नई दिल्ली(वीएनएस)।अंडमान-निकोबार द्वीप समूह इन दिनों राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस द्वीप का दौरा किया था, जिसके बाद उन्होंने केंद्र सरकार की ग्रेट निकोबार परियोजना पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे विकास के नाम पर विनाश और 'प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ घोटाला कहा है।वहीं, सरकार इस परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम बता रही है।
क्या है ग्रेट निकोबार परियोजना?
दरअसल, सरकार ग्रेट निकोबार द्वीप को एक वैश्विक समुद्री और व्यापारिक हब में बदलना चाहती है। इसके लिए करीब 72,000 से 82,000 करोड़ रुपये की लागत वाली परियोजना शुरू की गई है।इसके तहत 166.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (द्वीप के करीब 16 प्रतिशत हिस्से) में एक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, एक बिजली संयंत्र, एक हवाई अड्डा और एक नया शहर विकसित किया जाएगा।कुछ अनुमानों के अनुसार, परियोजना की लागत 92,000 करोड़ रुपये तक जा सकती है।
परियोजना के तहत क्या-क्या बनाया जाएगा?
कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गैलाथिया बे में 14.2 मिलियन TEU क्षमता का एक विशाल अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह।ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा: सालाना एक करोड़ यात्रियों को संभालने की क्षमता वाला ये हवाई अड्डा सैन्य और नागरिक दोनों उद्देश्यों में इस्तेमाल होगा।पावर प्लांट: 450 MVA क्षमता का गैस और सौर ऊर्जा संयंत्र लगाया जाएगा।इंटीग्रेटेड टाउनशिप: एक नया शहर बसाया जाएगा, जहां भविष्य में 3.36 लाख से 6.5 लाख तक लोग रह सकेंगे।
कैसा होगा हवाई अड्डा?
प्रस्तावित हवाई अड्डे को गांधी नगर और शास्त्री नगर के बीच दक्षिणी तटरेखा पर बनाया जाएगा, जो कैम्पबेल बे से 30 किलोमीटर लंबी सड़क द्वारा जुड़ा होगा। इस हवाई अड्डे को सैन्य और नागरिक दोनों तरह के इस्तेमाल के लिए बनाया जाएगा।हवाई क्षेत्र के संचालन और यातायात सेवाओं का नियंत्रण नौसेना के पास, जबकि यात्री टर्मिनल और नागरिक सुविधाओं का प्रबंधन भारतीय विमानन प्राधिकरण करेगा। शुरुआत में यहां से मध्यम श्रेणी के विमान उड़ान भरेंगे।
परियोजना से क्या-क्या फायदे?
ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य से मात्र 40 किलोमीटर दूर है। ये महत्वपूर्ण सिक्स डिग्री चैनल के पास भी है। यहां से 30-40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और चीन का अधिकांश ऊर्जा आयात होता है।बंदरगाह से भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार का केंद्र बनेगा। विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता कम होगी।हवाई अड्डे के सैन्य इस्तेमाल से अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी में भारत की उपस्थिति मजबूत होगी, जहां अक्सर बाहरी शक्तियां सक्रिय रहती हैं।
बंदरगाह से भारत को क्या-क्या फायदे होंगे?
फिलहाल भारत के पास बड़े जहाजों को संभालने के लिए गहरे पानी वाले बंदरगाह नहीं हैं। इस वजह से माल ढुलाई कोलंबो और सिंगापुर के रास्ते होती है।अंडमान में बंदरगाह बनने से हमारी विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता घटेगी और हर साल लगभग 1,600 से 1,800 करोड़ रुपये की बचत होगी।यह बंदरगाह रणनीतिक रूप से भी अहम होगा, क्योंकि यह पूर्व-पश्चिम अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्ग के पास है और इसकी प्राकृतिक गहराई भी 20 मीटर से ज्यादा है।
योजना का क्यों हो रहा है विरोध?
विरोध की सबसे बड़ी वजह पर्यावरण संबंधी चिंताएं हैं। जानकारों का मानना है कि करीब 160 वर्ग किलोमीटर में स्थित लाखों पड़े काटे जाएंगे।इसके अलावा जहां बंदरगाह प्रस्तावित है, वह विलुप्तप्राय 'विशाल लेदरबैक समुद्री कछुओं' के घोंसले बनाने का सबसे अहम ठिकाना है। यहां निकोबार मेगापोड और खारे पानी के मगरमच्छ भी हैं।यहां 20,668 प्रवाल भित्तियां (कोरल रीफ) कॉलोनियों की पहचान हुई है। इनमें से 16,150 कॉलोनियों को दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाएगा।
जनजाति
आदिवासी जनजाति की सुरक्षा को लेकर भी शंकाएं
इस इलाके में बाहरी दुनिया से कटी शोंपेन (आबादी 237-250) और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले निकोबारी (आबादी 1,094-1,200) आदिवासी रहते हैं। इसके अलावा जारवा, उत्तरी सेंटिनली, ग्रेट अंडमानी और ओंगे जनजाति के लोग भी रहते हैं।ये लोग घने जंगलों में रहते हैं और इनकी संस्कृति के बारे में ज्यादा पता नहीं है।जानकारों का कहना है कि यहां बाहरी आबादी बढ़ने से बीमारियां फैल सकती हैं और इससे जनजातीय अस्तित्व पर खतरा हो जाएगा।
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