हमारे देश मे लोकतंत्र है, लोकतंत्र में किसी बात के विरोध में प्रदर्शन करना विपक्ष के राजनीतिक दलों, गैर राजनीतिक सगंठनों का अधिकार है।सब चाहते हैं कि लोकतंत्र है तो यह अधिकार बना रहना चाहिए पर प्रदर्शन के अधिकार का मतलब यह नहीं होता है कि आप के प्रदर्शन के कारण लाखों लोगों को परेशानी हो, दुकान में ग्राहकी बंद हो जाए, करोड़ो का नुकसान हो जाए।आदमी कहीं समय पर पहुंचना चाहता है तो पहुंच न पाए।महीने दो महीने में ऐसा एक दो दिन हो तो आदमी इसे लोकतंत्र में रहने का खामियाजा समझ कर भुगत भी ले लेकिन जब एक प्रदर्शऩ के बाद दूसरा प्रदर्शन होता है और दूसरे के जवाब में तीसरे दिन प्रदर्शन होता है और कई दिनों तक दिल्ली के लोगों को परेशानी होती है तो लोगों को नाराज होना स्वाभाविक है। शहर के भीतर से विरोध प्रदर्शन स्थल को हटाने की मांग करना स्वाभाविक है।जब लोगों को परेशानी होती है तो कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस को वह फैसला करना होता है जो जनहित में हो। दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर की जगह को विरोध प्रदर्शन स्थलों की सूची से इसीलिए बाहर कर दिया है कि यहां आए दिन विरोध प्रदर्शन की वजह से दिल्ली के लोगों को परेशानी अब ज्यादा हो रही है।
दिल्ली पुलिस ने दिल्ली के लोगों को आने जाने में,यातायात में,व्यापार करने में किसी तरह की परेशानी न हो इसके लिए जंतरमंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल की सूची से बाहर कर दिया है। अब किसी को दिल्ली किसी बात के विरोध के लिए प्रदर्शन करना हो तो उसे विरोध प्रदर्शन राम लीला मैदान,सीबीडी मैदान व बुराड़ी मैदान में करना होगा।ऐसा नहीं है कि विरोध प्रदर्शन स्थल में दिल्ली में पहली बार बदला गया है, दिल्ली में दूसरी बार प्रदर्शन स्थल बदला गया है।पहले दिल्ली में सारे विरोध प्रदर्शन वोट क्लब पर हुआ करते थे।वह संसद से नजदीक था, वहां प्रदर्शन करने वाले जल्दी संसद तक पहुंच सकते थे यानी वहां से संसद का घेराव आसानी से किया जा सकता था,एक बार वहां हजारों किसान कई दिनों तक प्रदर्शन करते रहे, इसके बाद बोट क्लब पर विरोध प्रदर्शन बंद कर दिया गया और जंतर मंतर को नया विरोध प्रदर्शन स्थल घोषित किया गया।जब तक जंतरमंतर का विरोध प्रदर्शन के लिए सदुपयोग किया जाता रहा यानी लोगों को परेशानी नहीं होती थी तो लोगों ने जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन बंद करने की मांग नहीं की लेकिन इस अक्टूबर के महीने में जंतर मंतर में प्रदर्शन के साथ ही संसद का घेराव करने के नाम पर दिल्ली में हिंसा हुई। पहली बार दिल्ली पुलिस व सरकार को लगा कि जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन कभी भी सीमा पार कर सकता है, अब यहां विरोध प्रदर्शन बंद होना चाहिए।
१० अक्टूबर के बाद दिल्ली मे प्रदर्शन का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि कई दिनों तक दिल्ली के लोगों को बहुत परेशानी हुई और लोगों ने मांग की कि जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन अब बंद होना चाहिए।कुछ लोगों अदालत भी गए और अदालत ने भी दिल्ली पुलिस से विरोध प्रदर्शन के लिए जगह तलाश करने को कहा। इस पर पुलिस ने जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाकर तीन स्थलों के नाम सार्वजनिक कर दिए हैं। अब विपक्ष के राजनीतिक दलों के नेता इस बात का विरोध कर रहे हैं कि जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शऩ बंद नहीं किया जाना चाहिए।यह शहर के बीच में यहां विरोध प्रदर्शन में सुविधा होती है। वह तर्क देते हैं कि कई देशों में विरोध प्रदर्शन स्थल शहर के बीच में हैं,इसलिए हमारे देश में भी विरोध प्रदर्शन स्थल शहर के बीच में होना चाहिए।यह दलील देने वाले भूल जाते हैं जिन देशों में शहर बीच प्रदर्शन स्थल हैं, वहां प्रदर्शन करने वाले कैसे होते हैं और हमारे यहां प्रदर्शन करनेवाले कैसा प्रदर्शन करते हैं।
जंतर मंतर का मामला हाईकोर्ट में ले जाया गया है.दिल्ली में प्रदर्शनों के नियमन और सड़कों एवं व्यवसायिक इलाकों में यातायात बंद न करने की मांग पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से उसका पक्ष पूछा है क्योंकि व्यापारियों,वेंडरों व वकीलों ने याचिक दायर कर प्रदर्शनों की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने की मांग की है।इस दौरान वरिष्ठ वकील सचिन पुरी ने कोर्ट में दावा किया कि हाल के दिनों में बेरिकेडिंग व प्रदर्शनो के कारण दिल्ली के व्यापारियों को दो हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।ऐसा नहीं है कि अदालतों ने प्रदर्शन के लिए कोई एसओपी नहीं बनाया है लेकिन विरोध प्रदर्शन करने वाले उसका पालन नहीं करते हैं।वह ज्यादा से ज्यादा लोग प्रदर्शन में बुलाते और उन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है,हिंसा होती है,नुकसान होता है तो विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने वाले कह देते हैं वह उनके संगठन के नहीं थे। वह हिंसा के लिए पुलिस को दोषी ठहरा देते हैं कि वह हिंसा रोकने में असफल रही।
कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी ने जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का विरोध किया है और कहा है उसे वापस पाने का प्रयास किया जाएगा।वामदल,काकरोज जनता पार्टी सहित कई राजनीतिक दलों ने भी इस बात का विरोध किया है।इसके विरोध मे काकरोच जनता पार्टी के कुछ लोगों ने जंतर मंतर में बिना अऩुमति प्रवेश करने पर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। विपक्ष के राजनीतिक दलों को अब पता चलेगा कि जंतर मंतर में विरोध करना जितना सुविधाजनक था,उन्होंने जंतर मंतर का दुरुपयोग किया और अब जंतर मंतर उनके हाथ से निकल गया है।मामला कोर्ट में है। आने वाले दिनों में कोर्ट से भी मांग की जाएगी की जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल की सूची मे वापस शामिल किया जाना चाहिए।उम्मीद की जानी चाहिए कि कोर्ट जनहित में जो भी फैसला करेगी वह अच्छा ही होगा और सब उसे मानेंगे भी।
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