कहने के पहले परिणाम के बारे सोचा नहीं जा रहा

Posted On:- 2026-05-23




सुनील दास

 लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी की बहुत बात होती है इसे व्यक्ति का अधिकार माना जाता है। आजादी व अधिकार जैसे शब्दों के कारण सामान्य आदमी से लेकर बड़े बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों को लगता है कि वह कभी भी,कहीं भी,किसी के प्रति भी कुछ भी कह सकते हैं। वह कहने के पहले कहने का परिणाम क्या होगा यह सोचने को तैयार नहीं होते हैं। यानी हमने जो बिना सोचेविचारे कह दिया वही ठीक है, जबकि वह ठीक नहीं होता है और बिना सोचे विचार कुछ कहने का परिणाम हम आए दिन देश व दुनिया में देखते हैं।गुस्से में कुछ भी कहने का परिणाम क्या होता है यह तो हम रोज देखते हैं।जब भी आदमी में किसी बात को लेकर गुस्सा होता है तो वह अक्सर बिना सोचे समझे कुछ कह जाता है और उस कथन का परिणाम कई बार देश को भुगतना पड़ता है। बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों को कई बार लगता है कि वह कोई बहुत अच्छी बात कह रहे हैं लेकिन वह अच्छी बात एक वर्ग के लिए ही अच्छी और दूसरे वर्ग के लिए बुरी हो तो इसका परिणाम देश के लिए बुरा हो सकता है।

आरक्षण के विषय में देश के बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों को कुछ भी कहने से पहले उसके परिणाम के बारे  में जरूर सोचना चाहिए।उन्हें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि हमने जो कहा है उससे तो अच्छा हो होगा। हमेशा ऐसा नहीं होता है,कई बार बुरा होता है और एक बड़ी आबादी को उसका परिणाम भुगतना पड़ता है।कोर्ट ने मणिपुर में आरक्षण के विषय में कुछ कहा और उस कहने का परिणाम यह है कि आज तक मणिपुर के लोग आपस में लड़ रहे हैं, सरकार वहां शांति स्थापित नहीं कर पा रही है। बांग्लादेश में आरक्षण पर कोर्ट ने कुछ कहा और बांग्लादेश में महीनों अराजकता की स्थिति रही। चुनी हुई सरकार को इस्तीफा देना पड़ा,लोगों को महीनों कई तरह की परेशानी हुई।नेपाल में युवाओं के आंदोलन के कारण पुरानी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। महीनों यहां भी अराजकता की स्थिति रही।

कोई कुछ भी अच्छे के लिए लेकिन गुस्से में जो लोग होते हैं,वह उसका कोई गलत मतलब निकाल सकते हैं फिर आप कहते रहो हमारे कहने का यह मतलब नहीं था। हमारे कहने का तो यह मतलब था लेकिन देश के नाराज लोगों को एक मौका मिल जाता है अपने गुस्से को बाहर निकालने का और इस मौके पर किसी देश में क्या कुछ हो सकता है हमने बांग्लादेश,श्रीलंका व नेपाल में देखा है। समझने की जरूरत है कि हर देश की युवा पीढ़ी में कई तरह की समस्याओं के कारण गुस्सा होता है।बेरोजगारी,भ्रष्टाचार,शासक वर्ग की ऐयाशी, आरक्षण आदि ऐसे मुद्दे होते हैं जिसके कारण युवाओं में बहुत गुस्सा होता है। उनको लगता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है।अब एक जज साहब ने कह दिया कुछ लोग काकरोज,परजीवी होते हैं।एक जज साहब ने कह दिया कि माता पिता आईएएस हैं तो बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए।

जज साहब ने ऐसा क्यों कहा,किसके भले के लिए कहा,यह बात भुला दी जाती है और यह याद रखा जाता है कि जज साहब ने देश के युवाओं को काकरोच कहा है।यह याद रखा जाता है कि जज साहब ने आरक्षण नहीं देेने को कहा है। गांव तक बात पहुंचेगी तो यह समझाया जाएगा सरकार युवाओं को काकरोच समझती है, कि सरकार आरक्षण खत्म करने वाली है और आरक्षण ऐसा संवेदनशील मुद्दा है को पूरा देश व समाज दो हिस्सों मेें बंट जाता है और व्यापक हिंसा व तनाव की स्थिति निर्मित होती है। पिछड़ों का आरक्षण देते वक्त देश देख चुका है कि आरक्षण देने व खत्म करने के नाम पर देश में क्या कुछ हो सकता है।देश में कई राजनीतिक दल जो चुनाव में हार जाते हैं, वह सत्ता से सरकार को हटाने के लिए युवाओं के ऐसे आंदोलन का इंतजार कर रहे हैं जैसा बांग्लादेश में हुआ,श्रीलंका में हुआ, नेपाल में हुआ। युवाओं में गुस्सा है कुछ राजनीतिक दल चाहते हैं कि इस देश के युवा भी बांग्लादेश,श्रीलंका व नेपाल के युवाओं की तरह देश को अराजकता की आग में झोंक दे।देश में अराजकता की आग न फैले इसलिए बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों को कुछ कहने से पहले परिणाम के बारे में जरूर सोचना चाहिए।



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