मोतियाबिंद का प्राकृतिक उपचार, काला अर्क से आखों का ईलाज

Posted On:- 2026-05-07




कृष्ण कुमार निगम (सलाहकार संपादक, विजन न्यूज सर्विस)

छत्तीसगढ़ राज्य वनों से आच्छादित राज्य है, यहां के वनों में निवासरत परम्परागत वैद्यों के वनौषधियों का ज्ञान इसे और समृद्धशाली बनाता है। परम्परागत वैद्यों का जीवन जितना सहज और सरल है उतना ही उनके वनौषधियों का ज्ञान विरल है! दूर वनांचलों में राज्य की प्राथमिक चिकित्सा और स्वास्थ्य की महत्वपूर्ण भूमिका इन्हीं वैद्यों की है।  घुटने के दर्द और हड्डी के जोड़,ज्वर मलेरिया, पेट से सम्बन्धित बीमारियों, आदि का इलाज स्थानीय स्तर पर इन वैद्यों के द्वारा सदियों से किया जा रहा है। 

इसी परंपरागत वनौषधियों के ज्ञान में पारंगत वैद्य संतोष पटेल, एवं उनके सहयोगी तीजूराम साहू ग्राम मल्हारी के द्वारा किया जाने वाला नेत्र जाला उपचार ,नेत्रों की गंभीर से गंभीर बीमारियों, मोतियाबिंद और आंखों की अन्य समस्याओं का भी  निदान करने में लगे हुए हैं। इनके द्वारा राज्य में पाई जाने वाली एक वनस्पति जिसका स्थानीय नाम नेत्र ज्योति है वनस्पति शास्त्र की भाषा में इसे हाइग्रोफिला पॉलिस्परमा कहते है के बीजों का प्रयोग कर नेत्रों के असाध्य रोगों का इलाज किया जा रहा हैं। 

वैधराज संतोष पटेल और तीजूराम साहू ने बताया कि,आंखों में दवा डालने के लिए गुल बकावली के फूलों को उबाल कर उसका वाष्पीकरण (डिस्टिलेशन) करके अर्क तैयार करते है। संग्रहित जल को शीशियों में  भरा जाता और उसमें तेंदू लासा (गोंद) को बारीक बारीक कण करके शीशियों में मिलाकर उपयोग करते है।आगे उन्होंने बताया कि  शीशियों में अर्क डालने के पहले  गर्म पानी में उबाला जाता है, ताकि शीशियों के जर्म (कीटाणु) नष्ट हो जाएं। इसे गुलबकावली तेंदु लासा अर्क कहते हैं। 

इसी प्रकार पुराने मर्ज केलिए "काला अर्क" दवा देते हैं ये जटिल अर्क कैसे तैयार होता हैं पूछने पर संतोष पटेल ने बताया कि, इसमें पांच चीज की जरूरत पडती हैं,1/ गाय का ताजा दूध 2/ काला भृंगराज ओषधि 3/तिल्ली का तेल 4/पुनरनवा औषधि 5/ मुलेठी ओषधि  पथरी भाजी आदि को धीमी धीमी आँच में उबाला जाता हैं यह कार्य दो -तीन दिन कि प्रक्रिया के बाद औटते औटते केवल तेल ही शेष बचता हैं  तब यह काला अर्क तैयार होता हैं।इस अर्क के डालने से आखों का जाला दिन प्रतिदिन साफ होता हैं। आंखों का जाला निकालने का कार्य 04 से 10बार (जैसा मर्ज और मरीज ) हों उसके अनुसार प्रति 15दिनों के अंतराल में किया जाता है। इस कार्य के लिए ये लोगआसपास के  कई राज्यों में कैंप भी लगाते है।इसी सिलसिले मे 06-07मई 2026 को शंकर नगर  रायपुर के अशोका  रत्न में निवास रत हैं। 6 मई को शंकर नगर में और 7 मई को नया रायपुर में  केम्प हैं। इसके पहले रायपुर में ही 10 दिसंबर2025,को भीमसेन भवन समता कॉलोनी में अग्रवाल समाज के द्वारा कैंप आयोजित हुआ, 5 जनवरी को राजनादगांव के ग्रामीण अंचल ग्राम "सुरगी मुड़पार" में सत गुरु साहेब के सत्संग कार्यक्रम 3 दिवसीय कैंप प्रारंभ हुआ है, वे 8 जनवरी को मल्हारी गए थे, इस बीच समय निकाल कर वे राजनादगांव के लोगों के आग्रह पर राजनादगांव जाने का भी कार्यक्रम बना रहे है।प्रति माह सूरजपुर (अंबिकापुर ) में तीसरे सप्ताह लगभग 15 से 19 तारीख को कैम्प लगाते हैं।

क्या किसी चिकित्सक ने इस पद्धति का उपयोग किया है?
यह सवाल पूछे जाने पर उन्होंने  बताया कि डॉ रमन सिंह ने स्वयं अपने परिवार ,अपने पूरे स्टाफ और सुरक्षा कर्मियों का इलाज करवाया  है। हर एक दो महीने के अंतराल में उनके बगले में ईलाज के लिए जाते हैं। 1 से 5 नवंबर तक राज्योत्सव में वन विभाग के पंडाल में, सैकड़ों मरीजों ने इनसे  इलाज कराया है। पंडाल में वन विभाग की ओर से उपस्थित डॉ नीतू हरमुख प्रोफेसर वनस्पतिशास्त्र ने बताया कि इनके इलाज से लोगों के चश्मे उतर गए हैं और वे लोग बारीक अक्षर भी खुले नेत्रों से पढ़ रहे है। डॉ नीतू ने बताया कि स्वयं उन्होंने भी ईलाज करवाया है।



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