विपक्ष की एकता में दरार तो सामने आ गई है

Posted On:- 2026-07-16




सुनील दास

राहुल गांधी व कांग्रेस विपक्षी एकता की बात तो बहुत करते हैं लेकिन जब विपक्षी एकता को मजबूत करने की बात आती है तो उनको राज्यों में अपना हित साधना ज्यादा जरूरी लगता है और जब संसद सत्र आता है तो वह चाहती है कि विपक्ष उसके कहने मात्र से मोदी सरकार के खिलाफ हो जाए और कांग्रेस जैसा चाहती है विपक्ष वैसा ही करे। विपक्ष ऐसा करता यदि कांग्रेस भी विपक्ष जैसा चाहता है वैसा राज्यों में करती। कांग्रेस राज्यों  में विपक्ष जैसा चाहता है वैसा नहीं करती इसलिए विपक्ष भी कांग्रेस जैसा संसद सत्र में चाहता है, वैसा नहीं करना चाहता है। तमिलनाडु में जब विपक्षी एकता मजबूत करने का वक्त आया तो कांग्रेस ने द्रमुक का साथ छोड़ दिया और टीवीके के साथ चली गई।ऐसे मे उसे यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि द्रमुक व अन्य विपक्षी दल वैसा ही करें जैसा कांग्रेस चाहती है। विपक्षी दल सीजेपी के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं तो कांग्रेस अपने राजनीतिक फायदे के लिए सीजेपी की आंदोलन का समर्थन नहीं कर रही है। विपक्षी दलों का वक्त पर समर्थन कांग्रेस नहीं कर रही है तो कांग्रेस का समर्थन संसद में विपक्षी दल सभी मुद्दों पर कैसे कर सकते हैं।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने गुरुवार को एक बयान में कहा है कि कांग्रेस संसद के आगामी सत्र में यदि सरकार डिलिमीटेशन बिल लाती है तो कांग्रेस उसका विरोध करेगी और इसके लिए विपक्षी एकता बनाए रखने का प्रयास करेगी।उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विपक्षी दलों में फूट डालकर कानून पास कराने के लिए ज़रूरी संख्या जुटाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि यह सच है कि 17 अप्रैल से गृह मंत्री ने एक या दो विपक्षी पार्टियों में फूट डलवाई है। यह संविधान का अपमान है। वे चालाकी से दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी चालाक चालों और दूसरी पार्टियों को तोड़कर दो-तिहाई बहुमत हासिल करना संविधान का अपमान है।यानी कांग्रेस का मालूम है कि परिसीमन बिल व महिला आरक्षण बिल सरकार इस सत्र में फिर से ला सकती है और उसके लिए वह बहुमत जुटाने का प्रयास कर रही है।यह सच है कि पिछली बार इन बिलों को पास कराने संसद में पेश किया गया था और विपक्ष के विरोध के चलते यह बिल संसद में पारित नहीं हाे सका था।

पं.बंगाल में टीएमसी की हार व तमिलनाडु में द्रमुक की हार,कांग्रेस के द्रमुक से अलग होने के बाद देश में राजनीतिक समीकरण बदल गए है। टीएमसी के २०सांसद व उध्दव गुट के ७ सांसद एनडीए में शामिल होने के बाद एनडीए को ऐसा लगा है कि पिछली बार जो काम वह संसद में नहीं कर सकी थी,वह अब कर सकती है क्योंकि अब एनडीए सांसदों की संख्या लोकसभा में २९३ से बढ़कर ३१९ हो गई है और उसे अब बहुमत के लिए मात्र ४१ सांसदों की जरूरत है और इसे जुटाने का काम चल रहा है। और इसमें एनडीए को सफलता भी मिल रही है और विपक्षी एकता में दरार कैसे पड़ सकती है,यह भी साफ हो गया है.हाल में एकनाथ शिंदे से शरद पवार की मुलाकात के बाद माना जा रहा है कि एनडीए बहुमत जुटाने में सफल हो रहा है और शरद पवार की सुपुत्री सुप्रिया सुले के इस बयान के बाद कि सभी राज्यों में विधेयक में ५० प्रतिशत सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव आता है तो उनकी पार्टी विधेयक का समर्थन कर सकती है।यह साफ हो गया है कि एनडीए के बहुमत जुटाने का काम हो रहा है और वह सफल भी हो रहा है।यदि शरद पवार गुट के ८ सांसद आ जाते हैं तो संख्या ३१९ से बढ़कर ३२७ हो जाएगी। यानी इसके बाद बहुमत के लिए ३३ सांसदों की जरूरत है।

द्रमुक के २० सांसद है यदि भाजपा द्रमुक को अपने पाले में लाने में सफल हो जाती है उसके एनडीए के सांसदों की संख्या बढ़कर ३४७ हो जाती है। यानी अब उसे बहुमत के लिए १३ सांसदों की जरूरत रह जाती है इसके लिए भाजपा उनको समर्थन देने काे कह सकती है या गैरहाजिर रहने को कह सकती है। दोनों ही स्थिति मे इस बार बहुमत का जुगाड़ भाजपा के लिए आसान तो लग रहा है, इसलिए वह बिल दोबारा इस सत्र में पेश करने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस नेता जयराम के बयान से लगता है कि उनको भी लग रहा है कि भाजपा इस बार संसद में परिसीमन बिल पास करा सकती है यही वजह है कि वह इसे संविधान से जोड़कर अभी से संविधान का अपमान बताने का प्रयास कर रहे हैं।सबको मालूम है कि कांग्रेस जब भी किसी मुद्दे पर हारती है तो खुद को संविधान  का सम्मान करने वाला और भाजपा को संविधान का अपमान करने वाला बताने का प्रयास करती है।इससे साफ हो जाता है कि इस बार हमेशा की तरह कांग्रेस  विपक्ष को परिसीमन बिल के विरोध मे एकजुट करने का प्रयास करेगी लेकिन वह पहले की तरह विपक्ष काे एकजुट नहीं कर पाएगी। क्योंकि तमिलनाडु में जो कांग्रेस  ने किया है और सीजेपी के मामले में कांग्रेस को जो रुख है। वह विपक्षी एकता को कमजोर करने वाला है तो एनसीपी शरद पवार गुट का बिल का समर्थन करना विपक्षी एकता में पड़ने वाली दरार को दिखाता है।

शरद पवार गुट के भाजपा का सशर्त साथ देने के बयान से यह तो साफ हो गया है कि पिछली बार जो दल परिसीमन बिल के खिलाफ थे वह इस बार सशर्त समर्थन दे सकते हैं। एक दल ने अपनी शर्त बता दी है और वह कोई ऐसी शर्त नहीं है कि एनडीए उसे मान नहीं सकती।क्योंकि अमित शाह ने तो पिछली बार ही मौखिक कहा था कि अगर विपक्षी दल बिल का समर्थन करते हैं तो वह राज्यों में पचास प्रतिशत सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव ला सकते हैं। अगले कुछ दिनों में यदि द्रमुक सहित कुछ दल शर्त के साथ परिसीमन बिल का समर्थन करने को राजी हो जाते हैं जो काम यानी परिसीमन के साथ महिला आरक्षण का बिल इस सत्र में पारित कराया जा सकता है और ऐसा होता है तो यह कांग्रेस की बड़ी हार होगी क्योंकि कांग्रेस ने भाजपा की संसद में हार को अपनी बड़ी जीत बताया था। बडी जीत से खुश होने वाले राहुल गांधी को इस बार बडी़ हार का सामना करना पड़ सकता है और इसके लिए कोई और नहीं वह खुद दोषी है।क्योंकि विपक्षी एकता को कमजोर करने का काम उन्होंने ही किया है।



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