वक्त लगता है लेकिन सत्य की जीत होती है

Posted On:- 2026-05-17




सुनील दास

सनातन सत्य का पक्षधर होता है।वह सत्य के साथ खड़ा होता है और यह जानते हुए भी खड़ा होता है कि सत्य की जीत में समय लगता है। वह सत्य के साथ सत्य की जीत का इंतजार करता है और आज तक सनातन की जीत इसीलिए हुई है कि वह सत्य के साथ खड़ा रहा है,वह सत्य की जीत के प्रति आश्वस्त रहता है इसलिए सत्य की लड़ाई में सौ साल लगे या कई सौ लगे वह लड़ता है,सत्य के लिए लड़ता है,लड़ाई लंबी चलती है तो निराश नहीं होता है। वह कई सौ साल तक आशा के साथ इंतजार करता है, अय़ोध्या मामले में उसने कई सौ साल इंतजार किया और आखिरी में अयोध्या में सत्य की जीत हुई। इसी के साथ भोजशाला का मामला भी लंबे समय से चला आ रहा था और आखिर इस मामले में भी सत्य की जीत हुई है।यह जीत सनातन की जीत है।

मप्र हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने १५ मई २०२६ भोजशाला फैसला सुनाते हुए कहा है कि विवादित परिसर का धार्मिक चरित्र देवी सरस्वती के मंदिर का है।कोर्ट ने ७ अप्रैल २००३के एएसआई आदेश को रद्द कर दिया है कि जिसमें शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी।कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार और एएसआई स्मारक का प्रबंधन अब उसके धार्मिक चरित्र के अनुरूप कर सकती हैं।जस्टिस विजय कुमार शुक्ल व जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने कहा है कि एएसआई के सर्वे व दस्तावेज से संकेत मिलता है कि मौजूदा ढांचा पूर्व की संरचना पर  बना है।ज्ञात हो कि भोजशाला को लेकर विवाद चल रहा था कि यह किसका है। हिंदू व मुस्लिम पक्ष इसे अपना अपना बता रहे थे। ९२ साल बाद एएसआई के सर्वे के आधार पर अब अदालत ने साफ कर दिया है कि यह हिंदू पक्ष का है।

हिंदू पक्ष की सबसे अच्छी बात यह है कि वह अपने आस्था के केंद्र को लेकर कोई फैसला चाहता है तो वह कोर्ट के पास सबूत लेकर जाता है और कहता है कि यह हमारी आस्था का स्थल है,इसका प्रमाण यह है इसलिए कोर्ट सबूतों के आधार पर फैसला करे कि यह स्थल किसका है और मजबूत सबूत जिसके पास होते हैं फैसला उसके पक्ष में होता है। अयोध्या मामले में भी यही हुआ है और भोजशाला मामले में भी यही हुआ है। जब आस्था के स्थल को लेकर विवाद होता है तो सबसे अच्छा तरीका यही होता है कि दोनों पक्ष कोर्ट के पास जाएं और कोर्ट जो फैसला करे उसे स्वीकार करें।इस फैसले का असर आगे भी होगा क्योंकि ऐसे विवादित स्थल अभी और हैं देश में।

कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति के कारण हिंदू समाज के कई आस्था के स्थल उसके होने के बाद भी उसके नहीं माने जा रहे थे क्योंकि संरक्षित स्मारकों का चरित्र उनके वर्तमान उपयोग से तय किया जा रहा था। हाईकोर्ट के फैसले के बाद साफ हो गया है कि अब किसी आस्था के स्थल के चरित्र का निर्धारण उसके वर्तमान उपयोग से नहीं बल्कि ऐतिहासिक,पुरातात्विक व वैज्ञािनक साक्ष्यों से किया जाएगा।क्योंकि संविधान में धार्मिक अधिकारों के साथ ही सांस्कृतिक विरासत संरक्षण कि जिम्मेदारी का भी उल्लेख है।इसी के साथ अब भोजशाला मेे हिंदू समाज को अब एक दिन नहीं पूरे साल पूजा करने का अधिकार मिल गया है और इसी के साथ इस स्थल पर अयोध्या की तरह भव्य मंदिर बनाने का रास्ता भी बन गया है। ऐसे आस्था के स्थल आने वाले दिनों मेें हिंदू समाज को सत्य के लिए लड़ने और विजयी होने होने की प्रेरणा देंगे।

सत्य की जीत के लिए जो समाज लड़ता है, उसकी जीत के लिए जरूरी है कि उस समाज का ही कोई राजनीतिक नेतृत्व करे।जब किसी देश मे एक समाज का ही राजनीतिक नेतृत्व होता है तो समाज को जीत में आसानी होती है क्योंकि वह रास्ते की बहुत सी बाधाओं को हटाने का काम करता है।इन बाधाओं के कारण ही फैसले मे ९२ साल लगते है, पांच सौ साल लगते हैं लेकिन २०१४ के बाद राजनीतिक नेतृत्व हिंदू समाज का है तो चाहे अयोध्या मामला हो या भोजशाला का मामला फैसला हुआ है और जल्द हुआ है। राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका भले ही फैसला कराने में न हो लेकिन वह बहुत कुछ ऐसा करता है कि फैसले में अनंत समय की देरी नही होती है।यानी फैसला जल्द से जल्द होता है।हिंदू समाज को अयोध्या व भोजशाला के फैसले से सबक लेने की जरूरत है कि देश में उसका भला हिंदू समाज का राजनीतिक नेतृत्व होने में है।



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