देश के बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों का आचार विचार क्या होना चाहिए,यह तो कई बार कहा जाता है,कहना आसान होता है लेकिन जब कोई आचार विचार की बात ही नहीं करता है मौके पर वैसा आचार विचार करके दिखाता है तो देश के लोग उसकी तारीफ करते हैं कि यह व्यक्ति वास्तव में जिस पद पर है, उस पद के योग्य भी है। ऐसे मौके सभी लोगों के जीवन में एक बार तो जरूर आता है,ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं जो ठीक मौके पर यह साबित नहीं कर पाते हैं कि वह जिस पद पर बैठे हैं वह अपने आचार विचार से उस पद के योग्य भी हैं।जो व्यक्ति अपने पद की मर्यादा का पालन करता है और पद की मर्यादा का पालन न करने के लिए प्रेरित करने वालों को भी याद दिलाता है कि मैं तो अपनी मर्यादा का पालन कर रहा हूं आप भी बड़े पद पर हैं,आप भी अपनी मर्यादा का पालन करिए तो ऐसे व्यक्ति लाखों में एक होते हैं। हमारे सीजेआई सूर्यकांत ऐसे ही व्यक्ति हैं,
राजनीति करने वालों ज्यादातर लोगों की कोई मर्यादा नहीं होती है, वह खुद मर्यादा का पालन करने वाले नहीं होते है और दूसरे क्षेत्र के उच्च पदों पर बैठे हुए लोगों से वह यही अपेक्षा करते हैं कि आप भी मर्यादा का पालन न करो, हम जैसा चाहते हैं, आप वैसा ही करो।कोई वैसा नहीं करता है तो उसे डराया भी जाता है कि आपके साथ भविष्य में क्या बुरा हो सकता है। जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त को आफर दिया गया कि आप सरकारी गवाह बन जाइए,आप हमारे साथ आकर कह दीजिए कि आपने किसके कहने पर वोट चोरी करवाई है।वह नहीं माने तो उनको आए दिन बयान देकर डराया जाता है कि आप बच नहीं सकते,आपके खिलाफ कार्रवाई होगी।ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार किया जा रहा है। इसके पहले भी सीजेआई से यही अपेक्षा की जाती थी हम आपको तब ही स्वतंत्र मानेंगे जब आप सरकार के पक्ष में फैसला नहीं देंगे। यानी आपके सामने जब भी ऐसा मौका आए कि आपको विपक्ष या सरकार में किसके साथ खड़ा होना है आपको विपक्ष के साथ खड़ा होना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर माना जाएगा कि आप स्वतंत्र नहीं है। यही वजह है कि एक बार सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ को कहना पड़ा था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब हमेशा सरकार के खिलाफ फैसले देना नहीं होता है।उन्होंने कहा था कि कुछ दवाब समूह हैं,जो इलेक्ट्रानिक मीडिया का इस्तेमाल कर अदालतों पर दबाव डालकर चाहते हैं कि उनके अनुकूल फैसला दिया जाए,नहीं दिया जाता है तो वह जज को स्वतंत्रता पर सवाल उठाते हैं।ऐसा कई बार होता है।
इस बार भी ऐसा किया गया जब सीजेआई से राहुल गांधी व कांग्रेस अध्यक्ष ने मुलाकात का समय मांगा।ऊपरी तौर पर तो ऐसा लगता है कि यह कोई गुनाह तो नहीं है क्योंकि मुलाकात का ही तो समय मांगा है। मिलते तो चर्चा होती, चर्चा किस विषय पर होती वोट चोरी, ज्ञानेश कुमार इस्तीफा,एसआईआर पर चर्चा होती।यह सारे मामले तो पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं।राहुल गांधी तो राहुल गांधी है, वह तो राष्ट्रपति से मिलने के बाद कह सकते हैं कि राष्ट्रपति ने वोट चोरी के आरोप से मना नहीं किया है तो वह सीजेआई से मिलने के बाद भी कुछ भी कह सकते थे। वह तो सुप्रीम कोर्ट के बारे में पहले कह वह कह चुके हैं जो सुप्रीम कोर्ट ने कहा नहीं था। राहुल गांधी के बारे में यह आम धारणा है कि वह किसी मर्यादा को नहीं मानते हैं।वह कुछ भी बोल सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं।यही वजह है कि सीजेआई सूर्यकांत ने उनको याद दिलाया की मेरी मर्यादा क्या है, आप जो चाह रहे हैं वह मेरी मर्यादा के बाहर है, मैं वैसा नहीं कर सकता।यही वजह है कि उन्होंने मुलाकात से ही मना कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलने से इनकार कर दिया और याद दिलाया कि अदालत में पहले से लंबित मुद्दों पर चर्चा करना शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत और न्यायिक मर्यादा के खिलाफ है। साथ ही, सीजेआई ने नेताओं को प्रशासनिक ज्ञापन देने के बजाय याचिका दायर कर कानूनी प्रक्रिया अपनाने का सुझाव दिया।सीजेआई कांत ने कहा कि उनकी अपील में उठाए गए मुद्दे पहले से ही कोर्ट में विचाराधीन हैं और किसी मीटिंग में लंबित मामलों पर चर्चा करना न्यायिक मर्यादा के खिलाफ होगा। उन्होंने कहा कि लंबित मामलों पर चर्चा के लिए बैठक बुलाना शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत का पूरी तरह से उल्लंघन होगा, जो भारतीय संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत का एक अहम हिस्सा है। सीजेआई कांत ने साफ़ किया कि कांग्रेस नेताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों पर कार्रवाई करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास प्रशासनिक अधिकार नहीं हैं। यानी सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया कि वह उनसे जो अपेक्षा कर रहे हैं, वह उनकी अपेक्षा पूरी नहीं कर सकते और यह भी साफ कह दिया कि सुप्रीम कोर्ट मुख्य चुनाव आयुक्त के बारे में कुछ नहीं कर सकता। यानी न कुछ कहेगा और न ही कुछ करेगा।
सीजेआई ने साफ कहा कि प्रशासनिक स्तर पर ज्ञापन सौंपने के बजाय, गाँधी और खड़गे के लिए सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि इसी तरह के मुद्दों वाले मामलों की सुनवाई होनी है। आप अपनी याचिका या तो भारत के सुप्रीम कोर्ट में खुद जाकर जमा कर सकते हैं, या फिर ई-फाइलिंग ऑप्शन का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे किसी भी दिन और किसी भी समय फाइलिंग की जा सकती है। सीजेआई ने नेताओं को भरोसा दिलाया कि कानून के मुताबिक, फाइल की गई किसी भी याचिका पर जल्द से जल्द सुनवाई की जाएगी।यही वजह है कि कांग्रेस ने १२ मार्च को याचिका दायर की बात कही है।बहरहाल, CJI का इनकार इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण संस्थागत घटनाक्रम है। विपक्ष को समझना होगा कि अंतिम फैसला राजनीतिक नारों या मुलाकातों से नहीं, बल्कि अदालत के सामने प्रस्तुत तथ्यों और प्रमाणों से तय होगा। साथ ही मुख्य न्यायाधीश का विपक्षी नेताओं को मुलाकात का समय देने से इनकार करना संस्थागत मर्यादा बनाए रखने के लिहाज से उचित कदम माना जा सकता है।
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