायक बना मत्स्य पालन :
समिति के सदस्यों का मानना है कि यदि मछुआरों को उचित प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज और आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए जाएं, तो जलाशय आधारित मत्स्य पालन को सफल एवं लाभदायक आजीविका में बदला जा सकता है। समिति का संदेश है कि सहकारी समिति के माध्यम से सामूहिक रूप से कार्य करने से सभी सदस्यों को इसका लाभ मिलता है।
मोरगा से आत्मनिर्भरता का संदेश: जलाशय बना आय का नया स्रोत :
आदर्श मछुआ सहकारी समिति मर्यादित मोरगा की सफलता ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों की भूमिका और सामूहिक प्रयास की ताकत को सामने लाती है। लगभग 11 हेक्टेयर जलक्षेत्र वाले जलाशय से शुरू हुआ यह प्रयास आज 25 सदस्यों के लिए रोजगार, आय और अनुभव का माध्यम बन चुका है।
लगभग 80 हजार रुपये के मत्स्य बीज निवेश, करीब 3.50 लाख रुपये के वार्षिक कारोबार और लगभग 2.80 लाख रुपये के कुल वार्षिक लाभ के साथ समिति ने यह साबित किया है कि सही तकनीक, विभागीय मार्गदर्शन और सामूहिक प्रबंधन से मत्स्य पालन आर्थिक रूप से सफल गतिविधि बन सकता है। यह कहानी जल संसाधन के बेहतर उपयोग, सहकारिता की शक्ति, ग्रामीण रोजगार और आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल है।
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