केरल मेें सतीशन सीएम मतलब परिवार की नहीं चली

Posted On:- 2026-05-14




सुनील दास

कांग्रेस की राजनीति परंपरा में परिवार की इच्छा अब तक अंतिम मानी जाती रही है। परिवार की इच्छा पूरा करना कांग्रेस नेताओं का पहला और अंतिम काम हुआ करता था।परिवार ने जिस नेता के सर पर हाथ रख दिया उसका सीएम बनना तय माना जाता था। छत्तीसगढ़ में यही हुआ, राजस्थान में यही हुआ,मप्र में यही हुआ। पंजाब मे यही हुआ।हिमाचल में यही हुआ।कर्नाटक में यही हुआ।इससे परिवार तो मजबूत हुआ लेकिन कांग्रेस इन तमाम राज्यों में आपसी गुटबाजी,कलह के चलते कमजोर हुई और कई राज्यों चुनाव हार चुकी है।इससे कांग्रेस के जमीनी नेताओं को ऐसा लगा कि उनका कांग्रेस में कोई महत्व नहीं है और कई जमीनी नेता कांग्रेस छोड़कर चले गए, इससे भी कांग्रेस कमजोर हुई है।केरल में पहली बार ऐसा हुआ है कि परिवार को जमीनी नेता के महत्व देना पड़ा है। पहली बार किसी राज्य में परिवार की नहीं चली है।

केरल में एक चुनाव हारने के बाद कांग्रेस इस बार चुनाव जीती है.यानी जनता ने दस साल बात कांग्रेस को चुनाव जिताया है तो उसका बड़ा कारण यहा के नए नेता सतीशन माने जाते हैं कि। उन्होंने हारने के बाद कांग्रस को जमीन स्तर पर मजबूत किया। गठबंधन के दल सहित कांग्रेस के सभी नेताओं को साथ लेकर कांग्रेस को वामपंथी दलों का बेहतर विकल्प बनाया।वामपंथी सरकार के खिलाफ आक्रामक रहे और जनता को बताया कि यह सरकार भ्रष्ट है। चुनाव में जनता ने वामपंथी सरकार को हराकर कांग्रेस के गठबंधन को मौका दिया तो कांग्रेस के गुटबाज नेता सीएम पद के दावेदार के रूप में सामने आ गए और दस दिनों तक वही होता रहा जो हाेता आया है।परिवार के करीबी नेता चाहते थे कि परिवार उनको सीएम बनाए। परिवार भी किसी राज्य में कांग्रेस के चुनाव जीतने पर अपने प्रति वफादार लोगों को ही सबसे पहले मौका देता रहा है।

यहां भी परिवार ने फिर एक बार वही करने का प्रयास किया।

परिवार को कोशिश थी कांग्रेस गठबंधन ने चुनाव जीता है तो उनका वफादार ही सीएम बने।दिल्ली में उनके वफादार केसी वेणुगाेपाल को भी लगा कि यह अच्छा मौका है केरल का सीएम बनने का।इसलिए उन्होंने परिवार की मर्जी के नाम पर खुद को दौड़ में सबसे आगे व मजबूत दावेदार बताने का प्रयास किया। हवा बनाई गई कि ज्यादातर विधायक उनके सीएम बनने के पक्षधर है।परिवार ने कोशिश की दस दिन की वेणुगोपाल के नाम पर सहमति बन जाए लेकिन चुनाव जिताने वाले सतीशन आखिरी तक नहीं माने और उनके साथ के विधायक व गठबंधन भी उनके पक्ष मे था इसलिए आखिरी में परिवार को सतीशन को सीएम घोषित करना पड़ा।परिवार चेनीथल्ला को मनाने में सफल हो गया था लेकिन सतीशन जानते थे कि वह जरा भी कमजोर पड़े तो वह पीछे कर दिए जाएंगे यानी छत्तीसगढ़ के सिंहदेव और कर्नाटक के शिवकुमार बना दिए जाएंगे। वह पूरी ताकत से अड़े रहे कि वही सीएम बनेंगे इससे कम कुछ भी उनको मंजूर नहीं और परिवार को मानना पड़ा।

परिवार वेणुगाेपाल को चाहकर भी सीएम नहीं बना सका। परिवार को केरल की जमीनी हकीकत को स्वीकार करना पड़ा और कर्नाटक का उदाहरण परिवार के सामने है.जहां पिछले कई बरसों से ढाई ढाई साल सीएम पद को लेकर जोरआजमाइश चली आ रही है।परिवार को मानना पड़ा कि अगर वह केरल में वेणुगाेपाल को दिल्ली से थोपते है तो केरल मे कांग्रेस को वही हाल होना है जो कर्नाटक में है।केरल में भी कांग्रेस को वही हाल होता जो छत्तीसगढ़,मप्र,राजस्थान में हुआ। एक चुनाव जीतने के बाद आपसी कलह के चलते कांग्रेस दूसरा चुनाव जीत नहीं पाई। केरल में परिवार को कांग्रेस के वफादार और राज्य की जमीनी हकीकत मे से किसी एक को चुनना था और परिवार को वही करना पड़ा है जिससे केरल में कांगेस मजबूत हो सके और अगला चुनाव फिर से जीत सके।

बरसों बाद किसी राज्य में कोई सीएम बना है तो परिवार की पसंद का नहीं है। पहले इसकी कल्पना नहीं करता था कोई कि जो परिवार की पसंद का नहीं है वह सीएम बन सकता है लेकिन चुनाव जिताने में परिवार की भूमिका कम होते जाने से आज कांग्रेस में परिवार को स्वीकार करना पड़ रहा है कि उनकी मर्जी थोपी गई तो राज्यों मे कांग्रेस कमजोर हो सकती है इसलिए राज्य के नेता व गठबंधन जो चाहते हैं वही करना ठीक है और परिवार की मजबूरी है।पहली बार परिवार को यह बात समझ में आई है कि उनका सामान उठाने वाला परिवार के लिए तो ठीक हो सकता है लेकिन राज्य के कांग्रेस के ठीक नहीं हाे सकता। पहली लड़ाई को सतीशन ने जीती है, आगे क्या होता है यह देखने योग्य होगा।



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