भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय समागम में देश भर से आए हजारों जनजातीय प्रतिनिधि जुटे। उऩका यह जुटाव इस बात का संकेत हैं कि जनजातीय समाज सबसे बड़े खतरे धर्मांतरण के प्रति सजग है और वह चाहता है कि समाज को इस खतरे से बचाव के लिए सरकार वह काम करे जो समाज चाहता है। समाज की मांग तो राज्य स्तरों पर होती रही है, पहली बार दिल्ली स्तर पर जनजातीय समाज ने एकजुट होकर मोदी सरकार से मांग की है कि जनजातीय समाज के जो लोग ईसाई या मुसलमान हो जाते हैं यानी धर्मांतरण कर लेते हैं. उनको जनजातीय समाज को मिलने वाला लाभ नहीं मिलना चाहिए।
आदिवासी समाज की पहचान उसकी संस्कृति,परंपरा,देवी देवताओं व जीवन पध्दति से जुड़ी हुई है। मतांतरण के कारण आदिवासी समाज की मूल पहचान व सांस्कृतिक विरासत को खतरा है।ऐसे में जिन लोगों ने आदिवासी परंपरा व मूल संस्कृति को छोड़ दिया है तो उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची से बाहर किया जाना चाहिए। ऐसा न किए जाने के कारण वह जनजाति के नहीं है लेकिन जनजाति को मिलने वाला लाभ भी ले रहे हैं।इससे जनजातीय लोगों की संख्या कम हो रही है और गांवों में आए दिन कई तरह के विवाद हो रहे हैं।दिल्ली के ऐतिहासिल लाल किले में आयोजित जनजातीय संस्कृति समागम का एक मकसद यही बताना था कि जनजातीय समाज क्या चाहता है।समागम में बता दिया गया है कि आदिवासियों के लिए मतांतरण सबसे बड़ा खतरा है और इससे निपटने के लिए जरूरी है कि संविधान में संशोधन कर डिलिस्टिंग का प्रावधान किया जाए।
इस मौके पर अमित शाह ने जनजातीय सांस्कृतिक समागम में संस्कृति,धर्म व देश की रक्षा के लिए जनजातीय समा्ज से एकजुट होने का आव्हान किया और आदिवासियों को आगाह किया कि वह आदिवासियों में भेद पैदा करने वाली शक्तियों के प्रति सजग रहें।उन्होंने जनजातीय समाज को सचेत किया कि कुछ लोग यूसीसी को लेकर भ्रम फैला रहे सच्चाई यह है कि गुजरात व उत्तराखंड में आदिवासियों को यूसीसी से बाहर रखा गया है।इसी तरह स्वशासन,जल,जंगल,जमीन और संस्कृति के लिए पूरे देश मे मप्र के पेसा कानून का माडल लागू किया जाएगा। उन्होंने जनजातीय समाज को आगाह किया कि जनजातीय समाज का विकास रोकनेवालों ने समाज के ४० हजार लोगों की हत्या की है।छत्तीसगढ़ के बस्तर में अब सुरक्षा कैंप की जगह ७० वीर गुंडाधुर सेवा केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं।मोदी सरकार जनजातीय समाज के लिए विकास के लिए बजट में १.५० लाख करोड़ का प्रावधान किया है जबकि कांग्रेस के समय मात्र २८ हजार करोड़ था।
जनजातीय समाज मतांतरण को लेकर सजग है तथा वह चाहता है कि सरकार इसके लिए ऐसे प्रयास करे कि मतांतरण के कारण के जनजातीय समाज को किसी तरह का नुकसान न हो। उसका उत्साह उस वक्त बढ़ा जब मार्च २६ को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया कि यदि कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति धर्म बदलकर ईसाई या इस्लाम को अपनाता है तो उसका एससी,एसटी का दर्जा व उससे जुड़े लाभ समाप्त हो जाते हैं।न्यायालय ने कहा था कि जिन धर्मों में जाति व्यवस्था नहीं है।उसमें जाने के बाद अनुसूचित जाते का सदस्य नहीं माना जा सकता। जनजातीय समाज की एकजुटता का संदेश दिल्ली में देने की जरूरत इसलिए भी थी कि एक वर्ग यह भ्रम फैलाने की कोशिश करता रहा है कि आदिवासी सनातनी नहीं है।आदिवासी हिंदू नहीं है, इस तरह के आयोजन से उसके सनातनी होने के भाव को मजबूत करने का प्रयास किया गया है।उसे यह बताने की,समझाने की कोशिश की जा रही है कि वह विशाल सनातनी समाज का अहम हिस्सा है।
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