पृथ्वी पर मानव समाज के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा युध्दों का रहा है। दुनिया में अक्सर कहीं न कहीं युध्द होते रहते हैं,हिंसा की गतिविधियां होती रहती हैं। इसलिए कहा जाता है कि हर शांति का काल किसी न किसी युध्द की तैयारी का होता है।शांति के समय कहीं न कहीं युध्द की तैयारी होती रहती है और जैसे ही युध्द होता है और दुनिया के देश प्रभावित होते हैं तो सब शांति की कामना करने लगते हैं। विश्व में बहुत सारे देश हैं और हर दस बीस साल में किसी न किसी देश में ऐसा नेता पैदा हो जाता है जो युध्द का कारण होता है या बन जाता है।युध्द चाहने वाला नेता पैदा होता है तो फिर उस देश को युध्द के लिए किसी बहाने की जरूरत होती है।यूक्रेन,ईरान,अमरीका,इजराइल,रूस आदि को युध्द के लिए एक बहाने की जरूरत थी।
यूक्रेन की नाटों की सदस्यता के नाम पर रूस व यूक्रेन के बीच शुरू हुआ युध्द चल ही रहा है। इसे रोकने के कई प्रयास किए गए लेकिन यह युध्द किसी भी तरह के प्रयास से रूका नहीं है। माना जाता है कि रूस को युध्द में उलझा कर कमजोर करने के लिए ही यह युध्द शुरू किया गया। लेकिन रूस न तो कमजोर हुआ और न ही अमरीका का सामने झुका है। मिडिल ईस्ट में शांति थी, यह शांति ईरान को अच्छी नहीं लगी। बहुत सारे देश शांति से विकास चाहते थे, वह इसके लिए अपने संबंधो को सुधारने का प्रयास कर रहे थे।यह ईरान का पसंद नहीं आया और उसने अपने पाले हुए आतंकवादी संगठन को इजराइल पर हमला के लिए उकसा दिया। मिडिल ईस्ट आज युध्द की आग में झुलस रहा है तो उसके लिए ईरान व हमास दोषी हैं। पूरी दुनिया युध्द से प्रभावित है तो इसके लिए ईरान दोषी है।
यूक्रेन व ईरान की एक गलती से युध्द तो शुरू हो गया लेकिन यह कड़वी सच्चाई है कि युध्द शुरू करना तो आसान होता है लेकिन उसे खत्म करना आसान नहीं होता है।यूक्रेन चाहता है युध्द समाप्त हो जाए, रूस भी चाहता है कि युध्द खत्म होना चाहिए। इसके लिए बातचीत होती रहती है लेकिन युध्द जारी है। अब जब ईरान,इजराइल व अमरीका के बीच युध्द दस दिन से ज्यादा हो गए हैं। अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप कहते है कि युध्द जल्द समाप्त हो जाएगा लेकिन इजराइल कहता है कि उसका मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है।वही ईरान की तरफ से कहा गया है कि जंग कब खत्म होगी यह हम तय करेंगे। यानी ट्रंप भले ही खुद को देशों के बीच युध्द रुकवाने वाले नेता माने लेकिन ईरान के साथ जो युध्द चल रहा है उसे ट्रंप चाहें तो भी नहीं रुकने वाला है क्योंकि ईरान ने ऐसी शर्ते रख दी हैं कि ट्रंप के लिए मानना मुश्किल है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने युध्द समाप्त करने के लिए तीन शर्ते रखीं हैं। पहली शर्त है कि इजराइल व अमरीका को ईरान के अधिकारों को मान्यता देनी होगी। दूसरा युध्द में हुए नुकसान की भरपाई करनी होगी, तीसरा भविष्य में किसी भी हमले के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय गारंटी देनी होगी।वही सुप्रीम लीडर खामनेई ने कहा है कि अमरीकी हमले में मारी गई स्कूली बच्चियों और अऩ्य शहीदों के खून का बदला लिए बिना ईरान पीछे नही हटेगा।अमरीकी सैन्य अड्डो पर हमले और तेज किए जाएंगे।युध्द के ऐसे नए मोर्चे खोले जाएंगे जिसकी दुश्मनों ने कल्पना नहीं की होगी। होर्मुज को बंद रखने की रणनीति जारी रहेगी। ईरान के इस तेवर से साफ जाहिर है कि उसे युध्द को जारी ऱखने के लिए रूस व चीन से मदद मिल रही है।यानी अमरीका अब युध्द से निकलना चाहता है लेकिन अब चीन व रूस उसे ईरान युध्द में उलझाए रखना चाहते हैं। यानी तीन बड़े देशों अमरीका,चीन व रूस के कारण दुनिया में जहां जहां युध्द चल रहा है वह चलता रहेगा।दुनिया के बहुत सारे देश इससे कई तरह से प्रभावित रहेंगे।
चाहता तो चीन यह भी था कि भारत भी पाकिस्तान के साथ युध्द में लंबे समय के लिए उलझा रहे। भारत ने आपरेशन सिंदूर के रूप में जब पाकिस्तान स्थित आतंकियों के ठिकानों को नष्ट करने का लक्ष्य तय किया था तो उसका लक्ष्य साफ था,उसकी पूरी तैयारी की।उसे यह भी मालूम था कि यह काम कितने समय में पूरा हो जाएगा और पाकिस्तान ने यदि जवाबी हमला किया तो क्या करना है और कैसे करना है। भारत ने पाकिस्तान को बताकर आतंकियों के ठिकानों पर हमला किया कि यह हमला पाकिस्तान पर नहीं है। इसलिए आपरेशन सिंदूर सैन्य कार्रवाई तक सीमित रहा। पाकिस्तान ने जरूर भारत पर हमला किया और उसे ऐसा जवाब मिला कि उसे खुद ही सैन्य कार्रवाई रोकने का आग्रह करना पड़ा। इस मायने में पीएम मोदी पुतिन,ट्रंप व नेतन्याहू से बेहतर नेता साबित हुए हैं, वह जो चाहते थे किया भी और चीन जो चाहता था वह होने नहीं दिया।
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