वामदलों,कांग्रेस ने ममता के एकता प्रस्ताव को नकारा

Posted On:- 2026-05-11




सुनील दास

जब भी भाजपा चुनाव जीत जाती है और विपक्ष में रहने वाला सत्तारूढ़ दल चुनाव हार जाते हैं तो हारे हुए दलों को लगता है कि विपक्षी एकता न होने के कारण चुनाव हारे हैं। सारे विपक्षी दलों ने चुनाव में भाजपा को हराने के लिए मदद नही की।पं.बंगाल की टीएमसी सर्वेसर्वा ममता बैनर्जी को तो ऐसी शिकायत नहीं करनी चाहिए। कांग्रेस व वाम दल तो पं.बंगाल के चुनाव में चाहते थे कि ममता उनके साथ मिलकर चुनाव लड़े लेकिन ममता को लगता था कि वह इन लोगों को चुनाव में साझीदार बनाएगी तो यह राज्य में मजबूत हो जाएंगे और उसे ही चुनौती देंगे।पं. बंगाल में जब कांग्रेस सत्ता मे थी तो अकेले चुनाव लड़ती थी, वामदलों की सरकार बनी तो वामदल भी अकेले चुनाव लड़ते थे। क्योंकि जिससे सत्ता छीनी जाती है , उसे सत्ता का साझेदार तो बनाया नहीं जाता।वाम दलों ने कांग्रेस को नहीं बनाया और ममता ने इसीलिए वामदलों व कांग्रेस को नहीं बनाया।

पं. बंगाल में तो यह परंपरा चली आ रही हैं कि जो सरकार में होता है, वह चुनाव अकेले ही लड़ता है क्योंकि वह अकेले चुनाव जीत सकता है। कांग्रेस अकेले चुनाव जीतती रही है, वामदल अकेले चुनाव जीतते रहे हैं। ममता तीन बार अकेले चुनाव जीती है।सत्तारुढ़ दल चुनाव अकेले हार जाता है तो उसे लगता है कि जिसने उसे हराया है, उसे हराने के लिए अब उसे विपक्ष के दलों की जरूरत है।कांग्रेस,वामदल बंगाल में चुनाव हारे तो उनको लगा कि ममता ने उनको हराया इसलिए उनको ममता को हराने के लिए मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए। अब ममता को भाजपा ने हरा दिया है तो ममता को लग रहा है कि उसे भाजपा को हराना है तो उसे कांग्रेस वामदलों की जरूरत है यानी अब ममता सत्ता मे नहीं है तो उसे विपक्ष की याद आ रही है कि विपक्षी एकता कितनी जरूरी है।

चुनाव हारने के बाद ममता ने कहा कि मैं बंगाल के सभी विपक्षी दलों,छात्र संगठनों,एऩजीओ,सभी राजनीतिक दलों से आग्रह करती हूं कि भाजपा का विरोध करने के लिए सभी मिलकर एक साझा मंच बनाएं।उन्होंने राष्ट्रीय पार्टियों सहित वामपंथियों,अतिवामपंथियों से भी आग्रह किया कि वे बंगाल के साथ ही दिल्ली में एकजुट हों।अगर कोई राजनीतिक दल मुझसे बात करना चाहता है तो मै उपलब्ध हूं।हमे याद रखना होगा कि अब हमारा पहला दुश्मन भाजपा है।ममता के आग्रह को तो पं. बंगाल के कांग्रेस व वामदलों ने तो ठुकरा दिया है।उन्होंने बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने के लिए उनके साथ आने से इंकार कर दिया है।उनका साफ कहना है कि हम टीएमसी के साथ किसी तरह का गठबंधन नहीं करेंगे।पं.बंगाल के विपक्ष का कहना है कि ममता की अपील पर हम ऐसे किसी व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे जिसकी पहचान अपराध, उगाही, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक राजनीति से जुडी़ हो।

पं.बंगाल कांग्रेस का कहना है कि ममता ने तो सालों तक वामदलों व कांग्रेस को खत्म करने की कोशिश की है। चुनाव में हमारे खिलाफ दुष्प्रचार किया।उनकी रीति नीति से ही बंगाल मे भाजपा मजबूत हुई है और आज भाजपा ने उनको हरा दिया है तो उनको भाजपा को हराने के लिए विपक्ष की मदद की जरूरत है।वामदलों व कांग्रेस के एकता के प्रस्ताव को ठुकरा देने से विपक्षी एकता फिलहाल को होने से रही खासकर बंगाल में। ममता तो चाहती रहीं है कि विपक्ष उनको नेतृत्व का मौका दे। जब पं.बंगाल में ममता सत्ता में थी तो वह पीएम मोदी व भाजपा को हराने वाली नेता खुद को मानती थी और खुले आम कहती थी वही दिल्ली में पीएम मोदी व भाजपा को हरा सकती है। बशर्ते विपक्ष उनके नेतृत्व करने का मौका दे।कई बार उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती देने की कोशिश भी की। जो राहुल चाहते थे वह संसद के भीतर व बाहर वैसा नहीं करती थी।

अब जब ममता चुनाव हार चुकी हैं और पं.बंगाल में भाजपा की सरकार बन गई है तो उसे विपक्षी एकजुटता जरूरी लग रही है।कांग्रेस के लिए तो यह मौका है कि ममता को राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने का मौका दिया जाए।इसलिए अभी दिल्ली में कांग्रेस की तरफ से विपक्षी एकता के ममता के नारे पर कुछ कहा नहीं गया है।चुनाव में ममता व स्टालिन के चुनाव हारने के बाद अब विपक्ष में सारे विपक्षी दल के नेता भाजपा व मोदी से हारे हुए नेता हो गए हैं। अब तक ममता व स्टालिन ही ऐेसे नेता जो चुनाव हारे नहीं थे अब वह भी चुनाव हारे हुए नेता है, इसलिए अब कांग्रेस की कोशिश होगी कि सारे हारे हुए नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट हो और कांग्रेस जैसा चाहती है वैसा करें। लेकिन ममता के कारण यह इतना आसान नहीं है क्योंकि कुछ नेता चाहते है कि दिल्ली मे विपक्ष का नेतृत्व ममता करे और कांग्रेस ऐसा नहीं चाहती है क्योंकि इससे राहुल गांधी दूसरे नंबर के नेता हो जाते है और उनको ममता का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ेगा। फिर राहुल  गांधी पीएम पद के दावेदार भी नहीं रह जाएंगे। अभी तो विपक्ष में नेतृत्व की लड़ाई लड़ी जाएगी. उसके बाद विपक्षी एकता के लिए किसी तरह का प्रयास होगा।



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